उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर्स एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बेहद सख्त टिप्पणी की। उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 की वैधता और उसके इस्तेमाल से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल ‘गैंगस्टर’ के रूप में चिन्हित कर उसके खिलाफ मुकदमा चलाना और सजा देना पर्याप्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने मौजूदा कानून को “stillborn” बताते हुए कहा कि कानून में अलग से कोई अपराध निर्मित होना और उसके लिए निर्धारित सजा होना जरूरी है।
यह टिप्पणी उस मामले में सामने आई जिसमें सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। अदालत ने संबंधित कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी केवल उसे गैंग या गैंगस्टर की श्रेणी में रखने के आधार पर तय नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कानून के इस्तेमाल पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी दंडात्मक कानून में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन सा कृत्य अपराध है और उस अपराध के लिए क्या सजा निर्धारित है। अदालत के अनुसार, उत्तर प्रदेश का यह कानून मुख्य रूप से ‘गैंग’ और ‘गैंगस्टर’ की परिभाषा देता है, लेकिन अपने स्तर पर कोई अलग अपराध बनाने और उसके लिए दंड निर्धारित करने की समस्या सामने आती है।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) में निहित सिद्धांत का भी उल्लेख किया। इसका मूल आधार यह है कि किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दंडित नहीं किया जा सकता जिसे कानून ने अपराध के रूप में स्थापित ही नहीं किया हो।
‘गैंगस्टर’ का टैग लगाना पर्याप्त नहीं
अदालत की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि किसी व्यक्ति को केवल गैंग चार्ट में शामिल कर देने से उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट के आधार पर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी, मुकदमा और सजा की प्रक्रिया में वास्तविक अपराध का स्पष्ट आधार होना आवश्यक है।
कोर्ट ने इस तरह की व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताई और कहा कि ऐसी स्थिति में कानून निर्दोष लोगों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि हिंसा रोकने के उद्देश्य से बनाया गया कानून स्वयं नागरिकों के खिलाफ अन्याय का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
दो मामलों में कार्यवाही रद्द
यह फैसला शिव प्रताप सिंह उर्फ चीनू बनाम स्टेट ऑफ यूपी और उससे जुड़े एक अन्य मामले में आया। सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर्स एक्ट के तहत शुरू की गई संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा प्रावधानों के आधार पर ऐसी कार्यवाही आगे नहीं चल सकती।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला गुजरात और महाराष्ट्र के संबंधित कानूनों को मंजूरी देने वाला नहीं माना जाना चाहिए। अदालत ने यह फैसला विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मौजूदा कानून की संरचना के आधार पर दिया है।
पहले भी प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्ती दिखा चुका है
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के इस्तेमाल को लेकर कड़ी टिप्पणी की हो। इसी साल मार्च में एक अन्य मामले में अदालत ने गैंग चार्ट तैयार करने की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं होने पर FIR रद्द कर दी थी।
अदालत ने कहा था कि गैंग चार्ट में संबंधित अधिकारियों की निर्धारित सिफारिश और मंजूरी जरूरी है। नियमों के अनुसार SHO और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिश के बाद पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी की मंजूरी की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्योंकि इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को ‘गैंगस्टर’ घोषित किए जाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, इसलिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन होना चाहिए।
एक ही मामले में दो मुकदमों पर भी दिया था फैसला
सुप्रीम कोर्ट हाल के दिनों में गैंगस्टर्स एक्ट से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में भी स्पष्ट कर चुका है कि गैंगस्टर्स एक्ट की कार्यवाही लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि किसी दूसरे अपराध का ट्रायल रोक दिया जाए।
17 अगस्त 2026 को कोर्ट ने कहा था कि तेज सुनवाई का अधिकार केवल आरोपी का नहीं बल्कि पीड़ित का भी अधिकार है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें गैंगस्टर्स एक्ट की कार्यवाही पूरी होने तक हत्या के मुकदमे को रोक दिया गया था।
उत्तर प्रदेश में कानून को लेकर क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर्स एक्ट का इस्तेमाल संगठित अपराध और आपराधिक गतिविधियों पर कार्रवाई के लिए किया जाता है। कानून के तहत संपत्ति कुर्की, गिरफ्तारी और मुकदमे जैसी कठोर कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पुलिस और प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
फैसले का सीधा असर यह हो सकता है कि गैंगस्टर्स एक्ट लगाने से पहले जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना पड़े कि मामला कानून की आवश्यक शर्तों को पूरा करता है और किसी व्यक्ति को केवल पुराने मामलों या गैंग चार्ट में नाम दर्ज होने के आधार पर आरोपी न बनाया जाए।
पुलिस कार्रवाई में प्रक्रिया का पालन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का एक बड़ा संदेश यह है कि अपराध नियंत्रण के लिए सख्त कानून होने के बावजूद उसकी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। यदि गैंग चार्ट तैयार करने, अधिकारियों की मंजूरी लेने या अपराध की कानूनी बुनियाद तय करने में गंभीर कमी रहती है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लग गई है। बल्कि अदालत ने कानून के इस्तेमाल में कानूनी प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर जोर दिया है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एक्ट के तहत चल रहे मामलों पर इसके प्रभाव को लेकर कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो सकती है। खास तौर पर उन मामलों में जहां कार्रवाई मुख्य रूप से गैंग चार्ट या पुराने मुकदमों के आधार पर शुरू की गई है, आरोपी पक्ष इस फैसले का हवाला दे सकता है।
हालांकि हर मामले के तथ्य अलग होंगे और किसी मुकदमे की वैधता का फैसला संबंधित मामले की परिस्थितियों और कानून के लागू प्रावधानों के आधार पर होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर्स एक्ट के इस्तेमाल और उसकी कानूनी सीमाओं पर महत्वपूर्ण बहस को आगे बढ़ाता है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि सख्त कानून का मतलब मनमानी कार्रवाई की अनुमति नहीं है और किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए स्पष्ट कानूनी आधार तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।v