अहमदाबाद। गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री पर प्रतिबंध को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। मंदिर के 500 मीटर के दायरे समेत अधिसूचित क्षेत्रों में नॉनवेज खाद्य पदार्थों की बिक्री और भंडारण पर रोक को छह रेस्टोरेंट संचालकों ने गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी है। अब इस मामले में सरकार और कारोबारियों के बीच धार्मिक आस्था तथा व्यवसाय के अधिकार को लेकर अहम कानूनी बहस सामने आई है।
21 अक्टूबर को हुई सुनवाई में गुजरात सरकार ने प्रतिबंध का बचाव करते हुए कहा कि किसी तीर्थस्थल की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को नजरअंदाज करके व्यवसाय के अधिकार की व्याख्या नहीं की जा सकती। सरकार के मुताबिक, सोमनाथ केवल एक व्यावसायिक क्षेत्र नहीं, बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या और मंदिर तक पहुंचने वाले प्रमुख मार्गों की प्रकृति को ध्यान में रखकर यह प्रतिबंध लगाया गया है।
दूसरी ओर, रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि वे लंबे समय से वैध लाइसेंस के तहत कारोबार कर रहे हैं। उनके मुताबिक, प्रशासन ने उन्हें प्रतिष्ठान बंद करने के लिए मजबूर किया और प्रतिबंध के पीछे पर्याप्त कानूनी आधार स्पष्ट नहीं किया। याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का हवाला दिया है।
इस मामले में अब सवाल केवल नॉनवेज की बिक्री पर रोक का नहीं है। कानूनी विवाद यह भी है कि धार्मिक महत्व वाले क्षेत्र में व्यापार पर इस तरह का प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार के पास कितना अधिकार है और उस अधिकार की संवैधानिक सीमाएं क्या हैं।
सरकार ने अदालत में क्या दलील दी?
राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील जीएच विर्क ने न्यायमूर्ति निशा एम. ठाकोर की पीठ के सामने प्रतिबंध का पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि मंदिर के प्रवेश द्वार और श्रद्धालुओं के आवागमन वाले प्रमुख धार्मिक मार्गों पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री को पूर्ण मौलिक अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सरकार का तर्क है कि धार्मिक स्थलों के आसपास की व्यवस्था वहां की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती है। इसलिए प्रशासन श्रद्धालुओं की आवाजाही और धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर उचित नियमन कर सकता है।
सरकार ने अदालत को बताया कि जनवरी से सितंबर 2026 के बीच सोमनाथ मंदिर में लगभग 1.16 करोड़ लोगों के आने का आंकड़ा दर्ज किया गया। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही को देखते हुए सरकार ने मंदिर तक पहुंचने वाले रास्तों और आसपास के धार्मिक क्षेत्रों के महत्व पर जोर दिया।
राज्य की दलील के अनुसार, प्रतिबंध का उद्देश्य रेस्टोरेंट कारोबार को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है। सरकार का कहना है कि संबंधित प्रतिष्ठान अपने मौजूदा स्थानों पर शाकाहारी भोजन बेच सकते हैं। अधिसूचित प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर भी कारोबार लागू नियमों के अधीन किया जा सकता है।
हालांकि, यह सरकार का पक्ष है। प्रतिबंध की वैधता, उसके दायरे और संबंधित कानूनों की व्याख्या पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है।
छह रेस्टोरेंट संचालकों ने क्यों दी चुनौती?
इस मामले में छह भोजनालय संचालकों ने गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि वे कई वर्षों से संबंधित क्षेत्रों में कारोबार कर रहे हैं और उनके पास वैध लाइसेंस हैं।
उनका आरोप है कि अधिकारियों ने पर्याप्त कारण बताए बिना प्रतिष्ठान बंद करा दिए। संचालकों का कहना है कि किसी वैध व्यवसाय को रोकने के लिए प्रशासन को कानूनी आधार और लागू नियमों का पालन करना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का हवाला दिया है। यह अनुच्छेद नागरिकों को कोई पेशा अपनाने या व्यवसाय, व्यापार अथवा रोजगार करने का मौलिक अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(6) के तहत कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
यही कारण है कि अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि सोमनाथ में लागू प्रतिबंध संबंधित कानून के तहत वैध है या नहीं। साथ ही, यह भी विचारणीय है कि प्रतिबंध का दायरा कितना व्यापक है और क्या इसे लागू करने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप रही है।
रेस्टोरेंट संचालकों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि अधिकारियों ने किस कानूनी प्रावधान के तहत प्रतिष्ठानों को बंद कराने की कार्रवाई की। उनके वकील ने गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33(1)(w) के तहत प्रशासन की शक्तियों की सीमा पर भी सवाल उठाए हैं।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ओर धार्मिक स्थल की प्रकृति और श्रद्धालुओं की सुविधा का प्रश्न है। दूसरी ओर, कारोबारियों की आजीविका और प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता भी विचार के केंद्र में है।
प्रतिबंध केवल 500 मीटर तक सीमित नहीं
सोमनाथ में मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर रोक से जुड़ा मामला केवल मंदिर के चारों ओर 500 मीटर के दायरे तक सीमित नहीं है। सरकारी अधिसूचनाओं में मंदिर के आसपास के कुछ मार्गों और अन्य धार्मिक महत्व वाले क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है।
गिर सोमनाथ जिला प्रशासन की 27 अगस्त 2026 को प्रकाशित जानकारी के अनुसार, 10 अगस्त 2026 की स्थायी अधिसूचना में सोमनाथ मंदिर और भालका मंदिर के आसपास नॉनवेज खाद्य पदार्थों के उत्पादन, बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध का उल्लेख है। इसमें अंडे, मांस और मछली समेत मांसाहारी खाद्य पदार्थ शामिल हैं। <Cite refs={[“turn494157search7”]}/>
सरकार ने सुनवाई के दौरान इससे पहले जारी अधिसूचनाओं का भी उल्लेख किया। उसके अनुसार, वर्ष 2006 में सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और मंदिर से बस स्टैंड को जोड़ने वाले मार्ग पर अंडे, मांस और मछली की बिक्री तथा भंडारण को लेकर प्रतिबंध लगाया गया था।
इसके बाद वर्ष 2018 में स्थानीय निकाय ने कुछ प्रमुख मार्गों पर शाकाहारी क्षेत्र बनाने के लिए कदम उठाए। वर्ष 2019 में भी प्रतिबंध का दायरा बढ़ाने से संबंधित अधिसूचना जारी हुई थी। सरकार ने अदालत में कहा कि 2026 की अधिसूचना ने 2019 की अधिसूचना का स्थान लिया, जबकि कुछ पुराने प्रावधान लागू बने हुए हैं।
इन अधिसूचनाओं का सटीक दायरा और मौजूदा याचिकाकर्ताओं के प्रतिष्ठानों पर उनका प्रभाव मामले के अहम पहलुओं में शामिल है। इसलिए यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित प्रतिष्ठान वास्तव में किन अधिसूचित क्षेत्रों में आते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई किस आदेश के आधार पर की गई।
हरिद्वार, ऋषिकेश और मथुरा का भी दिया गया उदाहरण
गुजरात सरकार ने अपने पक्ष में दूसरे धार्मिक शहरों और तीर्थस्थलों का उदाहरण भी दिया। सरकारी वकील ने हरिद्वार, ऋषिकेश, अमृतसर और मथुरा-वृंदावन जैसे क्षेत्रों में लागू प्रतिबंधों और उनसे संबंधित कानूनी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया।
सरकार का तर्क है कि धार्मिक स्थलों के आसपास विशेष नियम लागू करना अपने आप में असामान्य नहीं है। ऐसे नियमों के पीछे श्रद्धालुओं की सुविधा, धार्मिक परंपराओं और क्षेत्र की विशिष्ट पहचान को बनाए रखने जैसे उद्देश्य हो सकते हैं।
हालांकि, दूसरे शहरों में लागू किसी प्रतिबंध का उदाहरण अपने आप सोमनाथ की अधिसूचना को कानूनी रूप से वैध साबित नहीं करता। हर मामले में संबंधित कानून, प्रशासनिक अधिकार, प्रतिबंध की सीमा और उसके लागू होने की प्रक्रिया का अलग-अलग परीक्षण जरूरी है।
इसलिए अदालत को यह देखना होगा कि सरकार ने जिन उदाहरणों का उल्लेख किया है, वे मौजूदा मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों से किस हद तक मेल खाते हैं।
क्या रेस्टोरेंट पूरी तरह बंद करने होंगे?
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रतिबंध का अर्थ कारोबार पर पूर्ण रोक है या केवल मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री और भंडारण पर पाबंदी।
सरकार ने अदालत में कहा है कि संबंधित रेस्टोरेंट शाकाहारी भोजन परोसकर अपना कारोबार जारी रख सकते हैं। उसका दावा है कि प्रतिबंध विशेष क्षेत्रों में नॉनवेज खाद्य पदार्थों की बिक्री और भंडारण पर केंद्रित है।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रशासनिक कार्रवाई के कारण उनके प्रतिष्ठान बंद करने की स्थिति पैदा हुई। ऐसे में वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि प्रतिबंध किस तरह लागू किया गया और कारोबारियों को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
यदि किसी प्रतिष्ठान को केवल अधिसूचित क्षेत्र में नॉनवेज बेचने से रोका गया है, तो उसकी स्थिति उस मामले से अलग हो सकती है जिसमें पूरा प्रतिष्ठान बंद करा दिया गया हो। इस अंतर को समझना कानूनी विवाद के लिए महत्वपूर्ण है।
अदालत के सामने अब क्या सवाल हैं?
गुजरात हाई कोर्ट के सामने मुख्य रूप से तीन मुद्दे हैं। पहला, संबंधित अधिसूचना जारी करने के लिए सरकार और प्रशासन के पास पर्याप्त कानूनी अधिकार थे या नहीं। दूसरा, प्रतिबंध संविधान के तहत व्यवसाय के मौलिक अधिकार पर उचित सीमा के भीतर है या नहीं। तीसरा, इसे लागू करने के दौरान अधिकारियों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया या नहीं।
इसके अलावा, अदालत को अधिसूचना के वास्तविक दायरे और याचिकाकर्ताओं के प्रतिष्ठानों की स्थिति पर भी विचार करना पड़ सकता है।
21 अक्टूबर की सुनवाई से संबंधित प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, फैसले का अंतिम लिखित आदेश और उसमें निर्धारित शर्तें ही मामले की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करेंगी। <Cite refs={[“turn494157search8″,”turn494157search2”]}/>
फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि हाई कोर्ट ने प्रतिबंध को अंतिम रूप से वैध ठहरा दिया है या उसे रद्द कर दिया है। सरकार ने प्रतिबंध का बचाव किया है, जबकि रेस्टोरेंट संचालकों ने इसे चुनौती दी है। अंतिम फैसला अदालत का होगा।
सोमनाथ विवाद का आगे क्या असर हो सकता है?
इस मामले का परिणाम सोमनाथ के संबंधित कारोबारियों और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि अदालत प्रतिबंध को वैध मानती है, तो अधिसूचित क्षेत्रों में लागू नियमों के तहत कारोबार करना होगा। यदि अदालत को अधिसूचना या उसके क्रियान्वयन में कानूनी खामी मिलती है, तो आदेश में आवश्यक राहत या निर्देश दिए जा सकते हैं।
हालांकि, फैसले का व्यापक प्रभाव उसके वास्तविक निष्कर्षों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा। किसी एक मामले के आधार पर देश के सभी धार्मिक स्थलों के आसपास नॉनवेज बिक्री की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सोमनाथ मंदिर से जुड़ा यह विवाद धार्मिक आस्था, सार्वजनिक व्यवस्था, व्यवसाय के अधिकार और प्रशासनिक शक्तियों के बीच संतुलन का प्रश्न उठाता है। अब निगाहें हाई कोर्ट के अंतिम आदेश पर हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि संबंधित क्षेत्रों में प्रतिबंध की कानूनी स्थिति क्या होगी और रेस्टोरेंट संचालकों को किस तरह की राहत मिल सकती है।