• Home  
  • UPSC की ‘गरीब’ लिस्ट पर उठे सवाल! एलीट स्कूल, MNC जॉब और कारोबारी परिवारों से आए कई EWS चयनित
- Education - National - राष्ट्रीय

UPSC की ‘गरीब’ लिस्ट पर उठे सवाल! एलीट स्कूल, MNC जॉब और कारोबारी परिवारों से आए कई EWS चयनित

UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS कोटा के तहत चयनित उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस बार EWS कोटे से चयनित कई उम्मीदवार ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि सामान्य गरीब वर्ग की […]

UPSC कार्यालय और EWS कोटा विवाद से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर

UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS कोटा के तहत चयनित उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस बार EWS कोटे से चयनित कई उम्मीदवार ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि सामान्य गरीब वर्ग की छवि से मेल नहीं खाती। इनमें एलीट प्राइवेट स्कूलों से पढ़े छात्र, महंगे कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले अभ्यर्थी, MNC में काम कर चुके उम्मीदवार और कारोबारी परिवारों से आने वाले युवा शामिल बताए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में कुल 958 उम्मीदवारों का चयन हुआ, जिनमें से 104 उम्मीदवार EWS कोटे के तहत चयनित हुए। EWS कोटा उन सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए बनाया गया था जिनके परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपये से कम है और जो निर्धारित संपत्ति शर्तों के दायरे में आते हैं। लेकिन जांच में कई चयनित उम्मीदवारों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 104 EWS चयनित उम्मीदवारों में से बड़ी संख्या ने प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों से तैयारी की। कई अभ्यर्थियों ने दिल्ली और अन्य शहरों के चर्चित कोचिंग संस्थानों जैसे Vajiram & Ravi, Drishti IAS, Vajirao & Reddy, ForumIAS, NextIAS और अन्य संस्थानों से पढ़ाई की। कुछ संस्थानों की सालाना फीस लाखों रुपये तक बताई जाती है।

जांच के मुताबिक, कम से कम 64.4 प्रतिशत EWS चयनित उम्मीदवारों ने प्रसिद्ध कोचिंग संस्थानों से तैयारी की। वहीं कुल मिलाकर 104 में से 84 उम्मीदवारों ने किसी न किसी तरह की औपचारिक कोचिंग ली थी। यह आंकड़ा इसलिए चर्चा में है क्योंकि UPSC की तैयारी पहले से ही महंगी मानी जाती है और कोचिंग, रहने-खाने, टेस्ट सीरीज और अध्ययन सामग्री पर भारी खर्च होता है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 44.4 प्रतिशत चयनित उम्मीदवारों ने निजी स्कूलों में पढ़ाई की थी। इनमें कई ऐसे स्कूल भी शामिल बताए गए हैं जहां वार्षिक फीस एक लाख रुपये से अधिक हो सकती है। इसके अलावा करीब 26.9 प्रतिशत उम्मीदवारों के माता-पिता का संबंध व्यवसाय या कारोबार से बताया गया है। वहीं 9.6 प्रतिशत उम्मीदवार कॉर्पोरेट सेक्टर या MNC में काम कर चुके थे।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि EWS सूची में ऐसे उम्मीदवार भी शामिल हैं जो वास्तव में कठिन आर्थिक परिस्थितियों से निकलकर सफल हुए। इनमें सुरक्षा गार्ड के बेटे, रेलवे पोर्टर की बेटी और बस कंडक्टर के बेटे जैसे उदाहरण भी शामिल हैं। यानी पूरी सूची पर सवाल उठाना सही नहीं होगा, लेकिन कई मामलों ने व्यवस्था की जांच प्रक्रिया पर बहस जरूर शुरू कर दी है।

EWS आरक्षण की शुरुआत 2019 में हुई थी। इसका उद्देश्य सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अवसर देना था। इसके तहत 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। पात्रता के लिए परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम होनी चाहिए। साथ ही कुछ संपत्ति संबंधी शर्तें भी लागू होती हैं।

विवाद का मुख्य सवाल यही है कि क्या केवल आय प्रमाण पत्र के आधार पर किसी उम्मीदवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही आकलन किया जा सकता है? कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में आय को छिपाना या कम दिखाना कठिन नहीं है, खासकर तब जब आय असंगठित क्षेत्र, कारोबार या नकद लेन-देन से जुड़ी हो। ऐसे में वास्तविक आर्थिक कमजोरी और कागजी पात्रता के बीच बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।

UPSC जैसे प्रतिष्ठित और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा में आरक्षण का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को अवसर देना है जो संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। लेकिन यदि आर्थिक रूप से बेहतर पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार इस श्रेणी का लाभ लेने लगें, तो इससे योजना का वास्तविक उद्देश्य कमजोर हो सकता है।

रिपोर्ट के बाद UPSC और EWS प्रमाण पत्र जारी करने वाली व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। UPSC उम्मीदवारों से प्रमाण पत्र लेता है, लेकिन आय और संपत्ति की वास्तविक जांच प्रायः स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर होती है। ऐसे में यदि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया कमजोर है तो अंतिम चयन सूची में विवादित मामले सामने आ सकते हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि EWS कोटे में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए केवल आय प्रमाण पत्र पर्याप्त नहीं होना चाहिए। परिवार की संपत्ति, स्कूलिंग बैकग्राउंड, आय स्रोत, कोचिंग खर्च, माता-पिता का पेशा और जीवनशैली जैसे संकेतकों की भी जांच होनी चाहिए। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि महंगी कोचिंग लेने का मतलब हमेशा अमीरी नहीं होता, क्योंकि कई छात्र कर्ज, रिश्तेदारों की मदद या स्कॉलरशिप से भी तैयारी करते हैं।

इस पूरे मामले ने UPSC अभ्यर्थियों के बीच भी बहस छेड़ दी है। कई छात्रों का कहना है कि EWS प्रमाण पत्र की जांच कठोर होनी चाहिए ताकि वास्तविक जरूरतमंद उम्मीदवारों का हक न मारा जाए। वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि किसी उम्मीदवार की पृष्ठभूमि देखकर सीधे उसकी पात्रता पर सवाल उठाना उचित नहीं है, जब तक कि प्रमाण पत्र फर्जी साबित न हो।

फिलहाल यह मामला EWS आरक्षण की विश्वसनीयता और जांच प्रक्रिया को लेकर बड़ा सवाल बन गया है। यदि सरकार और संबंधित एजेंसियां समय रहते प्रमाण पत्र सत्यापन प्रणाली को मजबूत नहीं करतीं, तो भविष्य में ऐसे विवाद और बढ़ सकते हैं। UPSC जैसी परीक्षा में पारदर्शिता बेहद जरूरी है, क्योंकि यह केवल चयन प्रक्रिया नहीं बल्कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में भरोसे का सवाल भी है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About Us

We are a trusted news portal delivering the latest updates, breaking news, and in-depth stories from around the world. Our goal is to keep you informed, every time.

 

Address : 18/587, behind : Hanuman Mandir, opposite :Lucknow, Uttar Pradesh, India , 226016

Email Us: up24networkk@gmail.com

Contact: +91 95111 50055

Quick Link

Top Categories

Pushpa Technosoft  @2024. All Rights Reserved.