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स्कूल के ऊपर हाईटेंशन लाइन, करंट से छात्र की मौत

बलिया। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सरकारी स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। गड़वार थाना क्षेत्र के कनैला गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय नवीन पोखरा में 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से कक्षा चार के छात्र अरशद […]

हाईटेंशन लाइन की चपेट में छात्र की मौत

बलिया। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सरकारी स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। गड़वार थाना क्षेत्र के कनैला गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय नवीन पोखरा में 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से कक्षा चार के छात्र अरशद अहमद की मौत हो गई। आरोप है कि मध्याह्न भोजन के लिए लौकी तोड़ने के लिए छात्र को विद्यालय के रसोईघर की छत पर भेजा गया था, जहां ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से उसकी जान चली गई। घटना के बाद गांव में आक्रोश फैल गया और परिजनों तथा ग्रामीणों ने विद्यालय परिसर में विरोध प्रदर्शन किया।

इस घटना ने एक साथ दो विभागों की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल बेसिक शिक्षा विभाग और विद्यालय प्रबंधन से है कि आखिर बच्चे को ऐसी जगह पर क्यों भेजा गया, जहां जानलेवा बिजली की लाइन गुजर रही थी। दूसरा सवाल बिजली विभाग से है कि स्कूल जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थान के पास से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की लाइन की सुरक्षा को लेकर समय रहते आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए। मामले में शिक्षा विभाग ने दो शिक्षकों को निलंबित किया है, शिक्षामित्र की सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई है और पुलिस ने तीनों शिक्षाकर्मियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। बिजली विभाग के संबंधित अवर अभियंता को भी निलंबित किए जाने की कार्रवाई सामने आई है।

मिड-डे मील के लिए लौकी तोड़ने छत पर गया था अरशद

घटना 2 नवंबर 2026 की सुबह करीब नौ बजे की बताई गई है। मृतक अरशद अहमद बलिया जिले के विशुकिया गांव निवासी इजहार अहमद का पुत्र था और कनैला स्थित प्राथमिक विद्यालय नवीन पोखरा में कक्षा चार का छात्र था।

पुलिस और मीडिया में सामने आई जानकारी के मुताबिक, विद्यालय में मध्याह्न भोजन यानी मिड-डे मील के लिए लौकी की जरूरत थी। आरोप है कि इसी के लिए अरशद को बांस की सीढ़ी के सहारे विद्यालय के रसोईघर की छत पर लौकी तोड़ने भेजा गया था। छत पर पहुंचकर वह लौकी तोड़ रहा था, तभी वहां से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आ गया। करंट लगने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के बाद विद्यालय में मौजूद बच्चों में चीख-पुकार मच गई। जानकारी मिलने पर परिजन और ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। एक बच्चे की स्कूल परिसर में इस तरह मौत होने से गांव में भारी नाराजगी फैल गई। ग्रामीणों ने विद्यालय प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

परिजनों का आरोप है कि बच्चे को छत पर भेजना गंभीर लापरवाही थी। यदि उसे लौकी तोड़ने के लिए वहां नहीं भेजा जाता तो शायद यह हादसा नहीं होता। इस आरोप की जांच पुलिस कर रही है। किसी भी आरोपित की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायालय में साक्ष्यों के आधार पर होगा।

स्कूल परिसर में ग्रामीणों का विरोध, मुआवजे की मांग

हादसे की खबर फैलने के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण और मृतक के परिजन विद्यालय परिसर में एकत्र हो गए। लोगों ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ नाराजगी जताई और प्रशासन से जवाब मांगा। ग्रामीणों की प्रमुख मांग थी कि बच्चे की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए।

प्रदर्शन के दौरान परिवार के लिए एक करोड़ रुपये मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग भी उठाई गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन, पुलिस, बेसिक शिक्षा विभाग और बिजली विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने परिजनों की बात सुनी और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया।

घटना के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। इस पूरे प्रकरण ने सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, शिक्षकों की जिम्मेदारी और विद्यालय परिसर में मौजूद खतरों की पहचान करने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

बीएसए ने प्रधानाध्यापक और सहायक शिक्षक को किया निलंबित

मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने विभागीय स्तर पर कार्रवाई की। गड़वार शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय नवीन पोखरा के प्रभारी प्रधानाध्यापक विजय शंकर और सहायक अध्यापक अनिल कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

विभागीय जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई प्रथम दृष्टया शिथिल पर्यवेक्षण और अपने दायित्वों के निर्वहन में उदासीनता के आधार पर की गई। मामले की विस्तृत जांच के लिए भी निर्देश दिए गए। वहीं, विद्यालय में तैनात शिक्षामित्र दीपचंद राम की सेवा समाप्त करने के लिए ग्राम शिक्षा समिति को पत्र भेजा गया।

यह कार्रवाई विभागीय स्तर पर की गई है। निलंबन का अर्थ आपराधिक दोष सिद्ध होना नहीं है। पुलिस की जांच और न्यायालय की प्रक्रिया अलग है। दोनों स्तरों पर तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाएगी।

तीनों शिक्षाकर्मी गिरफ्तार, न्यायिक हिरासत में भेजे गए

छात्र की मौत के मामले में पुलिस ने मृतक के भाई सलमान की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया। शिकायत में विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक विजय शंकर, सहायक अध्यापक अनिल कुमार, शिक्षामित्र दीपचंद राम और बिजली विभाग के अवर अभियंता को नामजद किया गया।

पुलिस ने 3 नवंबर को कार्रवाई करते हुए प्रभारी प्रधानाध्यापक विजय शंकर, सहायक अध्यापक अनिल कुमार और शिक्षामित्र दीपचंद राम को गिरफ्तार कर लिया। तीनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। Ballia News+2

पुलिस की कार्रवाई के बाद मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें आपराधिक जिम्मेदारी की जांच भी शुरू हो गई है। पुलिस को यह पता लगाना है कि बच्चे को छत पर भेजने का निर्णय किसने लिया था, उस समय विद्यालय में कौन-कौन मौजूद था और क्या किसी ने छत के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइन के खतरे को नजरअंदाज किया था।

बिजली विभाग के अवर अभियंता के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उनकी गिरफ्तारी की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे और विभागीय कार्रवाई को अलग-अलग समझना जरूरी है।

बिजली विभाग के अवर अभियंता पर भी गिरी गाज

इस घटना के बाद बिजली विभाग ने भी अपने स्तर पर कार्रवाई की है। 4 नवंबर को सामने आई जानकारी के अनुसार, पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के आजमगढ़ क्षेत्र के मुख्य अभियंता ने संबंधित अवर अभियंता रामनारायण यादव को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

विभागीय जांच में विद्यालय की बाउंड्री से 11 केवी विद्युत लाइन की क्षैतिज दूरी और ग्राउंड क्लीयरेंस निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाने की बात कही गई है। विभागीय आदेश में संबंधित अधिकारी पर अपने क्षेत्र की बिजली लाइनों का नियमित निरीक्षण नहीं करने, संवेदनशील स्थानों के पास मौजूद लाइनों को चिह्नित कर आवश्यक सुरक्षा कार्रवाई नहीं कराने और लाइन शिफ्टिंग का प्रस्ताव समय पर उच्चाधिकारियों तक नहीं पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं।

इसके अलावा बिजली लाइनों के नियमित अनुरक्षण को लेकर जारी निर्देशों के अनुपालन में भी कमी का उल्लेख किया गया है। विभाग ने इसे गंभीर कर्तव्यहीनता मानते हुए निलंबन की कार्रवाई की है। Purvanchal24

इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि हादसे के बाद बिजली विभाग की जवाबदेही भी जांच के केंद्र में आ गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित लाइन की स्थिति पहले से विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज थी या नहीं और यदि खतरे की जानकारी थी तो उसे दूर करने के लिए क्या प्रयास किए गए थे।

11 हजार वोल्ट की लाइन स्कूल के पास कैसे पहुंची?

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विद्यालय के रसोईघर के पास से गुजर रही हाईटेंशन लाइन है। 11 हजार वोल्ट की बिजली लाइन सामान्य घरेलू बिजली के तारों की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक होती है। इसके संपर्क में आने से गंभीर विद्युत दुर्घटना हो सकती है।

ऐसे में किसी विद्यालय, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक स्थान के आसपास बिजली की लाइन की स्थिति और निर्धारित सुरक्षा दूरी का पालन बेहद जरूरी है। संबंधित विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि भवनों और बिजली लाइनों के बीच तकनीकी मानकों के अनुरूप दूरी बनी रहे।

इस मामले में विभागीय निरीक्षण में लाइन की दूरी और ग्राउंड क्लीयरेंस को लेकर खामी सामने आने की जानकारी है। इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि स्कूल परिसर के पास बिजली लाइन की स्थिति असुरक्षित थी तो पहले इसका समाधान क्यों नहीं किया गया।

स्थानीय स्तर पर लाइन हटाने के लिए पहले शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, शिकायत की तारीख, शिकायतकर्ता, संबंधित कार्यालय और उस पर हुई कार्रवाई का पूरा आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए इस पहलू की जांच जरूरी है।

यदि शिकायतें दर्ज थीं तो यह भी पता लगाना होगा कि उन पर किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की और लाइन को सुरक्षित करने या दूसरी जगह स्थानांतरित करने की प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं हुई।

बीएसए के निरीक्षण और शिक्षा विभाग की निगरानी पर सवाल

इस घटना के बाद बेसिक शिक्षा विभाग की निरीक्षण व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकारी विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल प्रधानाध्यापक या सहायक अध्यापक की जिम्मेदारी नहीं है। संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी और जिला स्तर के अधिकारियों की निगरानी भी महत्वपूर्ण होती है।

विद्यालय परिसर में भवनों की स्थिति, रसोईघर, बिजली कनेक्शन, छत, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का निरीक्षण किया जाना चाहिए। खासतौर पर ऐसे खतरों की पहचान जरूरी है जिनसे बच्चों की जान को नुकसान पहुंच सकता है।

यदि विद्यालय की रसोईघर की छत के पास से 11 हजार वोल्ट की लाइन गुजर रही थी तो यह स्थिति पहले निरीक्षण में सामने क्यों नहीं आई? क्या विद्यालय की सुरक्षा से संबंधित कोई रिपोर्ट तैयार की गई थी? क्या इस खतरे को दूर करने के लिए शिक्षा विभाग ने बिजली विभाग को कभी पत्र लिखा था?

इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल बीएसए ने विद्यालय के दो शिक्षकों को निलंबित किया है और शिक्षामित्र की सेवा समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। लेकिन घटना के व्यापक कारणों की जांच में शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।

मिड-डे मील के लिए बच्चों से काम कराने पर भी सवाल

इस घटना ने मध्याह्न भोजन योजना के संचालन से जुड़े एक दूसरे महत्वपूर्ण सवाल को भी सामने ला दिया है। विद्यालयों में मिड-डे मील का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और उनकी स्कूल में उपस्थिति को प्रोत्साहित करना है। इसके संचालन और भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी निर्धारित व्यवस्था के तहत संबंधित कर्मचारियों की होती है।

बच्चों को भोजन तैयार करने के लिए सब्जियां तोड़ने, सामान लाने या किसी अन्य जोखिमपूर्ण काम में लगाना उनकी सुरक्षा के लिहाज से गंभीर चिंता का विषय है। विशेष रूप से छत पर चढ़ाना, सीढ़ी का इस्तेमाल कराना या बिजली की लाइन के पास भेजना किसी भी स्थिति में सामान्य विद्यालयी गतिविधि नहीं माना जा सकता।

इस मामले में आरोप है कि अरशद को मिड-डे मील के लिए लौकी तोड़ने भेजा गया था। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह विद्यालय प्रबंधन की जिम्मेदारी और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर लापरवाही का मामला होगा।

अब जांच के केंद्र में होंगे ये सवाल

अरशद की मौत के बाद प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि विद्यालय की छत और हाईटेंशन लाइन के बीच वास्तविक दूरी कितनी थी और क्या लाइन निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप थी।

इसके साथ ही बिजली विभाग के निरीक्षण रिकॉर्ड, लाइन के रखरखाव से जुड़े दस्तावेज, संभावित शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई की जांच जरूरी है। विद्यालय में बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था थी और शिक्षकों ने बच्चे को छत पर भेजने से पहले जोखिम का आकलन किया था या नहीं, यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।

घटना के बाद शिक्षकों के निलंबन, शिक्षामित्र की सेवा समाप्ति की प्रक्रिया, तीन शिक्षाकर्मियों की गिरफ्तारी और अवर अभियंता के निलंबन जैसी कार्रवाइयां हुई हैं। लेकिन इन कदमों के साथ यह भी जरूरी है कि पूरे जिले और प्रदेश के अन्य सरकारी विद्यालयों में ऐसी ही परिस्थितियों की पहचान की जाए।

एक हादसे ने खोल दी स्कूल सुरक्षा व्यवस्था की पोल

बलिया के कनैला गांव की यह घटना केवल एक विद्यालय तक सीमित सवाल नहीं छोड़ती। प्रदेश में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल ऐसे भवनों में संचालित होते हैं जहां बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा संसाधनों की नियमित जांच आवश्यक है।

स्कूल परिसर में बिजली की लाइन, जर्जर भवन, खुली वायरिंग, असुरक्षित छत या अन्य जोखिम मौजूद हों तो उनकी पहचान कर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। बच्चों को ऐसे स्थानों से दूर रखने के लिए शिक्षकों और कर्मचारियों को भी स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए।

अरशद अहमद की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकारी विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी आखिर किस स्तर पर तय होती है। क्या केवल घटना के बाद निलंबन और गिरफ्तारी से ऐसी दुर्घटनाएं रुक जाएंगी, या विभागों को पहले से मौजूद खतरों की पहचान और समाधान के लिए स्थायी व्यवस्था भी बनानी होगी?

अब निगाहें पुलिस की जांच, बिजली विभाग की विभागीय कार्रवाई और बेसिक शिक्षा विभाग की विस्तृत जांच पर हैं। इस मामले में सबसे जरूरी है कि हादसे के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारियों का निष्पक्ष निर्धारण हो तथा भविष्य में किसी दूसरे बच्चे की जान इस तरह जोखिम में न पड़े।

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