G7 शिखर सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्वागत किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी संघर्ष ने दुनिया भर में आर्थिक अस्थिरता पैदा की है और कई देशों में जनहानि हुई है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बनी सहमति क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि भारत अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने को लेकर बनी समझ को स्वागतयोग्य मानता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस समझौते का प्रभावी क्रियान्वयन क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत शेष मुद्दों पर भी स्थायी और टिकाऊ समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद करता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी अधिकारियों ने हाल ही में युद्ध समाप्त करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर प्रारंभिक समझौते की घोषणा की है। समझौते को औपचारिक रूप देने के लिए इस सप्ताह स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना जताई गई है।
पिछले 100 दिनों से अधिक समय तक चले संघर्ष का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा। तेल की कीमतों, वैश्विक सप्लाई चेन और समुद्री व्यापार पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिला। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव ने ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी थी। भारत जैसे देशों के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति में स्थिरता आ सकती है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार भी सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है। भारत लंबे समय से संवाद और कूटनीति के माध्यम से विवादों के समाधान की वकालत करता रहा है और प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान भी उसी नीति को दर्शाता है।
G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की कई विश्व नेताओं से मुलाकात होने की संभावना है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ संभावित बैठक में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात पर चर्चा हो सकती है। ऐसे में अमेरिका-ईरान समझौते का मुद्दा भी प्रमुख विषयों में शामिल रहने की संभावना है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस समझौते का स्वागत किया है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों और कई अन्य वैश्विक नेताओं ने इसे क्षेत्रीय तनाव कम करने और वैश्विक आर्थिक स्थिरता बहाल करने की दिशा में सकारात्मक कदम बताया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की वास्तविक सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए इस समझौते का महत्व केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है। पश्चिम एशिया में शांति और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य गतिविधियां बहाल होने से भारत के ऊर्जा आयात, व्यापारिक गतिविधियों और समुद्री सुरक्षा पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। यही वजह है कि नई दिल्ली इस समझौते को उम्मीद की नजर से देख रही है।