कुशीनगर जिले के तमकुहीराज क्षेत्र में औषधि विभाग की छापेमारी के दौरान बिना वैध लाइसेंस संचालित किए जा रहे एक मेडिकल स्टोर का मामला सामने आया है। स्थानीय शिकायत में दावा किया गया कि जिस लाइसेंसधारक के आधार पर पहले दुकान संचालित होती थी, उसकी करीब तीन वर्ष पहले मौत हो चुकी थी, इसके बावजूद मेडिकल स्टोर पर दवाओं की बिक्री जारी थी। शुक्रवार को औषधि विभाग की टीम ने पुलिस बल की मौजूदगी में दुकान की जांच की तो मौके पर मौजूद व्यक्ति वैध औषधि विक्रय लाइसेंस और दवाओं की खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
कार्रवाई कुशीनगर के पटहेरवा चौराहे के पास नवजीवन इंटर कॉलेज रोड स्थित मेडिकल स्टोर पर की गई। औषधि विभाग के अनुसार मुखबिर से मिली गोपनीय सूचना और शिकायत के आधार पर मामले की जानकारी उप जिलाधिकारी तमकुहीराज को दी गई। इसके बाद उनके निर्देश पर औषधि निरीक्षक नवीन कुमार पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और दुकान की जांच शुरू की।
जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि मेडिकल स्टोर पर कोई स्पष्ट साइन बोर्ड भी नहीं लगा हुआ था। दुकान के भीतर बड़ी मात्रा में एलोपैथिक दवाएं रखी मिलीं। अधिकारियों ने मौके पर मौजूद व्यक्ति से मेडिकल स्टोर का लाइसेंस, दवाओं की खरीद से संबंधित बिल, बिक्री रिकॉर्ड और अन्य आवश्यक अभिलेख दिखाने के लिए कहा, लेकिन वह वैध लाइसेंस और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
मौके पर मौजूद व्यक्ति ने अपना नाम नियाज बारिश बताया। उपलब्ध विभागीय विवरण के अनुसार वह पटहेरवा का रहने वाला है और उसके पिता का नाम स्वर्गीय शब्बीर अहमद वारसी बताया गया है। मौजूदा कार्रवाई में विभाग को दवाओं के भंडारण और बिक्री के लिए आवश्यक वैध लाइसेंस प्रस्तुत नहीं किया गया।
यहीं से उस स्थानीय शिकायत को भी बल मिला जिसमें कहा गया था कि पूर्व लाइसेंसधारक की मृत्यु काफी पहले हो चुकी है, इसके बावजूद दुकान से दवाओं की बिक्री चलती रही। हालांकि विभाग की वर्तमान सार्वजनिक जानकारी में पूर्व लाइसेंस की पूरी फाइल, उसकी वैधता की अवधि और लाइसेंसधारक की मृत्यु की तारीख का विस्तृत रिकॉर्ड अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए यह हिस्सा स्थानीय शिकायत और विभागीय जांच के दायरे में है।
छापेमारी के दौरान दुकान में लगभग 80 हजार रुपये मूल्य की एलोपैथिक दवाएं मिलीं। औषधि विभाग ने इन दवाओं को नियमानुसार सूचीबद्ध करने के बाद सील कर दिया। इसके अलावा दो दवाओं को संदिग्ध मानते हुए उनके नमूने जांच के लिए लिए गए हैं। इन नमूनों को परीक्षण के लिए राजकीय विश्लेषक प्रयोगशाला, अलीगंज, लखनऊ भेजा जाएगा।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी दवा का नमूना प्रयोगशाला जांच के लिए भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह दवा नकली या घटिया सिद्ध हो चुकी है।
दवाओं की गुणवत्ता, उनमें निर्धारित सक्रिय तत्वों की मात्रा और अन्य तकनीकी मानकों की जांच प्रयोगशाला में की जाएगी। रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि नमूने मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।
इसलिए वर्तमान कार्रवाई का प्रमाणित आधार मुख्य रूप से बिना वैध लाइसेंस दवाओं का भंडारण और बिक्री तथा खरीद-बिक्री से जुड़े अभिलेख प्रस्तुत न कर पाना है।
औषधि विभाग ने शेष दवाओं को निर्धारित प्रपत्र पर दर्ज कर सील किया है। विभागीय रिपोर्ट के अनुसार यह कार्रवाई प्रपत्र-16 के तहत रिकॉर्ड तैयार कर की गई। जांच की अन्य औपचारिकताएं पूरी होने के बाद सक्षम न्यायालय में परिवाद दाखिल करने की प्रक्रिया की जाएगी।
औषधि निरीक्षक नवीन कुमार ने स्पष्ट किया है कि बिना वैध औषधि विक्रय लाइसेंस एलोपैथिक दवाओं का भंडारण और बिक्री नियमों का उल्लंघन है। मामले में दस्तावेजी जांच पूरी करने के बाद ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स कानून के तहत आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
इस कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि यदि संबंधित मेडिकल स्टोर के पुराने लाइसेंसधारक की मृत्यु करीब तीन वर्ष पहले हो चुकी थी तो इतने लंबे समय तक दुकान किस आधार पर चलती रही।
औषधि विक्रय लाइसेंस केवल दुकान के नाम का सामान्य प्रमाणपत्र नहीं होता। उसे निर्धारित शर्तों और योग्य व्यक्तियों से जोड़ा जाता है। खुदरा दवा बिक्री के लिए वैध लाइसेंस के साथ नियमानुसार योग्य फार्मासिस्ट और रिकॉर्ड का होना आवश्यक होता है।
यदि किसी लाइसेंस से जुड़े व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या दुकान की संरचना, स्वामित्व अथवा संचालन की स्थिति में ऐसा बदलाव होता है जिससे मौजूदा लाइसेंस प्रभावित होता हो, तो संबंधित औषधि प्राधिकरण को नियमानुसार प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
मृत व्यक्ति के नाम पर पुराने दस्तावेज का सहारा लेकर अनिश्चित समय तक दवा कारोबार जारी रखने की अनुमति नहीं मानी जा सकती।
यही वजह है कि विभाग अब यह भी जांच सकता है कि मेडिकल स्टोर पहले किस लाइसेंस के तहत संचालित था, लाइसेंस किसके नाम जारी हुआ था, संबंधित लाइसेंस की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या थी और पुराने लाइसेंसधारक की मृत्यु के बाद विभाग को इसकी जानकारी दी गई थी या नहीं।
यदि किसी दूसरे व्यक्ति ने इसके बाद दुकान का संचालन संभाला था तो उसे नया या वैधानिक रूप से मान्य औषधि विक्रय लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक था।
वर्तमान छापेमारी के दौरान मौके पर ऐसा वैध लाइसेंस उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
इसी के साथ दवाओं के स्रोत का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है।
मेडिकल स्टोर संचालक को दवाओं की खरीद के वैध बिल और रिकॉर्ड रखने होते हैं। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि दवाएं किस अधिकृत थोक विक्रेता या कंपनी से खरीदी गईं और उनकी आपूर्ति श्रृंखला क्या है।
पटहेरवा के इस मेडिकल स्टोर पर मौजूद व्यक्ति खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेज नहीं दिखा सका। इसके कारण विभाग के लिए यह जांच करना भी आवश्यक हो गया है कि दुकान तक दवाएं किस माध्यम से पहुंच रही थीं।
यदि दवाएं किसी अधिकृत सप्लायर से खरीदी गई थीं तो उससे संबंधित इनवॉइस और रिकॉर्ड सामने आने चाहिए।
यदि खरीद का वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं होता है तो दवा आपूर्ति श्रृंखला की जांच आगे बढ़ सकती है।
औषधि विभाग ऐसी जांच के दौरान दवा के बैच नंबर, निर्माता, वितरक, बिल और स्टॉक से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान कर सकता है।
हालांकि वर्तमान स्तर पर बिना प्रयोगशाला जांच या विस्तृत विभागीय निष्कर्ष के इन दवाओं को नकली कहना सही नहीं होगा।
करीब 80 हजार रुपये की दवाओं का सील किया जाना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वे नकली थीं।
कार्रवाई का मुख्य कारण दुकान का वैध लाइसेंस और खरीद-बिक्री अभिलेख प्रस्तुत नहीं कर पाना है।
दो नमूनों की गुणवत्ता रिपोर्ट आने के बाद दवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा पहलू अलग से स्पष्ट होगा।
इस मामले का दूसरा गंभीर पहलू यह है कि दुकान पटहेरवा चौराहे जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के पास संचालित हो रही थी।
मेडिकल स्टोर से आम नागरिक बीमारी और आपात स्थिति में दवाएं खरीदते हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि दवा बिक्री अधिकृत प्रतिष्ठान से हो और वहां निर्धारित योग्यता वाला व्यक्ति मौजूद हो।
दवा सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है।
गलत दवा, गलत मात्रा, गलत भंडारण या बिना नियंत्रित आपूर्ति श्रृंखला के बेची गई औषधियां मरीज के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
कई दवाओं को निर्धारित तापमान और परिस्थितियों में रखना आवश्यक होता है।
कुछ दवाएं ऐसी होती हैं जिनकी बिक्री चिकित्सकीय पर्चे के आधार पर ही की जानी चाहिए।
इसी कारण मेडिकल स्टोर के लिए लाइसेंसिंग और रिकॉर्ड संबंधी नियम बनाए गए हैं।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दुकान में पर्याप्त मात्रा में एलोपैथिक दवाएं पाई गईं, यानी यहां केवल कुछ घरेलू उपयोग की सामान्य दवाएं रखे होने जैसी स्थिति नहीं थी।
विभागीय जानकारी में जीवनरक्षक श्रेणी सहित विभिन्न एलोपैथिक दवाओं के भंडारण का उल्लेख सामने आया है।
औषधि विभाग अब जब्त या सील किए गए स्टॉक की सूची के आधार पर आगे की जांच करेगा।
दो नमूनों की प्रयोगशाला रिपोर्ट भी मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि नमूने मानक के अनुरूप पाए जाते हैं तो मामला मुख्य रूप से लाइसेंस और अवैध बिक्री से जुड़े उल्लंघनों तक सीमित रह सकता है।
यदि किसी नमूने में गुणवत्ता संबंधी समस्या पाई जाती है तो औषधि कानून के तहत अलग और अधिक गंभीर कार्रवाई का आधार बन सकता है।
फिलहाल प्रयोगशाला रिपोर्ट का इंतजार है।
स्थानीय लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर है कि यदि दुकान लंबे समय से बिना वैध लाइसेंस चल रही थी तो नियमित निरीक्षण के दौरान मामला पहले सामने क्यों नहीं आया।
विशेष रूप से पुराने लाइसेंसधारक की मृत्यु के तीन वर्ष बाद भी दुकान चलने संबंधी शिकायत यदि विभागीय जांच में सही पाई जाती है तो निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ सकते हैं।
औषधि विक्रय प्रतिष्ठानों की निगरानी केवल शिकायत मिलने के बाद छापेमारी तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
लाइसेंस की स्थिति, फार्मासिस्ट की उपलब्धता, खरीद-बिक्री रिकॉर्ड और दवा भंडारण व्यवस्था का समय-समय पर निरीक्षण दवा नियंत्रण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कुशीनगर में इससे पहले भी बिना लाइसेंस और मानकों के विपरीत मेडिकल स्टोर संचालित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में एक ही फार्मासिस्ट के नाम का एक से अधिक प्रतिष्ठानों में इस्तेमाल होने, आवश्यक संसाधन उपलब्ध न होने और बिना वैध दस्तावेज दुकानों के संचालन जैसे आरोप पूर्व में भी सामने आए हैं। हालांकि प्रत्येक प्रतिष्ठान की कानूनी स्थिति अलग होती है और किसी पुराने मामले के आधार पर वर्तमान दुकान के खिलाफ अतिरिक्त आरोप नहीं लगाए जा सकते।
पटहेरवा की वर्तमान कार्रवाई एक विशिष्ट शिकायत और मौके पर मिले तथ्यों पर आधारित है।
औषधि निरीक्षक ने मुखबिर से मिली सूचना के बाद सीधे कार्रवाई करने के बजाय पहले उप जिलाधिकारी तमकुहीराज से संपर्क किया।
इसके बाद प्रशासनिक निर्देश के आधार पर पुलिस बल के साथ टीम मौके पर पहुंची।
इससे छापेमारी और सीलिंग के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा कार्रवाई का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में प्रशासनिक सहयोग मिला।
अब विभाग को उस व्यक्ति से भी जवाब लेना होगा जो मौके पर दुकान चला रहा था।
उससे यह पूछा जा सकता है कि दवाओं का स्वामित्व किसका है, दुकान कितने समय से संचालित की जा रही थी, दवाएं कहां से खरीदी गईं और पुराने लाइसेंस की स्थिति क्या थी।
यदि संबंधित दस्तावेज बाद में प्रस्तुत किए जाते हैं तो विभाग उनकी वैधता और तारीखों का भी सत्यापन कर सकता है।
हालांकि मौके पर कोई वैध लाइसेंस या खरीद-बिक्री रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जा सका था।
इसी आधार पर दवाओं को तत्काल सील किया गया।
अभी किसी अदालत ने मेडिकल स्टोर संचालक को दोषी नहीं ठहराया है।
औषधि विभाग की जांच और उसके बाद सक्षम न्यायालय में दाखिल किए जाने वाले परिवाद के आधार पर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
लेकिन प्रारंभिक विभागीय कार्रवाई में बिना वैध लाइसेंस दवाओं के भंडारण और बिक्री की स्थिति सामने आने का दावा किया गया है।
इस पूरे मामले में “तीन साल पहले लाइसेंसी की मौत” वाला पहलू जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि विभागीय रिकॉर्ड से यह पुष्टि होती है कि दुकान जिस लाइसेंस के आधार पर पहले चल रही थी उसके लाइसेंसधारक की मौत तीन वर्ष पहले हो चुकी थी और उसके बाद भी वैध बदलाव या नया लाइसेंस लिए बिना बिक्री जारी रही, तो यह केवल एक दिन की अनियमितता नहीं बल्कि लंबे समय तक चली लाइसेंसिंग व्यवस्था की गंभीर चूक का मामला हो सकता है।
ऐसी स्थिति में यह भी पता लगाना आवश्यक होगा कि पुराने लाइसेंस की मृत्यु संबंधी जानकारी विभाग तक कब पहुंची और उसके बाद दुकान का कोई निरीक्षण हुआ था या नहीं।
वहीं यदि दुकान किसी अलग लाइसेंस के तहत चलने का दावा करती है तो संबंधित दस्तावेजों की जांच आवश्यक होगी।
अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वर्तमान कार्रवाई में कोई वैध लाइसेंस प्रस्तुत किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है।
दवा कारोबार में लाइसेंस संबंधी अनियमितता आम लोगों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्राहक अक्सर मेडिकल स्टोर पर लगे बोर्ड और दुकान के पुराने परिचय के आधार पर भरोसा कर लेते हैं।
उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि दुकान का लाइसेंस वर्तमान में वैध है या नहीं और वहां दवा देने वाला व्यक्ति नियमानुसार अधिकृत है या नहीं।
इसी कारण नियामक विभाग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
लोगों को भी जहां तक संभव हो दवा खरीदते समय बिल लेना चाहिए।
बिल न केवल दवा की खरीद का प्रमाण होता है बल्कि किसी गुणवत्ता शिकायत, गलत दवा या कानूनी विवाद की स्थिति में भी उपयोगी साबित होता है।
दवा के पैकेट पर बैच नंबर, एक्सपायरी डेट और निर्माता की जानकारी भी देखी जानी चाहिए।
हालांकि किसी दुकान का लाइसेंस सत्यापित करना आम ग्राहक के लिए हमेशा आसान नहीं होता, इसलिए इसका मुख्य दायित्व संबंधित औषधि प्रशासन का ही है।
पटहेरवा मामले में टीम द्वारा लिए गए दोनों नमूनों की रिपोर्ट आने में कुछ समय लग सकता है।
राजकीय विश्लेषक प्रयोगशाला की रिपोर्ट मिलने के बाद विभाग आवश्यकतानुसार आगे की कार्रवाई करेगा।
इसके साथ दवाओं के खरीद स्रोत और दुकान के पुराने लाइसेंस से जुड़े अभिलेखों की जांच भी महत्वपूर्ण रहेगी।
औषधि निरीक्षक के अनुसार जांच पूरी होने के बाद सक्षम न्यायालय में परिवाद दाखिल किया जाएगा।
फिलहाल करीब 80 हजार रुपये की दवाएं सील हैं।
दो नमूने जांच के लिए लिए गए हैं।
दुकान पर मौजूद व्यक्ति वैध लाइसेंस और खरीद-बिक्री के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका।
स्थानीय शिकायत में पुराने लाइसेंसधारक की करीब तीन वर्ष पहले मृत्यु होने के बावजूद मेडिकल स्टोर चलते रहने का दावा है।
अब विभागीय अभिलेखों की जांच से ही स्पष्ट होगा कि दुकान इतने समय तक किस आधार पर संचालित होती रही और निगरानी व्यवस्था में कहां चूक हुई।