कांवड़ यात्रा के दौरान सामने आई दो अलग-अलग घटनाओं ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। उत्तर प्रदेश के मेरठ में दिल्ली के कांवड़ियों की करीब 35 फीट ऊंची कांवड़ बिजली की ट्रांसमिशन लाइन के संपर्क में आ गई थी, जिससे सात श्रद्धालु झुलस गए थे। वहीं हरियाणा के फतेहाबाद में कांवड़ियों के एक समूह ने विवाद के बाद बच्चों से भरी स्कूल बस पर कथित रूप से पथराव कर दिया था।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि दोनों घटनाएं जुलाई 2024 की हैं, न कि जुलाई 2026 की नई घटनाएं। मेरठ का हादसा 30 जुलाई 2024 को और फतेहाबाद की घटना भी उसी दिन सामने आई थी। कांवड़ यात्रा के दौरान सुरक्षा और अनुशासन की चर्चा में इन मामलों का दोबारा उल्लेख किया जा रहा है।
मेरठ में हादसा दिल्ली-दून राष्ट्रीय राजमार्ग पर टीपीनगर थाना क्षेत्र के सुभारती फ्लाईओवर के पास हुआ था। दिल्ली के शालीमार गार्डन क्षेत्र के हैदरपुर गांव से करीब 15 कांवड़ियों का समूह हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहा था। समूह के साथ लगभग 35 फीट ऊंची सजावटी कांवड़ थी, जिसे एक वाहन पर तैयार किया गया था।
सुभारती फ्लाईओवर के पास से बिजली की 220 केवी ट्रांसमिशन लाइन गुजरती है। ऊंची कांवड़ इस लाइन के नजदीक पहुंची और उसमें अचानक बिजली का करंट उतर गया। प्रत्यक्ष जानकारी के अनुसार, कांवड़ में आग भी लग गई और आसपास मौजूद श्रद्धालुओं में अफरा-तफरी मच गई। घटना में सात कांवड़िये झुलस गए थे।
घायलों की पहचान अमन, करण, सनी, मटुवा, विष्णु, इंद्र और गुरेज के रूप में बताई गई थी। सभी को तत्काल चिकित्सा सहायता के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। एक घायल की स्थिति अधिक गंभीर होने के कारण उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी।
यह हादसा केवल बिजली आपूर्ति या ट्रांसमिशन लाइन से जुड़ी दुर्घटना नहीं था। इससे अत्यधिक ऊंची कांवड़, डीजे वाहन और सजावटी ढांचे लेकर चलने वाले जत्थों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी प्रश्न उठे। हाईटेंशन या ट्रांसमिशन लाइन को छूना आवश्यक नहीं होता; अत्यधिक वोल्टेज वाली लाइन के बहुत करीब पहुंचने पर भी विद्युत प्रवाह का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
ऐसे में कांवड़ की ऊंचाई निर्धारित करना, मार्ग पर मौजूद बिजली की लाइनों का पहले से निरीक्षण करना और खतरनाक हिस्सों में पुलिस तथा बिजली विभाग की संयुक्त निगरानी आवश्यक मानी जाती है। बड़े ढांचों के साथ यात्रा करने वाले आयोजकों की भी जिम्मेदारी होती है कि वे निर्धारित ऊंचाई और प्रशासनिक निर्देशों का पालन करें।
दूसरी घटना हरियाणा के फतेहाबाद जिले के रतिया क्षेत्र में सामने आई थी। आरोप था कि कांवड़ियों के एक समूह ने बच्चों को लेकर जा रही स्कूल बस पर पथराव और तोड़फोड़ की। विवाद उस समय शुरू हुआ जब स्कूल बस कथित रूप से कांवड़ियों के वाहन या कांवड़ के संपर्क में आ गई। इसके बाद मौके पर कहासुनी हुई और स्थिति हिंसक हो गई।
घटना के दौरान बस में स्कूली बच्चे मौजूद थे। राहत की बात यह रही कि पथराव में किसी छात्र के घायल होने की सूचना नहीं मिली थी। हालांकि बस के शीशे और अन्य हिस्से क्षतिग्रस्त हुए तथा बच्चों के बीच भय का माहौल बन गया था।
घटना से नाराज स्कूल बस चालकों ने सड़क पर प्रदर्शन करते हुए आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। पुलिस ने दो नामजद आरोपियों और लगभग 30 से 40 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोपों की अंतिम सत्यता और व्यक्तिगत भूमिका का निर्धारण पुलिस जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना था।
कांवड़ यात्रा धार्मिक आस्था और भगवान शिव के प्रति समर्पण से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार और अन्य पवित्र स्थानों से गंगाजल लेकर अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों तक पैदल या वाहनों से यात्रा करते हैं। इतने बड़े आयोजन के दौरान प्रशासन विशेष मार्ग, यातायात परिवर्तन, चिकित्सा सहायता, विश्राम शिविर और सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
इसके बावजूद किसी धार्मिक यात्रा में शामिल होना किसी व्यक्ति को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं देता। सड़क दुर्घटना, वाहन से मामूली टक्कर या कांवड़ को नुकसान पहुंचने की स्थिति में पुलिस और प्रशासन को सूचना दी जानी चाहिए। बच्चों से भरी बस या किसी अन्य वाहन पर हमला करना यात्रियों की जान को खतरे में डाल सकता है।
फतेहाबाद की घटना ने भीड़ के बीच अफवाह, उत्तेजना और तत्काल हिंसक प्रतिक्रिया के खतरे को सामने रखा। ऐसी स्थिति में कुछ लोगों की कार्रवाई पूरे धार्मिक आयोजन की छवि को प्रभावित कर सकती है। इसलिए कांवड़ समितियों और समूह संचालकों की भूमिका केवल यात्रा आयोजित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें अपने साथ चलने वाले लोगों को कानून, सड़क सुरक्षा और शांतिपूर्ण व्यवहार के बारे में स्पष्ट निर्देश देने चाहिए।
स्कूल बस जैसे वाहनों के लिए भी यात्रा मार्गों पर विशेष व्यवस्था जरूरी है। प्रशासन को स्कूलों के समय, कांवड़ मार्गों और यातायात दबाव को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक मार्ग तय करने चाहिए। स्कूल प्रबंधन और वाहन चालकों को भी भीड़ वाले मार्गों पर अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
मेरठ की घटना तकनीकी और प्रशासनिक सुरक्षा की कमी की ओर ध्यान खींचती है, जबकि फतेहाबाद की घटना सार्वजनिक अनुशासन और कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला थी। दोनों घटनाओं की प्रकृति अलग थी, लेकिन उनका साझा संदेश यही है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में केवल पुलिस तैनाती पर्याप्त नहीं होती।
सुरक्षित आयोजन के लिए पुलिस, यातायात विभाग, बिजली विभाग, स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और कांवड़ समितियों के बीच समन्वय आवश्यक है। ऊंची कांवड़ और डीजे वाहनों के मार्गों का पहले से निरीक्षण किया जाना चाहिए। बिजली की लाइनों, फ्लाईओवर, संकरे रास्तों और रेलवे क्रॉसिंग जैसे संवेदनशील स्थानों की पहचान कर वहां विशेष निगरानी रखी जानी चाहिए।
कांवड़ यात्रियों को खुले विद्युत तारों, ट्रांसमिशन लाइनों और बिजली के खंभों से सुरक्षित दूरी बनाए रखनी चाहिए। बारिश या गीली सड़क की स्थिति में बिजली से जुड़ा खतरा और बढ़ सकता है। वाहनों पर अत्यधिक ऊंचे लोहे के ढांचे लगाने से भी बचना चाहिए।
प्रशासन को हिंसा या तोड़फोड़ की किसी घटना पर तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई करनी चाहिए। कार्रवाई किसी समुदाय या धार्मिक यात्रा के विरुद्ध नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आपराधिक कृत्य के आधार पर होनी चाहिए। इसी तरह अपुष्ट वीडियो या दावों के आधार पर पूरे समूह को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है।
कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से यात्रा पूरी करते हैं। कुछ दुर्घटनाओं या हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए पहले से तैयारी, नियमों का कठोर पालन और आयोजकों की जवाबदेही आवश्यक है। धार्मिक आस्था की गरिमा तभी सुरक्षित रह सकती है जब यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के साथ-साथ स्थानीय निवासियों, बच्चों, वाहन चालकों और अन्य नागरिकों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाए।
मेरठ और फतेहाबाद की जुलाई 2024 की इन घटनाओं ने यह दिखाया था कि छोटी लापरवाही या अचानक उपजा विवाद गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। भविष्य की कांवड़ यात्राओं में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रशासनिक सतर्कता के साथ व्यक्तिगत अनुशासन भी उतना ही जरूरी रहेगा।
