अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद इजराइल की राजनीति में बड़ा भूचाल देखने को मिल रहा है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान को अपने देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं। उन्होंने कई वर्षों तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को रोकने को अपनी विदेश और सुरक्षा नीति का मुख्य आधार बनाया। लेकिन अब अमेरिका-ईरान समझौते के बाद उनके आलोचक दावा कर रहे हैं कि नेतन्याहू की वर्षों पुरानी रणनीति को बड़ा झटका लगा है। इजराइली पत्रकार गिदोन लेवी ने इसे नेतन्याहू की व्यक्तिगत और राजनीतिक हार बताते हुए कहा कि अमेरिका-ईरान समझौते ने उनके “लाइफ प्रोजेक्ट” को असफल कर दिया है।
यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया लंबे समय से युद्ध, हमलों और समुद्री तनाव से जूझ रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने G7 शिखर सम्मेलन से पहले दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो चुका है। इस समझौते का उद्देश्य संघर्ष को रोकना, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। हालांकि समझौते के कई बिंदु अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
नेतन्याहू के लिए यह स्थिति इसलिए मुश्किल मानी जा रही है क्योंकि उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा ईरान-विरोधी रुख पर आधारित रहा है। उन्होंने बार-बार कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना इजराइल के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। लेकिन अब अमेरिका ने ईरान के साथ बातचीत और समझौते का रास्ता चुना है। इससे यह संकेत गया है कि वाशिंगटन सैन्य दबाव के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहा है। यही बात इजराइल के अंदर नेतन्याहू के विरोधियों को हमले का मौका दे रही है।
इजराइल में विपक्षी नेताओं और विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता नेतन्याहू की रणनीतिक विफलता है। पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी नेता यायर लैपिड ने कहा कि उभरता हुआ अमेरिका-ईरान समझौता इजराइल के किसी भी युद्ध लक्ष्य को पूरा नहीं करता। उनके अनुसार ईरान की सरकार बनी हुई है, उसका मिसाइल कार्यक्रम बरकरार है और वह भविष्य में अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा आगे बढ़ा सकता है। लैपिड ने इसे नेतन्याहू की असफलता बताते हुए कहा कि इजराइल को निर्णायक जीत नहीं मिली।
नेतन्याहू ने अपनी ओर से इन आरोपों को खारिज करने की कोशिश की है। उन्होंने दावा किया कि इजराइल ने ईरान के खिलाफ महत्वपूर्ण सैन्य सफलता हासिल की है और देश को बड़े खतरे से बचाया है। उन्होंने यह भी कहा कि इजराइल अपनी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से लेबनान, गाजा और सीरिया में कार्रवाई की स्वतंत्रता बनाए रखेगा। हालांकि उन्होंने अमेरिका-ईरान समझौते को सीधे चुनौती देने से बचते हुए इसे ट्रम्प का फैसला बताया।
इसके बावजूद इजराइल के भीतर नाराजगी कम नहीं हुई है। कई दक्षिणपंथी नेताओं और नेतन्याहू समर्थकों को भी चिंता है कि यह समझौता ईरान को राहत दे सकता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि प्रतिबंधों में ढील मिलने से ईरान को आर्थिक सांस मिल सकती है, जिसका उपयोग वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों और मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत करने में कर सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका का दावा है कि किसी भी राहत से पहले ईरान की प्रतिबद्धताओं की कड़ी निगरानी होगी।
सबसे बड़ा सवाल लेबनान और हिजबुल्लाह को लेकर है। अमेरिका-ईरान समझौते में क्षेत्रीय तनाव कम करने और संघर्ष रोकने की बात की जा रही है, लेकिन इजराइल का कहना है कि वह दक्षिणी लेबनान से तुरंत पीछे नहीं हटेगा। इजराइली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने भी कहा है कि इजराइली सेना सुरक्षा क्षेत्रों में बनी रहेगी। इससे साफ है कि समझौते के बावजूद जमीन पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
गिदोन लेवी जैसे आलोचकों का कहना है कि नेतन्याहू की पूरी राजनीतिक छवि इस दावे पर बनी थी कि वे ही ईरान को रोक सकते हैं। लेकिन यदि अमेरिका और ईरान समझौते के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, तो यह दिखाता है कि इजराइल निर्णायक रूप से एजेंडा तय करने की स्थिति में नहीं रहा। उनके अनुसार नेतन्याहू ने वर्षों तक ईरान को सैन्य रूप से कुचलने की नीति को आगे बढ़ाया, लेकिन अंत में अमेरिका ने कूटनीति का रास्ता चुना। यही वजह है कि इसे उनके “लाइफ प्रोजेक्ट” की विफलता कहा जा रहा है।
इस समझौते से अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में भी नई जटिलता आ सकती है। नेतन्याहू और ट्रम्प राजनीतिक रूप से लंबे समय से करीब माने जाते रहे हैं, लेकिन ईरान समझौते ने दोनों के बीच मतभेद को सामने ला दिया है। नेतन्याहू ने खुद स्वीकार किया कि कई मुद्दों पर वे और ट्रम्प हमेशा एक राय नहीं रखते। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि इजराइल की सुरक्षा रणनीति काफी हद तक अमेरिकी समर्थन पर निर्भर करती है।
G7 शिखर सम्मेलन में भी अमेरिका-ईरान समझौता बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कई वैश्विक नेताओं ने तनाव कम करने की कोशिशों का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही समझौते की स्थिरता और लागू करने की प्रक्रिया पर सवाल भी उठाए हैं। यूरोपीय देशों ने कहा है कि ईरान की प्रतिबद्धताओं की सख्त निगरानी जरूरी होगी। वहीं ट्रम्प इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहे हैं।
भारत के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता का सीधा असर तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और ऊर्जा कीमतों पर पड़ता है। भारत ने भी अमेरिका-ईरान समझौते का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इससे क्षेत्र में शांति और नौवहन की स्वतंत्रता मजबूत होगी। इसलिए यह केवल इजराइल या ईरान का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी है।
फिलहाल नेतन्याहू के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उन्हें अपने घरेलू समर्थकों को यह विश्वास दिलाना है कि इजराइल ने ईरान के खिलाफ रणनीतिक सफलता हासिल की है। दूसरी तरफ उन्हें अमेरिका से टकराव से भी बचना है, क्योंकि वाशिंगटन के समर्थन के बिना इजराइल की सुरक्षा नीति कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि वे समझौते की खुली आलोचना करने के बजाय अपनी सैन्य उपलब्धियों पर जोर दे रहे हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिका-ईरान समझौते ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। यह समझौता सफल होगा या नहीं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि इसने नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को मुश्किल बना दिया है। जिन मुद्दों पर वे वर्षों से अपनी मजबूत नेता वाली छवि बनाते रहे, वही मुद्दा अब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।