भारत में इस वर्ष मानसून का बदला हुआ स्वरूप कृषि और बिजली क्षेत्र दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। मौसम वैज्ञानिक इसे “यो-यो मानसून” कह रहे हैं, क्योंकि बारिश का पैटर्न लगातार अस्थिर बना हुआ है। एक ओर लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ ही दिनों में अत्यधिक बारिश हो रही है। इस उतार-चढ़ाव वाले मौसम ने खरीफ फसलों की बुवाई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश की बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है।
इस साल मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर रही। जून महीना देश के रिकॉर्ड में सबसे शुष्क महीनों में शामिल रहा और सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। इसके बाद जुलाई की शुरुआत में अचानक कई इलाकों में भारी बारिश हुई। मुंबई जैसे शहरों में केवल एक सप्ताह के भीतर लगभग पूरे महीने के बराबर बारिश दर्ज की गई। मौसम के इस अचानक बदलते स्वरूप को वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन और मजबूत एल नीनो (El Niño) प्रभाव से जोड़ रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों के लिए केवल कुल वर्षा महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि यह भी जरूरी है कि बारिश सही समय पर और समान रूप से हो। यदि पहले लंबे समय तक सूखा रहे और फिर एक साथ अत्यधिक बारिश हो जाए, तो खेतों में पहले बोए गए बीज खराब हो सकते हैं, मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है और फसलों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।
इसका सबसे अधिक असर खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों जैसे धान, कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों पर पड़ सकता है। कई राज्यों में किसान समय पर बुवाई नहीं कर पाए, जबकि कुछ क्षेत्रों में बुवाई के बाद बारिश रुक जाने से फसलों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित हुई। बाद में हुई तेज बारिश ने कई स्थानों पर जलभराव की स्थिति भी पैदा कर दी।
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि अब भी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में मानसून की अनिश्चितता सीधे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। यदि फसल उत्पादन घटता है तो खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि और खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका भी रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार किसानों को पारंपरिक खेती के बजाय स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के अनुसार फसल प्रबंधन करना पड़ सकता है। कम पानी वाली फसलें, कम अवधि में तैयार होने वाली किस्में और वैज्ञानिक सिंचाई तकनीकें इस तरह के मौसम में नुकसान कम करने में मदद कर सकती हैं।
मानसून की अनियमितता का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। देश की बिजली व्यवस्था भी इससे प्रभावित हो रही है। लंबे सूखे के दौरान तापमान अधिक रहने से एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों का उपयोग बढ़ जाता है, जिससे बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच जाती है। दूसरी ओर पर्याप्त और नियमित वर्षा न होने से जलाशयों में पानी कम आता है, जिससे जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है।
जब बारिश अचानक बहुत अधिक होती है, तब बिजली वितरण कंपनियों को अलग चुनौती का सामना करना पड़ता है। तेज बारिश और आंधी से बिजली लाइनें, ट्रांसफॉर्मर और स्थानीय वितरण नेटवर्क प्रभावित हो सकते हैं। वहीं कुछ दिनों बाद बारिश रुकने पर फिर से गर्मी बढ़ जाती है और बिजली की मांग दोबारा तेज हो जाती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यदि मानसून इसी तरह अस्थिर बना रहा तो बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है। जलविद्युत उत्पादन में कमी की भरपाई के लिए कोयला आधारित और गैस आधारित बिजली संयंत्रों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे बिजली उत्पादन की लागत और ईंधन की मांग दोनों बढ़ सकती हैं।
मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कई हिस्सों में आने वाले दिनों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना बनी हुई है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में बारिश की कमी खरीफ फसलों की बुवाई को और प्रभावित कर सकती है।
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ मानसून का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले जहां कई दिनों तक लगातार हल्की या मध्यम बारिश होती थी, वहीं अब लंबे सूखे के बाद बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे बाढ़ और सूखे जैसी दोनों स्थितियां एक ही मौसम में देखने को मिल रही हैं।
सरकार और कृषि वैज्ञानिक किसानों को स्थानीय मौसम सलाह का पालन करने, फसल बीमा योजनाओं का लाभ लेने और परिस्थितियों के अनुसार खेती की रणनीति बदलने की सलाह दे रहे हैं। वहीं बिजली क्षेत्र में भी मांग और आपूर्ति के बेहतर प्रबंधन के लिए अतिरिक्त तैयारी की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले सप्ताहों में मानसून सामान्य नहीं हुआ तो इसका असर केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य महंगाई, ग्रामीण आय, बिजली आपूर्ति और समग्र अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है। फिलहाल मौसम विभाग लगातार मानसून की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और समय-समय पर नए पूर्वानुमान जारी कर रहा है।