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Abortion Rights पर SC का बड़ा बयान, महिला की सहमति जरूरी

Abortion Rights पर SC का ऐतिहासिक फैसला: महिला की मर्जी सर्वोपरि, नाबालिग को 30 हफ्ते में गर्भपात की अनुमति Supreme Court of India ने शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को महिला के प्रजनन अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता को सर्वोपरि मानते हुए एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने एक नाबालिग को 30 हफ्ते की गर्भावस्था को चिकित्सीय […]

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Abortion Rights पर SC का ऐतिहासिक फैसला: महिला की मर्जी सर्वोपरि, नाबालिग को 30 हफ्ते में गर्भपात की अनुमति

Supreme Court of India ने शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को महिला के प्रजनन अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता को सर्वोपरि मानते हुए एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने एक नाबालिग को 30 हफ्ते की गर्भावस्था को चिकित्सीय रूप से समाप्त करने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला—खासतौर पर नाबालिग—को उसकी मर्जी के बिना मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

नाबालिग की स्वायत्तता को दी प्राथमिकता

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइंया की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि नाबालिग की प्रजनन स्वायत्तता को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए—खासकर तब, जब वह गर्भावस्था जारी रखने के लिए अनिच्छुक है। अदालत ने कहा कि इस मामले में यह देखना जरूरी है कि नाबालिग क्या चाहती है, न कि यह कि गर्भावस्था किस परिस्थिति में हुई।

सहमति या अपराध—मुद्दा नहीं, महिला की इच्छा अहम

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सवाल यह नहीं है कि नाबालिग रेप के कारण गर्भवती हुई या सहमति से संबंध के कारण, बल्कि असल मुद्दा यह है कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या नहीं। पीठ ने माना कि अवैध बच्चे को जन्म देने से सामाजिक कलंक के कारण नाबालिग को गंभीर मानसिक आघात हो सकता है—इस तर्क से अदालत ने सहमति जताई।

30 हफ्तों में भी गर्भपात क्यों संभव

अदालत ने यह भी कहा कि यदि कानून के तहत 24 हफ्तों तक गर्भपात संभव है, तो विशिष्ट परिस्थितियों में 30 हफ्तों में भी अनुमति दी जा सकती है—खासतौर पर जब नाबालिग स्वयं गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।
जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि ऐसा आदेश देना आसान नहीं है, क्योंकि जन्म लेने वाला बच्चा भी अंततः एक जीवन है, लेकिन महिला की इच्छा और मानसिक स्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

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