संस्कृति संसद में स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती का बड़ा बयान, श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति बनाने का प्रस्ताव; दो वर्षों में विदेशों में मौजूद भारतीय पांडुलिपियों की पहचान और वापसी का अभियान चलाने का आह्वान
वाराणसी। भारतीय धर्मशास्त्रों, मनुस्मृति और प्राचीन पांडुलिपियों को लेकर काशी में आयोजित संस्कृति संसद में महत्वपूर्ण विमर्श हुआ। अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य मनुस्मृति या किसी अन्य धर्मशास्त्र में संशोधन करना नहीं है, बल्कि प्राचीन ग्रंथों में कथित प्रक्षेप, मिलावट और भारत से विदेशों में पहुंचाई गई मूल पांडुलिपियों से जुड़े तथ्यों को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में संशोधन करना न उनका अधिकार है और न ही उद्देश्य। जरूरत इस बात की है कि मूल ग्रंथों और बाद में उनमें जोड़े गए अंशों के बीच अंतर को प्रमाणों के आधार पर समझा जाए और भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संपदा को वापस लाने के लिए संगठित प्रयास किया जाए।
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने संस्कृति संसद में श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता और वरिष्ठ आचार्यों के संरक्षण में एक विशेष समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। उनके अनुसार, यह समिति अगले दो वर्षों में विदेशों में उपलब्ध भारतीय पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े दस्तावेजों की पहचान करे। इसके बाद संबंधित संस्थानों और सरकार के सहयोग से उन्हें भारत वापस लाने के प्रयास किए जाएं। उन्होंने चीन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और ब्रिटेन सहित कई देशों में भारतीय पांडुलिपियों के मौजूद होने की बात कही। <Cite refs={[“turn504083search0″,”turn504083search4”]}/>
शास्त्रों में संशोधन नहीं, मूल स्वरूप की पहचान पर जोर
मनुस्मृति को लेकर चल रही बहस पर अपनी बात रखते हुए स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय धर्मशास्त्रों में समय-समय पर अलग-अलग ऋषियों और विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने ‘कलौ पराशर स्मृति’ की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुस्मृति में संशोधन करने का उनका कोई विचार नहीं है। उनका सवाल यह है कि जिन ग्रंथों के आधार पर सनातन परंपरा और हिंदू समाज पर सवाल उठाए जाते हैं, उनके मूल पाठ, ऐतिहासिक संदर्भ और अलग-अलग संस्करणों की प्रमाणिकता की जांच भी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनु और पितृसत्ता के नाम पर सनातन धर्म को कठघरे में खड़ा किया जाता है। ऐसे विमर्श का उत्तर भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि प्रमाणों और अध्ययन के आधार पर दिया जाना चाहिए। स्वामी जी ने नारी के धार्मिक-सांस्कृतिक स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस परंपरा में नारी को शक्ति और देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, उसके बारे में उठने वाले प्रश्नों का जवाब भी तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए।
उनका कहना था कि मनुस्मृति या किसी अन्य ग्रंथ के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले यह समझना आवश्यक है कि उपलब्ध पाठ किस काल का है, उसकी पांडुलिपियां कहां-कहां मौजूद हैं और अलग-अलग प्रतियों में क्या अंतर है। यदि किसी ग्रंथ में बाद के समय में कुछ अंश जोड़े गए हैं, तो उनका अध्ययन करके यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मूल पाठ क्या था और बाद में क्या परिवर्तन हुए। हालांकि, इस तरह के दावों की पुष्टि के लिए पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन, विशेषज्ञों की समीक्षा और प्रमाणिक दस्तावेज जरूरी होंगे।
विदेशों में भारतीय पांडुलिपियों की पहचान का प्रस्ताव
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की अनेक प्राचीन पांडुलिपियां देश से बाहर पहुंच गईं। उनके अनुसार, चीन, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा सहित कई देशों में भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सामग्री उपलब्ध है। उन्होंने कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी और रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन में मौजूद पांडुलिपियों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि इन दस्तावेजों की पहचान और उनके संरक्षण के लिए अलग-अलग संस्थाओं के साथ समन्वय करना होगा। विदेशों में मौजूद सामग्री का विवरण जुटाना, उसकी भाषा और विषय की पहचान करना, उसके ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन करना और फिर उसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया शुरू करना समिति के प्रमुख कार्यों में शामिल हो सकता है।
स्वामी जी ने प्रस्ताव दिया कि श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में बनने वाली समिति में पूज्य आचार्यों और विषय के जानकार विद्वानों को शामिल किया जाए। समिति किसी पूर्वाग्रह के बिना काम करे और इस विषय को केवल धार्मिक या राजनीतिक बहस तक सीमित न रखे। पांडुलिपियों की पहचान, प्रमाणिकता और ऐतिहासिक महत्व तय करने के लिए पारंपरिक विद्वानों के साथ इतिहास, भाषा विज्ञान, अभिलेखागार और पांडुलिपि संरक्षण के विशेषज्ञों का सहयोग भी महत्वपूर्ण होगा।
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर भारत सरकार के पांडुलिपि मिशन का सहयोग लिया जा सकता है। विदेश यात्राओं पर जाने वाले संतों और आचार्यों को भी इस अभियान से जोड़ा जा सकता है, ताकि अलग-अलग देशों में उपलब्ध भारतीय दस्तावेजों और पांडुलिपियों के बारे में जानकारी जुटाई जा सके।
अंग्रेजी शासन और विलियम जोन्स का किया उल्लेख
अपने संबोधन में स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने भारत में छापाखाने के आगमन और अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय धर्मशास्त्रों के संकलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1556 में गोवा के पणजी में बाइबिल के मुद्रण के लिए छापाखाने की मशीन आई थी। इससे पहले भारतीय विद्वान और ऋषि-मुनि ताड़पत्रों सहित पारंपरिक माध्यमों पर ग्रंथों का लेखन और संरक्षण करते थे।
उन्होंने वर्ष 1793 से पहले और उसके आसपास की औपनिवेशिक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेज अधिकारियों और न्यायाधीशों के सामने भारत के लोगों से जुड़े मामलों में कानून और परंपराओं के आधार पर निर्णय लेने की चुनौती थी। इसी संदर्भ में हिंदू कानून तैयार करने के उद्देश्य से भारतीय धर्मशास्त्रों और पांडुलिपियों का संग्रह किया गया। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी और विद्वान विलियम जोन्स का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में भारतीय विद्वानों और ब्राह्मणों के साथ अपमानजनक व्यवहार भी किया गया।
स्वामी जी ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रदर्शित एक चित्र का जिक्र किया। उनके अनुसार, उस चित्र में एक भारतीय ब्राह्मण को जूते के नीचे बैठा हुआ दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे चित्रों और ऐतिहासिक घटनाओं को भी सामने लाने की आवश्यकता है, ताकि औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ हुए व्यवहार को समझा जा सके।
यहां उन्होंने इतिहास के दस्तावेजों और औपनिवेशिक काल के अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि भारतीय धर्मशास्त्रों के अंग्रेजी अनुवाद और उनके संकलन की प्रक्रिया को समझे बिना मूल ग्रंथों की प्रमाणिकता और उनके अर्थ को लेकर उठने वाले विवादों का समुचित उत्तर देना कठिन होगा। इन ऐतिहासिक दावों का स्वतंत्र दस्तावेजों और अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर अध्ययन भी जरूरी है।
लोहे के बक्सों में पांडुलिपियां ले जाने का दावा
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत से बड़ी संख्या में पांडुलिपियों को एकत्र कर ब्रिटेन भेजा गया था। उन्होंने दावा किया कि इन पांडुलिपियों को लोहे के बक्सों में भरकर ले जाया गया। अपने संबोधन में उन्होंने रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन और एक ब्रिटिश अधिकारी से संबंधित पत्र का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, उस पत्र में पांडुलिपियों की वापसी को लेकर ऐसी शर्तों का जिक्र था कि संबंधित व्यक्ति जीवित लौटे तो पांडुलिपियां वापस कर दी जाएं और उसकी मृत्यु होने पर उनका उपयोग अपनी इच्छानुसार किया जा सकता है।
स्वामी जी ने कहा कि यह पत्र उनके पास उपलब्ध है और ऐसे दस्तावेजों को सार्वजनिक विमर्श में लाना चाहिए। उन्होंने इस विषय को केवल आरोप-प्रत्यारोप के रूप में देखने के बजाय उपलब्ध पत्रों, अभिलेखों और पांडुलिपियों के आधार पर जांचने की आवश्यकता बताई।
विदेशों में रखी भारतीय पांडुलिपियों की वापसी का सवाल केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। प्राचीन साहित्य, दर्शन, चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान और भाषाओं से संबंधित पांडुलिपियां भी भारत की ज्ञान परंपरा का हिस्सा हैं। ऐसे दस्तावेजों का संरक्षण और उनका अध्ययन देश के इतिहास और बौद्धिक विरासत को समझने में मदद कर सकता है। यदि प्रस्तावित समिति बनती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अलग-अलग देशों में मौजूद संग्रहों का प्रमाणिक विवरण जुटाकर संबंधित संस्थानों से औपचारिक संवाद स्थापित करे।
सनातन परंपरा पर उठने वाले सवालों का प्रमाणों से जवाब देने की बात
स्वामी जी ने कहा कि सनातन परंपरा के विभिन्न पक्षों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। उन्होंने तुलसीदास के जन्मस्थान और सूरदास के जन्मकाल को लेकर उठे विवादों का उल्लेख किया। उनका आरोप था कि कुछ विचारधाराओं से जुड़े लोगों ने भारतीय परंपराओं को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय ऐतिहासिक स्रोतों और प्रमाणों को सामने रखना चाहिए।
उन्होंने कुछ वामपंथी पत्रकारों और कथित धर्माचार्यों की ओर से सनातन परंपरा के विरुद्ध किए जा रहे विमर्श पर भी सवाल उठाए। साथ ही कुछ धर्माचार्यों के आचरण को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की। उन्होंने कहा कि संत समाज और धार्मिक नेतृत्व को अपनी परंपराओं के प्रति स्पष्ट और जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि समाज का विश्वास धार्मिक नेतृत्व के आचरण से भी जुड़ा होता है।
स्वामी जी का यह संबोधन धार्मिक परंपरा, इतिहास लेखन और वैचारिक बहस के बीच संबंधों को लेकर था। उन्होंने जोर दिया कि सनातन से जुड़े प्रश्नों का जवाब केवल नारों से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए मूल ग्रंथों, पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और विद्वानों के शोध को सामने लाना होगा। उनके अनुसार, यदि किसी ग्रंथ के मूल स्वरूप को लेकर विवाद है, तो उसका समाधान अध्ययन और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
दो साल में समिति के सामने होंगे बड़े लक्ष्य
श्रीकाशी विद्वत परिषद की अध्यक्षता में समिति गठित करने का प्रस्ताव इस पूरे विमर्श का प्रमुख बिंदु रहा। स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि समिति का प्रतिनिधित्व व्यापक होना चाहिए और उसमें अलग-अलग परंपराओं के आचार्यों तथा विद्वानों को स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि समिति को किसी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर काम करना होगा।
प्रस्ताव के अनुसार, अगले दो वर्षों में विदेशों में मौजूद भारतीय पांडुलिपियों की सूची तैयार करने, उनके संग्रहालयों और संस्थानों का पता लगाने तथा उनकी प्रमाणिकता और ऐतिहासिक महत्व का अध्ययन करने की दिशा में काम किया जाना चाहिए। इसके बाद संबंधित देशों और संस्थानों से बातचीत कर पांडुलिपियों की वापसी का प्रयास किया जा सकता है।
इस काम में कई व्यावहारिक चुनौतियां भी होंगी। विदेशों में रखी पांडुलिपियों का स्वामित्व, उनके संग्रह का इतिहास, कानूनी स्थिति, संरक्षण की दशा और उनकी वापसी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का अध्ययन करना होगा। कुछ दस्तावेज ऐसे भी हो सकते हैं जो लंबे समय से विदेशी पुस्तकालयों या विश्वविद्यालयों के संग्रह का हिस्सा हैं। ऐसे मामलों में संबंधित संस्थानों के साथ शोध, डिजिटल प्रतियों की उपलब्धता और मूल दस्तावेजों की वापसी जैसे विकल्पों पर बातचीत जरूरी होगी।
संस्कृति संसद में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर मंथन
काशी में तीन से पांच नवंबर तक आयोजित संस्कृति संसद 2026 में संतों, विद्वानों, युवाओं और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और समकालीन सामाजिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श किया। आयोजन की रूपरेखा में पारंपरिक विद्वानों के साथ नई पीढ़ी के संवाद को भी स्थान दिया गया। मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों और विदेशों में उपलब्ध भारतीय ग्रंथों की वापसी का विषय भी इस आयोजन के प्रमुख विमर्शों में शामिल रहा। <Cite refs={[“turn504083search1″,”turn504083search3″,”turn504083search5”]}/>
स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने अपने संबोधन के अंत में संतों और विद्वानों से इस विषय पर विचार रखने का आग्रह किया। उन्होंने प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी सहित उपस्थित विद्वानों से भी विमर्श को आगे बढ़ाने की अपील की। उनका कहना था कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन की बौद्धिक संपदा के संरक्षण के लिए संत समाज, विद्वानों और संस्थाओं को एक साथ आना होगा।
संस्कृति संसद में उठे इस प्रस्ताव पर अब निगाहें श्रीकाशी विद्वत परिषद और संबंधित संस्थाओं की अगली पहल पर रहेंगी। समिति के गठन, उसके सदस्यों, कार्ययोजना और विदेशों में मौजूद पांडुलिपियों की प्रमाणिक सूची तैयार करने जैसे कदम इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका घोषित उद्देश्य शास्त्रों में संशोधन करना नहीं, बल्कि कथित प्रक्षेपों की जांच, मूल पांडुलिपियों की पहचान और भारत की सांस्कृतिक-बौद्धिक विरासत को वापस लाने का अभियान शुरू करना है।
