अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर पाकिस्तान में असहजता बढ़ती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि जिस पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की थी, वह अब खुद को किनारे लगा हुआ महसूस कर रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक वार्ताओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को उम्मीद थी कि अंतिम शांति समझौते में इस भूमिका को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिलेगी। लेकिन घटनाक्रम ने अचानक अलग मोड़ ले लिया।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर फ्रांस में हुए और पाकिस्तान को इस प्रक्रिया से लगभग बाहर रखा गया। कई रिपोर्टों के अनुसार समझौते की डिजिटल साइनिंग भी पाकिस्तान को जानकारी दिए बिना पूरी कर ली गई। इससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक अपेक्षाओं को बड़ा झटका लगा।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की विदेश नीति अक्सर व्यक्तिगत समीकरणों और तात्कालिक रणनीतिक हितों पर आधारित दिखाई देती है। यही वजह है कि किसी देश को एक समय महत्वपूर्ण भूमिका मिलने के बावजूद अगले ही क्षण प्राथमिकता सूची में पीछे धकेला जा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ट्रंप ने G7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने मोदी को “टफ नेगोशिएटर” बताया और भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम चरण में बताया। साथ ही उन्होंने भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में भी सराहा।
भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी, व्यापार वार्ता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग ने भी पाकिस्तान की चिंताओं को बढ़ाया है। पाकिस्तान के लिए यह संदेश स्पष्ट माना जा रहा है कि केवल अस्थायी कूटनीतिक सफलता दीर्घकालिक अमेरिकी समर्थन की गारंटी नहीं होती।
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका, चीन, खाड़ी देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन ट्रंप जैसे अप्रत्याशित नेता के दौर में यह संतुलन बनाए रखना और कठिन हो सकता है।
फिलहाल अमेरिका-ईरान समझौते और G7 कूटनीति के बाद पाकिस्तान के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी भूमिका को कैसे परिभाषित करे और बदलते वैश्विक समीकरणों में अपनी प्रासंगिकता कैसे बनाए रखे। वहीं भारत-अमेरिका संबंधों की मजबूती ने दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को और दिलचस्प बना दिया है।