भारत और चीन के रिश्ते एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले दो वर्षों में बढ़ी बातचीत अब उस मुकाम पर पहुंच रही है जहां दोनों एशियाई शक्तियां 2020 के सीमा संकट के बाद बने गहरे अविश्वास से आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं। करीब 2.8 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों देशों के रिश्तों में सुधार केवल नई दिल्ली और बीजिंग तक सीमित मामला नहीं है। इसका असर एशिया की सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन, BRICS, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और आने वाले दशकों की विश्व व्यवस्था पर पड़ सकता है।
इस प्रक्रिया की अगली बड़ी परीक्षा नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन है। भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। यदि यह यात्रा तय कार्यक्रम के अनुसार होती है तो यह 2019 के बाद शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा होगी और 2020 के गलवान संघर्ष के बाद उनकी पहली यात्रा भी होगी। यात्रा और संभावित द्विपक्षीय बैठक के अंतिम विवरण को लेकर आधिकारिक कार्यक्रम महत्वपूर्ण रहेगा।
भारत-चीन संबंधों में यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसकी शुरुआत अक्टूबर 2024 के आसपास साफ दिखाई देने लगी थी, जब पूर्वी लद्दाख में लंबे सैन्य गतिरोध के बाद कुछ महत्वपूर्ण इलाकों में डिसइंगेजमेंट व्यवस्था पर सहमति बनी। इसके तुरंत बाद रूस के कजान में मोदी और शी के बीच औपचारिक बातचीत हुई। अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन में दोनों नेता फिर मिले और उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस बात पर जोर दिया कि भारत और चीन को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि विकास साझेदार के रूप में देखना चाहिए तथा मतभेदों को विवाद में बदलने से बचना चाहिए।
2020 का गलवान संकट अभी भी सबसे बड़ी पृष्ठभूमि
हालिया सुधार को समझने के लिए जून 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उस संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी, जबकि चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत की आधिकारिक पुष्टि की थी। दशकों बाद दोनों देशों की सीमा पर हुआ यह सबसे गंभीर हिंसक टकराव था।
इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़े। पूर्वी लद्दाख के कई क्षेत्रों में हजारों सैनिक तैनात हुए, सैन्य और राजनयिक स्तर पर लगातार बातचीत शुरू हुई और भारत ने चीन से जुड़े निवेश, डिजिटल सेवाओं और कई कंपनियों पर अतिरिक्त जांच और प्रतिबंधों की नीति अपनाई।
भारत ने सैकड़ों चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगाया। चीनी निवेश के लिए सरकारी मंजूरी की व्यवस्था कड़ी हुई और कई बड़े कारोबारी प्रस्ताव सुरक्षा जांच में फंस गए। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी लंबे समय तक बंद रहीं।
यही कारण है कि वर्तमान सुधार को सामान्य दोस्ती की वापसी मानना जल्दबाजी होगी। यह फिलहाल अविश्वास के बीच रिश्तों को फिर से काम करने लायक बनाने की कोशिश अधिक दिखाई देती है।
सीमा पर सुधार सबसे जरूरी शर्त
नई दिल्ली लगातार कहती रही है कि सीमा पर शांति के बिना भारत-चीन संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक वार्ता अभी भी रिश्तों का आधार बनी हुई है।
मई 2026 तक भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर Working Mechanism for Consultation and Coordination की 35 बैठकें हो चुकी थीं। सितंबर 2026 में पूर्वी सेक्टर से जुड़ा एक नया उच्च स्तरीय सैन्य संवाद भी सामने आया है। इसका उद्देश्य वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर विवाद को बड़े सैन्य संकट में बदलने से रोकने के लिए संवाद के चैनल मजबूत करना है।
इसका मतलब सीमा विवाद खत्म होना नहीं है। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा की व्याख्या को लेकर अभी भी मतभेद हैं। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे और अक्साई चिन को लेकर भारत की स्थिति जैसे बुनियादी मुद्दे जस के तस हैं।
इसलिए दोनों देशों के सामने चुनौती यह है कि अंतिम सीमा समाधान आने तक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें पेट्रोलिंग या स्थानीय सैन्य गतिविधि किसी नए गलवान जैसे संकट में न बदल जाए।
सीधी उड़ानें और कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू
राजनीतिक सुधार के साथ लोगों के स्तर पर संपर्क बहाल करने के प्रयास भी तेज हुए हैं।
भारत और चीन के बीच सीधी विमान सेवाएं अक्टूबर 2025 में फिर शुरू हुईं। इसके अलावा करीब पांच वर्षों के अंतराल के बाद 2025 में कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू की गई और यह व्यवस्था 2026 में भी जारी है। वीजा व्यवस्था में सुधार और पर्यटन तथा कारोबारी यात्राओं को आसान बनाने पर भी दोनों देशों ने बातचीत की है।
इन फैसलों का प्रतीकात्मक महत्व बड़ा है। किसी भी द्विपक्षीय संबंध को केवल सैनिकों, नेताओं और व्यापार आंकड़ों से नहीं मापा जाता। छात्रों, पर्यटकों, कारोबारियों और धार्मिक यात्रियों की आवाजाही सामान्य होने से दोनों देशों के बीच लंबे समय में राजनीतिक तनाव कम करने में मदद मिल सकती है।
छह साल बाद सीमा व्यापार की वापसी
1 अगस्त 2026 को सिक्किम के नाथू ला दर्रे से भारत-चीन सीमा व्यापार लगभग छह साल बाद फिर शुरू हुआ। यह रास्ता 2020 से बंद था।
व्यापार दोबारा शुरू होना आर्थिक दृष्टि से बहुत बड़ा कदम नहीं माना जा सकता क्योंकि नाथू ला से होने वाला व्यापार दोनों देशों के कुल व्यापार की तुलना में बेहद छोटा है। लेकिन इसका राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण है। सीमा पर जिस क्षेत्र में कुछ वर्षों पहले सैन्य तनाव सबसे बड़ा मुद्दा था, वहीं सीमित कारोबारी गतिविधियों को फिर शुरू करना रिश्तों में धीरे-धीरे लौटते विश्वास का संकेत है।
व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर, लेकिन भारत की सबसे बड़ी चिंता भी यही
भारत और चीन के राजनीतिक संबंध पिछले वर्षों में खराब रहे, लेकिन आर्थिक निर्भरता लगातार बढ़ती गई।
भारत के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार लगभग 151.1 अरब डॉलर रहा। भारत ने चीन को करीब 19.47 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि चीन से लगभग 131.63 अरब डॉलर का आयात हुआ। इससे भारत का व्यापार घाटा करीब 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
यानी राजनीतिक स्तर पर चीन से दूरी बढ़ाने के बावजूद भारतीय उद्योगों की चीन पर निर्भरता समाप्त नहीं हुई।
इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन कंपोनेंट, मशीनरी, सोलर उपकरण, सक्रिय औषधीय सामग्री, रसायन और कई औद्योगिक इनपुट के लिए भारतीय कंपनियां चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं।
भारत की चिंता यह है कि यह संबंध एकतरफा न बन जाए। नई दिल्ली चीन से भारतीय फार्मास्यूटिकल, आईटी, कृषि और अन्य उत्पादों के लिए बेहतर बाजार पहुंच मांग रही है। जुलाई 2026 में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बातचीत में भी व्यापार असंतुलन और बाजार पहुंच महत्वपूर्ण मुद्दे रहे।
चीन को भारत की जरूरत क्यों?
चीन के लिए भारत केवल एक पड़ोसी देश नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में से एक है।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा, औद्योगिक मशीनरी और डिजिटल उत्पादों की मांग बढ़ रही है। चीनी कंपनियों के लिए इस बाजार से पूरी तरह बाहर रहना आर्थिक रूप से आसान नहीं है।
दूसरी ओर चीन ऐसे समय में भारत से तनाव कम करना चाहता है जब उसे अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के साथ व्यापार, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
भारत के साथ लगातार तनाव बीजिंग के लिए एक अतिरिक्त रणनीतिक मोर्चा बनाता है। यदि भारत और चीन कम से कम सीमित सहयोग और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा की स्थिति में रह सकें तो चीन के लिए एशिया में रणनीतिक दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
भारत को चीन की जरूरत क्यों?
नई दिल्ली की स्थिति भी कम जटिल नहीं है।
भारत चीन को अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौतियों में से एक मानता है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी आपूर्ति की जरूरत है।
भारत दुनिया का प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए फैक्ट्रियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनलों, बैटरी, मशीन टूल्स और अन्य उद्योगों में तेजी से निवेश चाहिए। इनमें से कई क्षेत्रों में चीनी कंपनियों की तकनीक, पूंजी या सप्लाई चेन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी कारण भारत के सामने संतुलन का कठिन सवाल है—आर्थिक अवसरों का लाभ लिया जाए, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में ऐसी निर्भरता न बने जो भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम बन जाए।
सुरक्षा को लेकर भारत की सावधानी खत्म नहीं हुई
रिश्तों में सुधार के बावजूद भारत ने चीन से जुड़े निवेश और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए सभी दरवाजे नहीं खोले हैं।
सितंबर 2026 में चीन से जुड़ी एक सीमा-पार डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भारतीय अधिकारियों की डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंतियां सामने आईं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार आर्थिक संबंधों को सामान्य करने और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना चाहती है।
इसी प्रकार चीनी कंपनियों से जुड़े कुछ पुराने टैक्स, निवेश और नियामकीय मामलों पर जांच भी जारी है। इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक रिश्तों में गर्माहट अपने आप हर कारोबारी विवाद को समाप्त नहीं करेगी।
भारत-अमेरिका रिश्तों पर क्या असर?
भारत और चीन की बढ़ती बातचीत को अमेरिका के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि नई दिल्ली लंबे समय से कहती रही है कि उसकी विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है और भारत-चीन संबंधों को किसी तीसरे देश के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Quad का सदस्य है। रक्षा, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और महत्वपूर्ण तकनीकों में भारत-अमेरिका सहयोग लगातार बढ़ा है।
इसके बावजूद भारत BRICS, SCO और अन्य मंचों पर चीन तथा रूस के साथ भी काम करता है। यही भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा है।
चीन के साथ संबंध सुधारने का अर्थ अमेरिका से दूरी बनाना जरूरी नहीं है। भारत का प्रयास संभवतः यह रहेगा कि वह पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी जारी रखते हुए चीन के साथ टकराव को नियंत्रित रखे।
BRICS Summit क्यों इतना महत्वपूर्ण?
12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit इस पूरे समीकरण के लिए बड़ा मंच बनने वाला है। भारत ने 2026 की अपनी अध्यक्षता का विषय Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability रखा है। सदस्य और साझेदार देशों के नेता वैश्विक शासन, व्यापार, वित्त, तकनीक और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
यदि मोदी और शी के बीच अलग द्विपक्षीय बैठक होती है तो सीमा प्रबंधन, व्यापार असंतुलन, निवेश, सप्लाई चेन, लोगों की आवाजाही और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे एजेंडे में रह सकते हैं।
ऐसी बैठक का महत्व किसी एक समझौते से अधिक होगा। दोनों देशों की कोशिश यह संकेत देने की हो सकती है कि वे अपने गंभीर मतभेदों के बावजूद एक ऐसा ढांचा बना सकते हैं जिसमें प्रतिस्पर्धा सीधे टकराव में न बदले।
दोस्ती नहीं, ‘competitive coexistence’?
भारत-चीन संबंधों के मौजूदा दौर को पूर्ण मेल-मिलाप कहना मुश्किल है।
दोनों देशों के हित कई जगह टकराते हैं। सीमा विवाद कायम है। भारत को चीन-पाकिस्तान रणनीतिक साझेदारी और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से आपत्ति है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति भी भारत के लिए चिंता का विषय रही है।
दूसरी तरफ बीजिंग को भारत की अमेरिका के साथ बढ़ती रक्षा और तकनीकी साझेदारी तथा Quad में उसकी भूमिका पर नजर रहती है।
मैन्युफैक्चरिंग में भी दोनों भविष्य के प्रतिस्पर्धी हैं। भारत उन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करना चाहता है जो अपनी सप्लाई चेन चीन के बाहर विविध बनाना चाहती हैं।
इसलिए आने वाले वर्षों का मॉडल संभवतः पारंपरिक दोस्ती नहीं बल्कि नियंत्रित या प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व हो सकता है—जहां व्यापार जारी रहे, शीर्ष नेतृत्व बातचीत करता रहे, सीमा पर सैन्य संकट रोका जाए लेकिन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बनी रहे।
2.8 अरब लोगों के रिश्ते का वैश्विक महत्व
भारत और चीन मिलकर दुनिया की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा रखते हैं। दोनों परमाणु शक्ति हैं, विशाल अर्थव्यवस्थाएं हैं और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
यदि दोनों देशों के बीच बड़ा सैन्य संकट पैदा होता है तो उसका असर केवल हिमालय तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन, निवेश और एशिया की सुरक्षा सभी प्रभावित हो सकते हैं।
इसके विपरीत यदि दोनों अपने मतभेदों को नियंत्रित रखते हुए व्यापार, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों पर सहयोग बढ़ाते हैं तो उनका संयुक्त प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर काफी बड़ा हो सकता है।
आगे सबसे बड़ी परीक्षा भरोसे की
भारत-चीन संबंधों की दिशा तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण शब्द अभी भी ‘विश्वास’ है।
उड़ानों का दोबारा शुरू होना, सीमा व्यापार की वापसी, कैलाश मानसरोवर यात्रा, लगातार राजनयिक वार्ता और शीर्ष नेताओं की मुलाकातें सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन 2020 के बाद पैदा हुआ अविश्वास कुछ बैठकों से समाप्त नहीं होगा।
सबसे पहले यह देखना होगा कि LAC पर शांति कितनी टिकाऊ रहती है। दूसरा, चीन भारत के व्यापार घाटे और बाजार पहुंच से जुड़ी चिंताओं पर कितना ठोस कदम उठाता है। तीसरा, भारत चीनी निवेश के लिए कितनी जगह खोलता है और किन रणनीतिक क्षेत्रों को प्रतिबंधित रखता है।
नई दिल्ली में होने वाला BRICS सम्मेलन इन सवालों का अंतिम उत्तर शायद नहीं देगा, लेकिन यह बता सकता है कि दोनों देश किस दिशा में जाना चाहते हैं।
मोदी और शी के सामने अब चुनौती रिश्तों को पुराने दौर में वापस ले जाने की नहीं, बल्कि नए नियमों के साथ एक ऐसा भारत-चीन संबंध बनाने की है जिसमें सीमा पर शांति, आर्थिक हित और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा एक साथ संभाली जा सके।
2.8 अरब लोगों से जुड़े इस रिश्ते का आकार ही इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में शामिल करता है। लेकिन इसका भविष्य बड़े घोषणापत्रों से नहीं बल्कि सीमा पर स्थिरता, व्यापार में संतुलन और दोनों सरकारों द्वारा धीरे-धीरे बहाल किए जाने वाले भरोसे से तय होगा।