ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति पर ईरान ने भारत का सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया है। ईरान ने इसे दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक मित्रता और गहरे सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया। वहीं, इसी बीच ईरानी मीडिया की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका के कूटनीतिक दबाव के कारण कम से कम 13 देशों ने अंतिम संस्कार समारोह में अपनी भागीदारी वापस ले ली या उसे सीमित कर दिया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
तेहरान स्थित भारत में ईरान के दूतावास ने भारतीय सरकार और जनता का धन्यवाद करते हुए कहा कि अंतिम संस्कार में भारत की भागीदारी दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विश्वास और सहयोग का प्रमाण है। ईरानी दूतावास ने अपने संदेश में कहा कि यह मित्रता का ऐसा भाव है जिसे ईरान कभी नहीं भूलेगा। भारत की ओर से अंतिम संस्कार में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया था, जिसे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ईरान की अर्द्ध-सरकारी समाचार एजेंसी तस्नीम (Tasnim) ने दावा किया है कि अमेरिका ने कई देशों पर राजनयिक दबाव डालकर उन्हें अंतिम संस्कार समारोह से दूर रहने के लिए कहा था। रिपोर्ट के अनुसार, इस दबाव के बाद कम से कम 13 देशों ने या तो अपने प्रतिनिधिमंडल का स्तर घटा दिया या कार्यक्रम में शामिल होने का निर्णय वापस ले लिया। हालांकि अमेरिका की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है।
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने पहले ही घोषणा की थी कि भारत अंतिम संस्कार में अपने प्रतिनिधियों को भेजेगा। सरकार का कहना था कि यह निर्णय भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जनसंपर्क संबंधों को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल में विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद आरिफ मोहम्मद खान (समसामयिक रिपोर्टों के अनुसार प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा) शामिल रहे।
ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार में लाखों लोगों के शामिल होने का दावा किया गया। राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में शोक सभाएं आयोजित की गईं और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। अंतिम संस्कार कई दिनों तक चले कार्यक्रम का हिस्सा रहा, जिसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक राजकीय अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों को भी दर्शाता है। एक ओर ईरान अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के समर्थन को प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की रणनीति को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। हालांकि अमेरिकी दबाव से 13 देशों के पीछे हटने का दावा अभी केवल ईरानी मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है और इसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
भारत और ईरान के संबंध ऊर्जा, व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। चाबहार बंदरगाह परियोजना, मध्य एशिया तक संपर्क और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच निरंतर सहयोग बना हुआ है। ऐसे में भारत का अंतिम संस्कार में प्रतिनिधिमंडल भेजना उसकी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऐसे राजनयिक कार्यक्रमों में किसी देश की भागीदारी केवल औपचारिकता नहीं होती, बल्कि उसके विदेश नीति के संकेतों के रूप में भी देखी जाती है। भारत ने इस मामले में किसी भी पक्ष के दावों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने के बजाय अपने पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण का पालन किया है।
फिलहाल ईरान ने भारत के प्रति औपचारिक धन्यवाद व्यक्त किया है, जबकि 13 देशों के पीछे हटने संबंधी दावा ईरानी मीडिया रिपोर्टों में सामने आया है। अमेरिका की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। मामले से जुड़े आगे के घटनाक्रम और संबंधित देशों की प्रतिक्रियाओं पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।