ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के एक दिन बाद साफ कहा है कि वह दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के तहत मांगे जा रहे पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बोरा ने कहा कि वह स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट यानी SEM के समक्ष पेश होंगी, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध के अपने संवैधानिक अधिकार को सीमित करने वाली किसी शर्त को स्वीकार नहीं करेंगी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर को नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी शो-कॉज नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में उनसे पूछा गया था कि जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उनसे 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार क्यों न लिया जाए।
नेहा बोरा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह बॉन्ड साइन नहीं करेंगी और इस कार्रवाई को आगे भी कानूनी रूप से चुनौती देंगी। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति जताने का अधिकार नागरिकों को संविधान से मिलता है तथा ऐसी निवारक कार्यवाही का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी विरोध प्रदर्शन को पहले ही “शांति भंग” की संभावित स्थिति मान लिया जाए तो लोकतांत्रिक असहमति की वास्तविक गुंजाइश कहां बचेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें शांति बनाए रखने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन “शांति” का अर्थ सरकार से असहमति न जताना नहीं हो सकता। उनका कहना था कि विरोध का अधिकार जारी रहेगा और AISA ऐसी प्रक्रिया को सामान्य बनाने में सहयोग नहीं करेगा जिसे संगठन लोकतांत्रिक प्रदर्शन सीमित करने वाला मानता है। ये नेहा बोरा और AISA के राजनीतिक तथा कानूनी तर्क हैं; दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी इस व्याख्या को स्वीकार करते हुए नोटिस रद्द नहीं किया है।
मामला 16 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध कार्यक्रमों से जुड़ा है।
उस दिन नेहा बोरा को मंडी हाउस क्षेत्र से एहतियाती हिरासत में लिया गया था। पुलिस की कार्रवाई ऐसे समय हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध के बीच ‘लहरा दो तिरंगा’ अभियान को लेकर दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन की तैयारी थी। CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को भी उसी दिन निवारक कार्रवाई में हिरासत में लिया गया था।
नेहा बोरा को 17 अक्टूबर की सुबह रिहा कर दिया गया, लेकिन उसी दिन उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 126 और 130 के तहत निवारक कार्यवाही शुरू करते हुए नोटिस जारी किया गया।
नोटिस में उनसे स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होकर यह बताने के लिए कहा गया कि उनसे 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार लेकर जांच की अवधि में शांति बनाए रखने की गारंटी क्यों न ली जाए।
BNSS की धारा 126 ऐसी स्थिति से संबंधित है जिसमें कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक शांति को प्रभावित कर सकता है या ऐसा कार्य कर सकता है जिससे सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो।
ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति से यह बताने को कह सकता है कि उससे निर्धारित अवधि के लिए शांति बनाए रखने का बॉन्ड क्यों न लिया जाए।
धारा 130 के तहत मजिस्ट्रेट को इस प्रक्रिया के लिए लिखित आदेश जारी करना होता है जिसमें प्राप्त सूचना का सार, बॉन्ड की राशि, अवधि और आवश्यक जमानतदार जैसी जानकारी दर्ज की जाती है।
यह प्रक्रिया किसी आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि जैसी नहीं है।
यह निवारक यानी preventive कार्रवाई है, जिसका उद्देश्य कथित रूप से भविष्य में संभावित शांति भंग को रोकना है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में इसी अंतर पर जोर देते हुए कहा कि इस तरह की कार्यवाही punitive यानी दंडात्मक नहीं बल्कि preventive प्रकृति की होती है।
नेहा बोरा ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उनके खिलाफ जारी नोटिस अस्पष्ट, तथ्यात्मक रूप से गलत और पर्याप्त सामग्री के बिना जारी किया गया है।
उनकी ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि निवारक शक्तियों का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा है और इससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) तथा अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले अधिकार प्रभावित होते हैं।
अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है।
हालांकि ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं।
संविधान सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
इसी बिंदु पर वर्तमान विवाद का मूल प्रश्न खड़ा होता है—क्या नेहा बोरा के खिलाफ की गई निवारक कार्रवाई सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित कानूनी कदम है या शांतिपूर्ण विरोध पर जरूरत से अधिक प्रतिबंध।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल इस प्रारंभिक चरण में पुलिस और SEM की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है।
जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद की पीठ ने पाया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने कार्यवाही शुरू करने के लिए कुछ ठोस सामग्री उपलब्ध थी और मामला केवल सुनी-सुनाई जानकारी पर आधारित नहीं था।
कोर्ट के अनुसार SEM ने 17 अक्टूबर के पुलिस कलंदरा के साथ तीन अलग-अलग जनरल डायरी एंट्री और तीन गवाहों के बयान पर विचार किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि शो-कॉज नोटिस जारी करने के शुरुआती चरण में SEM से किसी पूर्ण तथ्य-जांच आयोग की तरह जांच करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
इस स्तर पर यह देखना पर्याप्त है कि मजिस्ट्रेट के सामने ऐसी सामग्री मौजूद थी या नहीं जिसके आधार पर उसे शांति भंग की आशंका के संबंध में राय बनाने का आधार मिल सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट इस प्रारंभिक स्तर पर SEM की जगह बैठकर यह तय नहीं करेगा कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त रूप से सही थी या उसकी राय सर्वोत्तम थी।
न्यायिक हस्तक्षेप तब अधिक स्पष्ट रूप से जरूरी हो सकता है जब कार्यवाही पूरी तरह बिना किसी सामग्री के शुरू की गई हो या कानून में निर्धारित प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन हुआ हो।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार नेहा बोरा ने BNSS की धारा 163 के तहत लागू निषेधात्मक आदेश का उल्लंघन किया था, जबकि उन्हें इसकी चेतावनी दी गई थी।
नेहा बोरा की ओर से दलील दी गई थी कि मंडी हाउस संबंधित निषेधाज्ञा के क्षेत्र में नहीं आता था।
कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि 24 अगस्त का आदेश बाराखंभा रोड और तिलक मार्ग पुलिस थाना क्षेत्रों को कवर करता था, जिनमें मंडी हाउस भी आता है।
हालांकि हाईकोर्ट ने केवल याचिका खारिज कर पुलिस को खुली छूट नहीं दी।
अदालत ने SEM को कई महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन करने का निर्देश भी दिया है।
कोर्ट ने कहा कि नेहा बोरा के खिलाफ जिस सामग्री पर भरोसा किया जा रहा है, वह उन्हें उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वह कार्यवाही में अपना प्रभावी जवाब दे सकें।
यही हाईकोर्ट आदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि कोर्ट ने नेहा बोरा को शांति भंग करने का दोषी घोषित कर दिया है।
न ही अदालत ने अंतिम रूप से यह आदेश दिया है कि उन्हें हर स्थिति में तत्काल बॉन्ड साइन करना ही होगा।
कोर्ट ने केवल वर्तमान चरण में शो-कॉज नोटिस और निवारक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार किया है।
आगे SEM को स्वतंत्र रूप से सामग्री और बोरा के जवाब पर विचार करना होगा।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से BNSS की धारा 135 के महत्व पर भी ध्यान दिलाया।
अदालत ने कहा कि SEM को यह विचार करना होगा कि क्या जांच की शुरुआत में ही बॉन्ड लिया जाना आवश्यक है या जांच के दौरान ऐसी परिस्थितियां सामने आने पर अंतरिम बॉन्ड की आवश्यकता बनती है।
धारा 135(3) उन स्थितियों से संबंधित है जहां चल रही जांच के दौरान तत्काल उपाय की जरूरत महसूस होने पर शांति बनाए रखने के लिए अंतरिम बॉन्ड का आदेश दिया जा सकता है।
इसके लिए कारण लिखित रूप से दर्ज किए जाने चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने निवारक कार्यवाही संबंधी फैसलों में स्थापित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।
अर्थात केवल नोटिस जारी होने से बॉन्ड अपने आप अनिवार्य नहीं हो जाता।
मजिस्ट्रेट को कानून के तहत स्वतंत्र रूप से यह तय करना होता है कि वास्तव में बॉन्ड की आवश्यकता क्यों है और क्या संबंधित परिस्थितियां ऐसा कदम उठाने को उचित ठहराती हैं।
नेहा बोरा ने इसी पहलू को शनिवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने पक्ष के महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में रखा।
उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने SEM को उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा रही सामग्री उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं और वह उस सामग्री को देखने तथा जवाब देने के बाद कार्यवाही को आगे चुनौती देंगी।
उनका कहना है कि अभी तक उन्हें यह पर्याप्त रूप से नहीं बताया गया कि उनका कौन सा कार्य वास्तविक रूप से शांति भंग करने वाला था।
नेहा बोरा ने यह भी कहा कि वह SEM के सामने उपस्थित होंगी।
इसलिए उनका मौजूदा रुख अदालत या मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने से इनकार का नहीं बल्कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर न करने का है।
उन्होंने कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया में हिस्सा लेंगी, संबंधित सामग्री मांगेंगी और आवश्यकता पड़ने पर आगे न्यायिक उपाय अपनाएंगी।
मामले में एक अन्य विवाद 16 अक्टूबर के प्रदर्शन के वास्तविक कार्यक्रम को लेकर भी है।
पुलिस की ओर से कार्यवाही में कहा गया है कि नेहा बोरा ने लोगों को कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था।
बोरा ने इस आरोप को चुनौती देते हुए कहा है कि उन्होंने मंडी हाउस में अलग शांतिपूर्ण सभा का आह्वान किया था और वह वहीं से हिरासत में ली गईं।
हाईकोर्ट ने इस चरण में इन सभी तथ्यात्मक विवादों का अंतिम फैसला नहीं किया।
उसने केवल यह देखा कि SEM के पास कार्यवाही शुरू करने लायक सामग्री उपलब्ध थी या नहीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके वर्तमान अवलोकन केवल शो-कॉज नोटिस की वैधानिकता के सीमित प्रश्न तक हैं और आगे की कार्यवाही में संबंधित पक्षों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
इसी वजह से हाईकोर्ट का फैसला नेहा बोरा के खिलाफ अंतिम आपराधिक निष्कर्ष नहीं है।
उनके खिलाफ निवारक कार्यवाही अभी जारी है।
SEM को पुलिस सामग्री, गवाहों और बोरा के जवाब का परीक्षण करना होगा।
इसके बाद यह तय होगा कि बॉन्ड की आवश्यकता है या नहीं और यदि है तो किस अवधि और शर्तों के साथ।
अदालत ने यह भी कहा है कि कार्यवाही के अलग-अलग चरणों पर बोरा के पास कानून में उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने का अधिकार रहेगा, जिसमें अंतिम आदेश के बाद चुनौती का विकल्प भी शामिल है।
नेहा बोरा और AISA का कहना है कि पीस बॉन्ड व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध करने वाले लोगों के खिलाफ सामान्य उपकरण नहीं बनना चाहिए।
उनका तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार, चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करना अपने आप सार्वजनिक शांति के लिए खतरा नहीं माना जा सकता।
वहीं दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का आधार यह है कि प्रदर्शन ऐसे क्षेत्र और परिस्थितियों में हुआ जहां निषेधात्मक आदेश लागू थे और पहले की घटनाओं तथा उपलब्ध पुलिस सामग्री के आधार पर आगे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।
दोनों पक्षों के इन तर्कों का अंतिम परीक्षण अभी SEM की कार्यवाही और आगे संभावित न्यायिक समीक्षा में होना बाकी है।
यह पूरा मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR को लेकर पिछले कई दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों की व्यापक श्रृंखला से जुड़ा है।
दिल्ली में CJP और विभिन्न छात्र संगठनों के प्रदर्शनों के दौरान कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को निवारक हिरासत में लिया गया है।
CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को भी पहले इसी तरह की निवारक कार्यवाही के बाद शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया था।
नेहा बोरा का मामला अलग कानूनी कार्यवाही है और उनकी ओर से अब बॉन्ड साइन करने से साफ इनकार किया गया है।
इस घटनाक्रम ने “पीस बॉन्ड” की कानूनी व्यवस्था और राजनीतिक प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन पर नया विवाद खड़ा कर दिया है।
निवारक कानून का उद्देश्य संभावित हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को घटना से पहले रोकना है, लेकिन ऐसी शक्तियां नागरिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती हैं।
इसी कारण अदालतें समय-समय पर इस प्रकार की कार्यवाही में कारण दर्ज करने, सामग्री उपलब्ध कराने, व्यक्तिगत सुनवाई और न्यायिक उपाय जैसे सुरक्षा प्रावधानों पर जोर देती रही हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के ताजा आदेश का भी यही दोहरा प्रभाव है।
एक तरफ अदालत ने SEM के शो-कॉज नोटिस को इस चरण पर रद्द नहीं किया और माना कि कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त प्रारंभिक सामग्री थी।
दूसरी ओर अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिए कि नेहा बोरा को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाली सामग्री दी जाए और बॉन्ड की आवश्यकता को स्वतः मान लेने के बजाय SEM कानून के तहत स्वतंत्र रूप से विचार करे।
इसलिए हाईकोर्ट का फैसला केवल “नेहा बोरा को पीस बॉन्ड साइन करने का आदेश” कहकर प्रस्तुत करना अधूरा होगा।
अदालत ने उनकी नोटिस के खिलाफ याचिका खारिज की है, लेकिन बॉन्ड पर अंतिम निर्णय की प्रक्रिया SEM के सामने जारी है।
इसी तरह नेहा बोरा का “मैं बॉन्ड नहीं साइन करूंगी” बयान भी वर्तमान राजनीतिक और कानूनी रुख है। आगे SEM क्या आदेश देता है और उस आदेश को किस अदालत में चुनौती दी जाती है, यह अगले चरण में स्पष्ट होगा।
24 अक्टूबर की स्थिति में नेहा बोरा ने अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई है।
उन्होंने कहा है कि वह SEM के सामने जाएंगी, लेकिन शांति बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी और आवश्यकता पड़ने पर इस प्रक्रिया के खिलाफ आगे भी अदालत जाएंगी।
अब नजर SEM के सामने होने वाली अगली कार्यवाही पर है।
वहीं इस विवाद का व्यापक कानूनी प्रश्न भी बना हुआ है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाई गई निवारक शक्तियों और संविधान से मिले शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच सीमा कहां निर्धारित की जानी चाहिए।