• Home  
  • बबलू श्रीवास्तव को सीबीआई कोर्ट से बड़ी राहत
- court news - UttarPradesh

बबलू श्रीवास्तव को सीबीआई कोर्ट से बड़ी राहत

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित सीबीआई अदालत ने अंडरवर्ल्ड डॉन ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को करीब 27 साल पुराने मामले में दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने माना कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अभियोजन पक्ष के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। यह मामला प्रयागराज की नैनी जेल […]

सीबीआई कोर्ट से बबलू श्रीवास्तव दोषमुक्त

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित सीबीआई अदालत ने अंडरवर्ल्ड डॉन ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को करीब 27 साल पुराने मामले में दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने माना कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अभियोजन पक्ष के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। यह मामला प्रयागराज की नैनी जेल में बंद रहते हुए मोबाइल फोन के जरिए गिरोह संचालित करने, कारोबारियों को धमकी देने और रंगदारी मांगने के आरोपों से जुड़ा था। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतिभा सिंह की अदालत ने बबलू श्रीवास्तव को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

इस मामले को कुछ रिपोर्टों में कोलकाता के होटल लिंगटन के मालिक के अपहरण की साजिश से भी जोड़कर बताया गया है। अभियोजन का आरोप था कि बबलू श्रीवास्तव नैनी जेल में बंद होने के बावजूद अपने गिरोह के सदस्यों के संपर्क में था और जेल के भीतर से ही आपराधिक गतिविधियों को संचालित कर रहा था। हालांकि, अदालत में अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि कथित फोन कॉल बबलू श्रीवास्तव ने ही किए थे या वह जेल से गिरोह चला रहा था।

नैनी जेल से गिरोह चलाने का था आरोप

मामले की जड़ वर्ष 1998-99 के घटनाक्रम से जुड़ी है। आरोप था कि प्रयागराज की नैनी सेंट्रल जेल में बंद रहने के दौरान बबलू श्रीवास्तव मोबाइल फोन के माध्यम से अपने गिरोह के सदस्यों से संपर्क करता था। जांच एजेंसी का दावा था कि जेल के भीतर से ही वह बाहर मौजूद सहयोगियों को निर्देश देता था और कारोबारियों को धमकाकर उनसे रंगदारी वसूलने की गतिविधियों में शामिल था।

इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि बबलू श्रीवास्तव जेल के भीतर मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा है और जेल से बाहर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिलवा रहा है। इसमें कुछ जेलकर्मियों की कथित भूमिका का भी सवाल उठाया गया था। हाईकोर्ट ने 1 फरवरी 1999 को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया था।

इसके बाद सीबीआई ने जांच शुरू की। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि बबलू श्रीवास्तव के सहयोगी कथित तौर पर फर्जी नाम-पते पर सिम कार्ड हासिल कर जेल तक पहुंचाते थे। इन सिम कार्ड के जरिए वह बाहर मौजूद लोगों से संपर्क करता था और कारोबारियों को धमकाने तथा रंगदारी मांगने का काम करता था। हालांकि, अदालत में इन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करना अभियोजन की जिम्मेदारी थी।

सीबीआई ने दाखिल की थी चार्जशीट

जांच पूरी करने के बाद सीबीआई ने 9 अक्टूबर 2001 को बबलू श्रीवास्तव के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। इसके बाद 13 अक्टूबर 2003 को अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 385, 387 और 506 के तहत आरोप तय किए। ये धाराएं भय दिखाकर जबरन वसूली, गंभीर धमकी और आपराधिक भयादोहन जैसे अपराधों से संबंधित थीं।

मुकदमे की सुनवाई लंबे समय तक चली। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 51 गवाहों को अदालत में पेश किया। लेकिन इनमें से 13 गवाह अपने पूर्व बयानों से मुकर गए। कुछ महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही भी अभियोजन के आरोपों को मजबूती नहीं दे सकी। अदालत ने गवाहों के बयानों, तकनीकी साक्ष्यों और जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद अपना फैसला सुनाया।

मोबाइल फोन और सिम कार्ड बरामद नहीं कर सकी जांच एजेंसी

अदालत में बचाव पक्ष ने जांच की कमियों को प्रमुखता से उठाया। बबलू श्रीवास्तव की ओर से अधिवक्ता जीशान अल्वी ने दलील दी कि सीबीआई यह साबित नहीं कर सकी कि जेल के भीतर से कथित धमकी भरे फोन कॉल बबलू श्रीवास्तव ने ही किए थे। जांच एजेंसी न तो कथित मोबाइल फोन बरामद कर सकी और न ही संबंधित सिम कार्ड को आरोपी से जोड़ने वाला ठोस साक्ष्य पेश कर पाई।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी की आवाज का नमूना लेकर उसका वैज्ञानिक परीक्षण नहीं कराया गया। ऐसे में कथित फोन कॉल में बोलने वाले व्यक्ति की पहचान स्थापित नहीं हो सकी। अदालत ने साक्ष्यों की समीक्षा के दौरान इन कमियों को महत्वपूर्ण माना।

अदालत के सामने यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए सिम कार्ड जेल के भीतर किस माध्यम से पहुंचे और उनका इस्तेमाल किस व्यक्ति ने किया। केवल यह आरोप कि जेल में रहते हुए आरोपी गिरोह चला रहा था, उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

कॉल रिकॉर्ड से भी साबित नहीं हुई आवाज की पहचान

मुकदमे में कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR को भी साक्ष्य के रूप में पेश किया गया था। अभियोजन का प्रयास था कि फोन कॉल के रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी को कथित धमकी और रंगदारी के मामलों से जोड़ा जाए। हालांकि, अदालत ने माना कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि किसी मोबाइल नंबर से किस समय दूसरे नंबर पर कॉल की गई, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि कॉल किस व्यक्ति ने की थी।

कॉल करने वाले की पहचान स्थापित करने के लिए अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। अदालत के सामने ऐसा कोई पर्याप्त वैज्ञानिक या स्वतंत्र साक्ष्य नहीं आया, जो कथित कॉल को सीधे बबलू श्रीवास्तव से जोड़ सके।

अभियोजन के कुछ गवाहों ने भी अदालत में आरोपी की आवाज पहचानने में असमर्थता जताई। एक महत्वपूर्ण गवाह ने कहा कि कथित कॉल करने वाले ने अपना नाम बबलू श्रीवास्तव बताया था, लेकिन वह आवाज को आरोपी की आवाज के रूप में पहचान नहीं सका। अदालत ने इस पहलू को भी अभियोजन के मामले की कमजोरी माना।

अदालत ने कहा- आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए

सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। अदालत के अनुसार, अभियोजन का कथानक विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया और रिकॉर्ड पर ऐसा ठोस साक्ष्य नहीं था, जिसके आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सके।

इसी आधार पर अदालत ने बबलू श्रीवास्तव को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने 20 हजार रुपये का जमानती बंधपत्र दाखिल करने का निर्देश भी दिया और कहा कि यदि फैसले के खिलाफ अपील होती है तो आरोपी अपीलीय अदालत के नोटिस पर उपस्थित होगा।

बरी होने के बावजूद जेल से रिहाई नहीं

इस फैसले के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बबलू श्रीवास्तव अब जेल से बाहर आएंगे? इस मामले में दोषमुक्त होने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें सभी मामलों में रिहा कर दिया गया है। वह एक अन्य गंभीर आपराधिक मामले में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे हैं।

बबलू श्रीवास्तव को 24 मार्च 1993 को प्रयागराज में कस्टम विभाग के अतिरिक्त कलेक्टर एलडी अरोड़ा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। विशेष टाडा अदालत ने 30 सितंबर 2008 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 25 जनवरी 2011 को इस सजा को बरकरार रखा था। वह वर्तमान में बरेली सेंट्रल जेल में बंद हैं।

नवंबर 2024 में समय से पहले रिहाई की मांग से जुड़ी उनकी याचिका भी खारिज हो चुकी है। बाद में राज्यपाल के स्तर पर उनकी दया याचिका स्वीकार नहीं की गई। ऐसे में लखनऊ की सीबीआई अदालत से इस पुराने मामले में मिली राहत का उनकी मौजूदा उम्रकैद की सजा पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।

लंबे मुकदमे के बाद आया फैसला

करीब तीन दशक पुराने इस मामले में फैसला आने के बाद एक बार फिर जेल के भीतर से अपराध संचालित करने के आरोपों और जांच एजेंसियों द्वारा जुटाए जाने वाले तकनीकी साक्ष्यों पर चर्चा शुरू हो गई है। अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि कथित फोन कॉल, सिम कार्ड और आरोपी के बीच विश्वसनीय संबंध स्थापित नहीं किया जा सका।

बबलू श्रीवास्तव को इस मामले में दोषमुक्त किया गया है, लेकिन उनके खिलाफ दूसरे मामलों और पहले से मिली सजा की कानूनी स्थिति अलग है। इसलिए इस फैसले को उनकी सभी आपराधिक सजाओं से मुक्ति या जेल से रिहाई के रूप में देखना सही नहीं होगा।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

About Us

We are a trusted news portal delivering the latest updates, breaking news, and in-depth stories from around the world. Our goal is to keep you informed, every time.

 

Address : 18/587, behind : Hanuman Mandir, opposite :Lucknow, Uttar Pradesh, India , 226016

Email Us: up24networkk@gmail.com

Contact: +91 95111 50055

Quick Link

Top Categories

UP24Network. All Rights Reserved.