देश में प्रस्तावित लोकसभा परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। संसद में परिसीमन से जुड़े विधायी प्रस्तावों के बाद खासकर दक्षिणी राज्यों में यह चिंता बढ़ी है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्विन्यास से राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी पर असर पड़ सकता है। तमिलनाडु इस मुद्दे पर सबसे मुखर राज्यों में सामने आया है। हाल ही में राज्य विधानसभा ने लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है।
विवाद की जड़ में यह सवाल है कि भविष्य में लोकसभा की सीटों का पुनर्निर्धारण किस आधार और किस अनुपात में किया जाएगा। मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। कानून मंत्रालय ने संसद में दिए जवाब में कहा है कि सीटों का आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार परिसीमन आयोग द्वारा किया जाएगा।
दक्षिणी राज्यों को क्यों है चिंता?
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने दशकों में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए कई नीतियां अपनाईं। अब इन राज्यों में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया गया तो जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है, उन्हें अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिल सकती हैं।
इस चिंता को दक्षिणी राज्यों के नेता राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन से जोड़ रहे हैं। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उन्हें उसके कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए।
तमिलनाडु ने क्या मांग रखी?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखने के लिए संविधान संशोधन की मांग की है। इससे पहले 12 अगस्त 2026 को तमिलनाडु विधानसभा ने भी इसी मांग से जुड़ा प्रस्ताव पारित किया था।
राज्य सरकार का कहना है कि मौजूदा प्रतिनिधित्व व्यवस्था में बदलाव करते समय उन राज्यों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लक्ष्य को प्रभावी तरीके से हासिल किया है।
केंद्र सरकार का क्या है रुख?
केंद्र सरकार ने दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व में बड़ी कमी की आशंका को खारिज किया है। अप्रैल 2026 में लोकसभा में परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि प्रस्तावित व्यवस्था से दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा। सरकार द्वारा बताए गए एक मॉडल में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 किए जाने और सभी राज्यों की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया गया था।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण भारत की मौजूदा 129 लोकसभा सीटें प्रस्तावित मॉडल में बढ़कर 195 हो सकती हैं। कुल सदन में दक्षिणी राज्यों का हिस्सा भी लगभग 24 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान दिया गया है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 और केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 होने का अनुमान बताया गया था।
543 से 816 सीटों की चर्चा क्यों?
मौजूदा लोकसभा में कुल 543 निर्वाचित सीटें हैं। सरकार की ओर से अप्रैल में चर्चा के दौरान एक समान 50 प्रतिशत वृद्धि का मॉडल सामने रखा गया था, जिसके आधार पर सदन की संख्या 816 तक पहुंच सकती है। हालांकि परिसीमन की अंतिम संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों का वास्तविक बंटवारा संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और परिसीमन आयोग के काम के बाद ही स्पष्ट होगा।
यही वजह है कि फिलहाल अलग-अलग राजनीतिक दल संभावित प्रभाव को लेकर अपने-अपने अनुमान पेश कर रहे हैं। अभी किसी राज्य के अंतिम सीट आवंटन को लेकर तस्वीर पूरी तरह निश्चित नहीं है।
राजनीतिक विवाद भी बढ़ा
परिसीमन का मुद्दा अब केवल संवैधानिक या प्रशासनिक विषय नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन चुका है। दक्षिणी राज्यों के कई नेता इसे क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे से जोड़ रहे हैं। दूसरी ओर BJP ने ऐसे तर्कों को चुनौती दी है और कहा है कि प्रस्तावित मॉडल में दक्षिणी राज्यों की सीटें घटने के बजाय बढ़ेंगी।
तमिलनाडु में पारित प्रस्ताव के बाद राज्य की राजनीति में भी मुद्दे ने जोर पकड़ा है। विभिन्न दलों के बीच परिसीमन के स्वरूप और राजनीतिक प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। इससे आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच इस विषय पर बातचीत और तेज होने की संभावना है।
2029 से पहले लागू होने को लेकर क्या स्थिति है?
केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया था कि प्रस्तावित परिसीमन से जुड़े बदलावों का 2029 से पहले होने वाले चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और तब तक चुनाव मौजूदा सीटों एवं व्यवस्था के आधार पर ही होंगे। इसका अर्थ है कि तत्काल होने वाले चुनावों के लिए सीटों के पुनर्विन्यास की स्थिति नहीं बनने वाली है।
आगे की प्रक्रिया जनगणना और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होगी। इसलिए अंतिम परिसीमन को लेकर अभी कई चरण पूरे होना बाकी हैं।
आगे क्या होगा?
लोकसभा सीटों के परिसीमन का मुद्दा आने वाले महीनों में देश की राजनीति में और महत्वपूर्ण हो सकता है। दक्षिणी राज्यों की चिंताओं के बीच केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि नई व्यवस्था में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन कैसे बनाए रखा जाएगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि भविष्य में लोकसभा का आकार कितना होगा और अलग-अलग राज्यों को कितनी सीटें मिलेंगी। अंतिम तस्वीर परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया और उपलब्ध जनगणना आंकड़ों के बाद ही स्पष्ट होगी। इस बीच तमिलनाडु समेत दक्षिणी राज्यों की मांग ने संभावित परिसीमन को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना दिया है।