भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच लगातार बढ़ रही है, लेकिन इलाज का खर्च अब भी बड़ी चिंता बना हुआ है। खासतौर पर निजी अस्पतालों में भर्ती, जांच, दवाइयों और लंबे इलाज की लागत कई परिवारों के बजट पर भारी पड़ रही है। हालिया सरकारी और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि देश में स्वास्थ्य पर जेब से होने वाला खर्च पहले के मुकाबले घटा है, लेकिन कुल स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा अभी भी परिवार खुद वहन करते हैं। इसी बीच मेडिकल महंगाई और निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत ने अफोर्डेबल हेल्थकेयर को एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है।
हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में मेडिकल महंगाई सालाना करीब 12 से 14 प्रतिशत के स्तर पर रहने का अनुमान है, जो एशिया में सबसे ऊंचे स्तरों में है। बढ़ती उपचार लागत को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में व्यापक सुधारों पर भी विचार किया जा रहा है। इनमें इलाज की दरों को मानकीकृत करना, स्वीकार्य उपचारों की एक समान सूची तैयार करना और बीमा दावों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्लेम एक्सचेंज की व्यवस्था शामिल है।
निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च ज्यादा
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के हालिया स्वास्थ्य सर्वे से पता चलता है कि निजी और सरकारी अस्पतालों के इलाज के खर्च में बड़ा अंतर बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल में भर्ती होने पर औसत जेब से खर्च सभी अस्पतालों को मिलाकर करीब ₹34,064 रहा, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह औसतन ₹6,631 और निजी अस्पतालों में करीब ₹50,508 रहा। यह अंतर बताता है कि गंभीर बीमारी या लंबे इलाज की स्थिति में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च परिवारों के लिए कितना बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है।
निजी अस्पतालों में कमरे का किराया, डॉक्टर की फीस, जांच, दवाइयां, प्रक्रिया शुल्क और अन्य मेडिकल सेवाओं की लागत अलग-अलग जुड़ती जाती है। कई बार इलाज के दौरान सामने आने वाली अतिरिक्त जरूरतों के कारण शुरुआती अनुमान से बिल काफी बढ़ सकता है।
रोजमर्रा के इलाज का खर्च भी बड़ी समस्या
स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ने के बावजूद रोजमर्रा के स्वास्थ्य खर्चों को लेकर परिवारों की चिंता बनी हुई है। कई बीमा पॉलिसियां मुख्य रूप से अस्पताल में भर्ती होने और बड़े उपचार खर्चों पर केंद्रित होती हैं। वहीं डॉक्टर की नियमित फीस, दवाइयां, जांच, फॉलो-अप और दूसरी आउटपेशेंट सेवाओं का खर्च कई मामलों में परिवारों को खुद उठाना पड़ता है।
विशेष रूप से लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों वाले मरीजों के लिए नियमित दवा और जांच का खर्च लगातार बना रहता है। ऐसे मामलों में एक बार की बड़ी अस्पताल लागत से ज्यादा मुश्किल कई बार महीनों या वर्षों तक चलने वाला रोजमर्रा का खर्च बन जाता है।
जेब से होने वाला खर्च घटा, लेकिन चिंता खत्म नहीं
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में आउट-ऑफ-पॉकेट हेल्थ एक्सपेंडिचर यानी लोगों द्वारा अपनी जेब से सीधे किया जाने वाला स्वास्थ्य खर्च कुल स्वास्थ्य खर्च के अनुपात में पिछले दशक में कम हुआ है। यह हिस्सा 2013-14 में 64.2 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत रह गया। सरकार के अनुसार सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के विस्तार से इसमें कमी आई है।
फिर भी यह अनुपात कई देशों की तुलना में ऊंचा है। PRS Legislative Research के विश्लेषण के अनुसार भारत में आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च अभी भी कुल स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा है और अधिक जेब-खर्च परिवारों पर वित्तीय दबाव बढ़ा सकता है।
स्वास्थ्य बीमा से बढ़ी उम्मीद, लेकिन कई खामियां बाकी
सरकार ने स्वास्थ्य खर्च का बोझ कम करने के लिए आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी योजनाओं का विस्तार किया है। सरकार के अनुसार जून 2026 तक 44 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके थे और योजना के तहत करोड़ों अस्पतालों में भर्ती मामलों को कवर किया गया।
हालांकि स्वास्थ्य बीमा का मतलब हर खर्च का पूरा भुगतान होना नहीं है। पॉलिसी की शर्तें, कमरे की सीमा, को-पेमेंट, गैर-चिकित्सीय खर्च और कुछ उपचारों का कवर में शामिल न होना मरीजों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है।
नई बीमा सुधार व्यवस्था पर सरकार का विचार
बढ़ती चिकित्सा लागत के बीच केंद्र स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में ऐसे सुधारों पर विचार कर रहा है जिनसे इलाज की कीमतों और बीमा दावों की प्रक्रिया में ज्यादा पारदर्शिता लाई जा सके। प्रस्तावित सुधारों में अस्पताल और इलाज की दरों को मानकीकृत करने तथा बीमा कंपनियों के बीच दावों के निपटारे को आसान बनाने के उपाय शामिल हैं।
इसका उद्देश्य मरीजों को इलाज की वास्तविक लागत समझने और बीमा दावों के निपटारे में होने वाली देरी या विवाद को कम करने में मदद करना है। हालांकि इन प्रस्तावों का अंतिम स्वरूप और उनके लागू होने की समयसीमा आगे स्पष्ट होगी।
अस्पताल बिल को लेकर पारदर्शिता की मांग
स्वास्थ्य खर्च पर बढ़ती चिंता के बीच हाल ही में एक संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों में कमरे के शुल्क को अधिक पारदर्शी और उचित बनाने की दिशा में सुझाव दिए हैं। समिति ने महानगरों में अस्पताल के कमरे के शुल्क को तीन सितारा होटलों के औसत टैरिफ के स्तर से जोड़ने का सुझाव दिया है। इसका उद्देश्य इलाज के दौरान होने वाले अत्यधिक कमरे के शुल्क को नियंत्रित करना और मरीजों को आर्थिक राहत देना है।
इसके अलावा अस्पतालों में इलाज से पहले अनुमानित लागत, अलग-अलग सेवाओं की कीमत और बिल में शामिल शुल्कों की स्पष्ट जानकारी देने की मांग भी लगातार उठती रही है।
आम परिवारों पर पड़ सकता है लंबा असर
स्वास्थ्य खर्च का सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ सकता है जिनकी नियमित आय सीमित है। किसी गंभीर बीमारी, दुर्घटना या लंबे उपचार की स्थिति में बचत का बड़ा हिस्सा इलाज में खर्च हो सकता है। कुछ मामलों में परिवारों को कर्ज लेना या संपत्ति बेचने जैसे कठिन फैसले भी लेने पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाने के लिए केवल बीमा कवरेज बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता, दवाइयों की कीमत, डायग्नोस्टिक सेवाओं की लागत और अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था पर भी लगातार ध्यान देना जरूरी है।
आगे क्या?
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन इलाज की लागत को लेकर affordability अब भी बड़ी चुनौती है। एक तरफ सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च कम हुआ है और स्वास्थ्य बीमा की पहुंच बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ निजी अस्पतालों में ऊंची लागत और मेडिकल महंगाई आम लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
आने वाले समय में स्वास्थ्य बीमा सुधार, इलाज की दरों में पारदर्शिता और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर सरकार के फैसले महत्वपूर्ण होंगे। लोगों के लिए भी इलाज से पहले अस्पताल की लागत, बीमा पॉलिसी की शर्तों और उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी रखना आर्थिक जोखिम कम करने में मदद कर सकता है।
