दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस ज्यादती, बड़े पैमाने पर हिरासत, मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध, मोबाइल इंटरनेट बंद करने और पत्रकारों व वकीलों के साथ कथित दुर्व्यवहार से जुड़े मामलों पर गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने इससे जुड़े करीब 32 मामले सूचीबद्ध किए गए हैं। इसी के साथ राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका भी अदालत के सामने आई।
सुनवाई शुरू होते ही वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की एसआईआर के खिलाफ याचिका का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर नोटिस जारी करने की बात कही, लेकिन साथ ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अगली सुनवाई पर अदालत राहुल गांधी के आचरण के बारे में भी जानना चाहेगी। अदालत की यह टिप्पणी 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट परिसर पहुंचने और वहां बड़ी संख्या में समर्थकों के जुटने की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की एसआईआर संबंधी दलीलों को स्वीकार या खारिज कर दिया है। फिलहाल अदालत ने मामले को सुनने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा जा रहा है। एसआईआर की संवैधानिकता और चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में किए गए बदलावों पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है।
गुरुवार की सुनवाई का दायरा केवल राहुल गांधी की याचिका तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने दिल्ली में पिछले दिनों हुए सीईसी विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े कई अलग-अलग मामले हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों की कथित अवैध हिरासत, पत्रकारों और वकीलों के साथ कथित मारपीट, महिला पत्रकारों से कथित यौन दुर्व्यवहार, मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंध, मोबाइल इंटरनेट बंद करने, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और पुलिस की शक्तियों से जुड़े संवैधानिक सवाल शामिल हैं।
इन मामलों की पृष्ठभूमि 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन से जुड़ी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर के विरोध में अलग-अलग संगठनों और विपक्षी दलों ने प्रदर्शन का आह्वान किया था। इससे पहले सुरक्षा एजेंसियों ने राजधानी के कई क्षेत्रों में निषेधाज्ञा, मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास नियंत्रण, यातायात प्रतिबंध और मोबाइल इंटरनेट से जुड़े कदम उठाए थे।
इन प्रतिबंधों के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर 9 अक्टूबर को अदालत ने स्पष्ट किया था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर दिल्ली आने-जाने वाली मेट्रो और दूसरी रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। अदालत ने अधिकारियों को व्यवस्था नियंत्रित करने की अनुमति दी थी, लेकिन सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह रोकने के बजाय संतुलित उपाय अपनाने को कहा था।
इसके बावजूद 10 अक्टूबर को कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद रहने के आरोप सामने आए। इसके बाद अदालत में अवमानना याचिका दायर की गई और दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देशों का पालन नहीं हुआ।
11 अक्टूबर को विशेष सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला बनता हुआ माना और केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस तथा दिल्ली मेट्रो रेल निगम से जवाब मांगा। अदालत ने यह भी कहा कि किसी शांतिपूर्ण और निहत्थे व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां बीएनएसएस की धारा 163 लागू नहीं है।
अदालत ने वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के काम में बाधा नहीं डालने के भी निर्देश दिए थे।
अब 15 अक्टूबर की सुनवाई से पहले केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो ने अपने-अपने हलफनामे दाखिल किए हैं।
दिल्ली मेट्रो ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 10 अक्टूबर को पूरे नेटवर्क को बंद नहीं किया गया था। उसके अनुसार सभी निर्धारित ट्रेनें चलीं और कुल 271 ट्रेनों ने 4,157 निर्धारित यात्राएं पूरी कीं। मेट्रो प्रशासन के मुताबिक 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर ही प्रवेश या निकास से संबंधित प्रतिबंध लगाए गए थे और 258 स्टेशन पूरी तरह चालू रहे।
दिल्ली मेट्रो का कहना है कि ये प्रतिबंध दिल्ली पुलिस के निर्देशों पर लगाए गए थे और ट्रेन सेवाएं स्वयं बंद नहीं की गई थीं। महत्वपूर्ण इंटरचेंज स्टेशनों पर यात्रियों को ट्रेनों के बीच बदलने की सुविधा भी जारी रही।
मेट्रो प्रशासन के अनुसार 10 अक्टूबर को करीब 32 लाख यात्रियों ने यात्रा की, जबकि सामान्य दूसरे शनिवार को यह संख्या लगभग 58 लाख रहती है। निगम का तर्क है कि यात्रियों की संख्या में गिरावट सेवाएं बंद होने के कारण नहीं बल्कि विरोध प्रदर्शन और शहर की स्थिति के कारण लोगों द्वारा यात्रा टालने से हुई हो सकती है।
हालांकि मेट्रो प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी भी मांगी है। साथ ही उसने यह दावा किया है कि अदालत के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया और उसने 9 अक्टूबर के निर्देशों का पालन किया।
यहीं से मामला कानूनी रूप से संवेदनशील हो जाता है। एक ओर दिल्ली मेट्रो कह रही है कि पूर्ण प्रतिबंध नहीं था और अधिकांश नेटवर्क सामान्य रूप से चलता रहा, दूसरी ओर उसने अवमानना नोटिस के जवाब में बिना शर्त माफी भी पेश की है। अब अदालत को उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर तय करना होगा कि प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के पहले आदेश के अनुरूप थे या नहीं।
केंद्र सरकार की ओर से गृह सचिव ने भी अदालत में हलफनामा दाखिल किया है। इसमें मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को सीमित अवधि के लिए बंद करने के फैसले का बचाव किया गया है।
केंद्र के अनुसार 9 अक्टूबर रात 10 बजे से 10 अक्टूबर रात 10 बजे तक रायसीना हिल के लगभग चार किलोमीटर के दायरे में केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद की गई थीं। वाई-फाई, ब्रॉडबैंड और दूसरे गैर-मोबाइल इंटरनेट माध्यम पूरी तरह बंद नहीं किए गए थे। सरकार का कहना है कि यह कदम सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में था।
गृह सचिव ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि इंटरनेट प्रतिबंध दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर लगाया गया था और निर्णय लागू कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया।
केंद्र सरकार ने अदालत से 11 अक्टूबर के आदेश में संशोधन की मांग भी की है ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर कानून के तहत निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया जा सके।
इसके साथ ही गृह सचिव की ओर से बिना शर्त और बिना किसी शर्त के माफी व्यक्त की गई है, लेकिन सरकार का स्पष्ट रुख है कि अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मीडिया में चल रही इस व्याख्या पर आपत्ति जताई कि सरकार ने अपनी कार्रवाई गलत मानते हुए माफी मांगी है। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि केंद्र ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया है और हलफनामे को उसी पूरे संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस ने भी अपने कदमों का विस्तृत बचाव किया है।
पुलिस का कहना है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया और अदालत के 11 अक्टूबर के आदेश के बाद किसी शांतिपूर्ण व्यक्ति की अवैध हिरासत नहीं की गई। पुलिस के अनुसार केवल उन लोगों को हटाया गया जिन्होंने बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू आदेशों का उल्लंघन किया।
दिल्ली पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए सीजेपी के पुराने प्रदर्शनों का भी हवाला दिया है।
पुलिस का आरोप है कि संगठन पहले भी प्रदर्शन के लिए दी गई शर्तों का उल्लंघन कर चुका है और जुलाई में हुए आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हुई थी। पुलिस ने अदालत को बताया कि उसे आशंका थी कि 10 अक्टूबर का आंदोलन भी नियंत्रण से बाहर जा सकता है।
पुलिस ने अपने हलफनामे में दावा किया कि पिछले प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे और पुलिसकर्मियों पर पत्थर तथा लाठियों से हमला किया गया था। ये दिल्ली पुलिस के आरोप हैं और मौजूदा सुनवाई में इन्हें प्रशासन द्वारा सुरक्षा प्रतिबंधों के औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
दिल्ली पुलिस ने कहा कि राजधानी की संवेदनशील स्थिति, राजनयिक गतिविधियों और बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को देखते हुए कई क्षेत्रों में धारा 163 लागू करनी पड़ी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ऐसे प्रतिबंधों की समीक्षा की गई।
पुलिस ने यह भी स्वीकार किया कि 9 अक्टूबर की रात से 10 अक्टूबर रात तक 57 मेट्रो स्टेशनों को लेकर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन बाद में इनमें बदलाव किया गया और प्रतिबंध वापस लिए गए।
इस पूरे विवाद में सबसे गंभीर मुद्दों में से एक प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों के साथ कथित पुलिस हिंसा है।
कई पत्रकार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया है कि सीईसी विरोधी प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, उनके साथ मारपीट की गई, मोबाइल और कैमरे इस्तेमाल करने से रोका गया और कुछ मामलों में रिकॉर्डिंग हटाने का दबाव डाला गया।
महिला पत्रकारों ने कुछ पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के भी आरोप लगाए हैं। इन आरोपों के कारण सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को अदालत में मौजूद रहने के लिए कहा था।
इन आरोपों पर अभी कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकला है। पुलिस की ओर से अलग-अलग मामलों में आरोपों से इनकार या जांच की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन भी इस मामले में अदालत पहुंचे हैं।
वकीलों का आरोप है कि 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन के दौरान अदालत आने-जाने वाले अधिवक्ताओं को रोका गया, कुछ को हिरासत में लिया गया और कुछ के साथ कथित रूप से बल प्रयोग हुआ।
इन संगठनों ने हिरासत में लिए गए वकीलों और कार्रवाई में शामिल पुलिसकर्मियों का विवरण सार्वजनिक करने, संबंधित सीसीटीवी और दूसरे रिकॉर्ड सुरक्षित रखने तथा भविष्य में अदालत जाने वाले वकीलों को न रोके जाने के लिए स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है।
कुछ याचिकाओं में कथित पुलिस अत्याचार की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग भी की गई है।
वहीं दूसरी ओर अदालत के सामने ऐसी याचिकाएं भी हैं जिनमें कहा गया है कि बड़े राजनीतिक प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट परिसर में भीड़ जुटने से अदालत के सामान्य कामकाज, वकीलों और पक्षकारों की आवाजाही में बाधा नहीं आनी चाहिए।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने दो संवैधानिक हित एक साथ मौजूद हैं—एक तरफ शांतिपूर्ण विरोध, अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता, दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था, न्यायालय की सुरक्षा और सामान्य नागरिकों के आवागमन का अधिकार।
12 अक्टूबर को राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के घटनाक्रम ने इस बहस में तीसरा पहलू जोड़ दिया।
राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया था। बड़ी संख्या में समर्थक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी उनके साथ अदालत परिसर के आसपास पहुंचे।
इस घटनाक्रम के बाद कुछ याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट परिसर में राजनीतिक प्रदर्शन और बड़ी राजनीतिक भीड़ को रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई है।
इसी संदर्भ में गुरुवार को राहुल गांधी की याचिका का उल्लेख होने पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत अगली तारीख पर उनके आचरण के बारे में जानना चाहेगी।
अदालत ने राहुल गांधी की एसआईआर याचिका पर नोटिस जारी करने की बात कही है, इसलिए अब चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों को मामले में अपना जवाब देना पड़ सकता है।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं का आरोप है कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए गए और पूरी प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं रही।
उनकी याचिका में चुनाव आयोग से मतदाता सूची संशोधन से संबंधित दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने तथा स्वतंत्र जांच या लेखा परीक्षण जैसी व्यवस्था की मांग किए जाने की जानकारी सामने आई है।
चुनाव आयोग इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है। आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित, दोहरी प्रविष्टि वाले या अन्य अपात्र नामों की पहचान करना और सूची को अधिक सटीक बनाना है।
इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र से जुड़ी एक अलग एसआईआर याचिका को भी तत्काल सामान्य एसआईआर मामले के साथ जोड़ने से इनकार किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने महाराष्ट्र में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़ी याचिका को राहुल गांधी की याचिका के साथ सुनने का अनुरोध किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के मामलों की राज्यवार जांच करनी होगी और सभी राज्यों की परिस्थितियों को सामान्य रूप से एक जैसा नहीं माना जा सकता। अदालत ने महाराष्ट्र वाले मामले को किसी अन्य तारीख पर सूचीबद्ध करने की बात कही।
यह टिप्पणी एसआईआर विवाद के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची संशोधन की परिस्थितियों को अलग तथ्यों के आधार पर देख सकता है।
इसके अलावा अदालत के सामने बीएनएसएस की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका भी सूचीबद्ध है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह प्रावधान पुलिस को पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा के बिना लोगों को नियंत्रित या हिरासत में लेने की अत्यधिक शक्ति देता है और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
एक अलग याचिका में जंतर-मंतर को दिल्ली के आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने को भी चुनौती दी गई है।
दिल्ली प्रशासन ने हाल ही में जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल के रूप में हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थान तय किए हैं।
सीजेपी और अन्य आंदोलनकारी इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि जंतर-मंतर की केंद्रीय स्थिति विरोध प्रदर्शनों को सरकार और सार्वजनिक संस्थानों तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि नई व्यवस्था सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की जरूरतों को देखते हुए बनाई गई है।
इन घटनाओं से जुड़ी कई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं भी अदालत के सामने हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी द्वारा दायर याचिका में विभिन्न राजनीतिक नेताओं की कथित हिरासत को चुनौती दी गई है। विपक्षी नेताओं का दावा रहा है कि कुछ लोगों को प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही घरों या अन्य स्थानों पर रोका गया था।
राजद सांसद मनोज झा ने अपनी याचिका में प्रदर्शनकारियों, छात्रों, वकीलों, राजनीतिक नेताओं और आम नागरिकों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग और हिरासत का मुद्दा उठाया है।
उनकी याचिका में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोपों का भी उल्लेख है।
इसी तरह पत्रकार संगठनों ने अदालत से मीडिया कर्मियों के लिए स्पष्ट सुरक्षा निर्देश जारी करने की मांग की है।
उनका कहना है कि पत्रकार किसी प्रदर्शन में भाग लेने वाले कार्यकर्ता नहीं बल्कि सार्वजनिक घटनाओं को रिकॉर्ड करने और जनता तक पहुंचाने का काम कर रहे होते हैं, इसलिए उन्हें केवल घटनास्थल पर मौजूद होने के कारण हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि कुछ मौकों पर प्रदर्शनकारी स्वयं को पत्रकार बताकर प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करने का प्रयास कर सकते हैं, इसलिए पहचान और सुरक्षा जांच आवश्यक है।
अदालत को अब इन दोनों पक्षों के बीच ऐसा संतुलन तय करना होगा जिससे वास्तविक पत्रकार अपना काम कर सकें और सुरक्षा नियम भी लागू रह सकें।
10 अक्टूबर और उसके बाद के प्रदर्शनों में हजारों लोगों को अलग-अलग समय पर हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई थीं। पुलिस का कहना है कि अधिकांश लोगों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अस्थायी रूप से हटाया गया और बाद में छोड़ दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बड़ी संख्या में लोगों को ऐसे क्षेत्रों से भी हिरासत में लिया गया जहां कोई वैध निषेधाज्ञा लागू नहीं थी।
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर के आदेश में स्पष्ट किया था कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
गुरुवार की सुनवाई में दिल्ली पुलिस ने इस आदेश के बाद पूर्ण अनुपालन का दावा किया है।
अब अदालत को हलफनामों, सीसीटीवी रिकॉर्ड, हिरासत के विवरण, मेट्रो संचालन के आंकड़ों और अन्य दस्तावेजों के आधार पर यह जांच करनी होगी कि प्रशासन के दावे और याचिकाकर्ताओं के आरोपों में कितना अंतर है।
इंटरनेट प्रतिबंध भी इस मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल बन गया है।
मोबाइल इंटरनेट बंद करने का असर केवल प्रदर्शनकारियों पर नहीं बल्कि आम नागरिकों, पत्रकारों, ऑनलाइन भुगतान, परिवहन सेवाओं और दूसरे दैनिक कामों पर भी पड़ता है।
केंद्र सरकार का कहना है कि प्रतिबंध केवल सीमित क्षेत्र और 24 घंटे की अवधि के लिए था तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इंटरनेट निलंबन जैसे कदम अत्यंत सीमित परिस्थितियों में और स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के तहत ही लिए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट अब यह भी देख सकता है कि इंटरनेट प्रतिबंध का आदेश सार्वजनिक किया गया था या नहीं, उसके लिए पर्याप्त कारण दर्ज किए गए थे या नहीं और बाद में निर्धारित समीक्षा प्रक्रिया पूरी की गई या नहीं।
मेट्रो विवाद में भी इसी तरह अनुपात का प्रश्न महत्वपूर्ण है।
पुलिस के लिए किसी संवेदनशील स्टेशन पर कुछ प्रवेश द्वार अस्थायी रूप से बंद करना और पूरे सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को रोक देना कानूनी रूप से एक ही बात नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का 9 अक्टूबर का निर्देश इसी अंतर पर आधारित था।
डीएमआरसी अब आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि ट्रेन संचालन सामान्य रहा और केवल सीमित स्टेशनों पर प्रवेश और निकास नियंत्रित किया गया।
हालांकि 45 स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए जाने और सामान्य दिनों की तुलना में यात्रियों की संख्या लगभग आधी रह जाने जैसे तथ्य अदालत की जांच का हिस्सा रहेंगे।
दिल्ली पुलिस की ओर से लगाए गए बैरिकेड भी सुनवाई में मुद्दा हैं।
पुलिस का कहना है कि अदालत के निर्देशों के बाद बैरिकेडिंग की समीक्षा की गई और सामान्य लोगों की आवाजाही आसान बनाने के प्रयास किए गए। साथ ही शहर में 88 से अधिक डायवर्जन संकेत लगाए जाने की जानकारी दी गई है ताकि लोग वैकल्पिक मार्ग इस्तेमाल कर सकें।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था इतनी व्यापक थी कि आम नागरिकों, वकीलों और पत्रकारों को भी परेशानी हुई।
गुरुवार की सुनवाई का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि पहली बार सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार और संबंधित एजेंसियों के विस्तृत हलफनामे मौजूद हैं।
अब मामला केवल मीडिया रिपोर्टों या प्रदर्शनकारियों के आरोपों तक सीमित नहीं है। दिल्ली पुलिस, डीएमआरसी और केंद्रीय गृह सचिव ने अदालत के रिकॉर्ड पर अपनी कार्रवाई का औचित्य प्रस्तुत किया है।
इसके साथ ही कई याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई के वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड, हिरासत से जुड़े दस्तावेज और दूसरे साक्ष्य अदालत के सामने रखने की बात कही है।
अदालत को इन्हीं रिकॉर्डों की तुलना कर यह तय करना होगा कि कहां प्रशासन ने कानूनी सीमा के भीतर कार्रवाई की और कहां अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
फिलहाल यह सुनवाई जारी है और इस स्तर पर किसी भी पक्ष के पूर्ण रूप से सही या गलत साबित होने का निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।
सबसे बड़ा ताजा घटनाक्रम राहुल गांधी की एसआईआर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी करने का निर्णय है। साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि अगली तारीख पर अदालत राहुल गांधी के आचरण के बारे में भी जानकारी चाहेगी।
वहीं दिल्ली विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और मेट्रो प्रशासन ने अपने कदमों का बचाव किया है। डीएमआरसी और केंद्रीय गृह सचिव की ओर से अवमानना कार्यवाही के संदर्भ में बिना शर्त माफी भी पेश की गई है, जबकि दोनों ने जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने से इनकार किया है।
दिल्ली पुलिस ने कहा है कि सुरक्षा प्रतिबंध खुफिया जानकारी, पिछले प्रदर्शनों के अनुभव और संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए लगाए गए थे। पुलिस का यह भी दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया गया।
दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों की ओर से पुलिस ज्यादती, अवैध हिरासत और पेशेवर काम में बाधा डालने के गंभीर आरोप जारी हैं।
इसी वजह से 15 अक्टूबर की सुनवाई केवल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रह गई है। अब इसके केंद्र में विरोध के संवैधानिक अधिकार, पुलिस शक्तियों की सीमा, प्रेस की स्वतंत्रता, सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध, इंटरनेट निलंबन और अदालत परिसर की सुरक्षा जैसे कई बड़े प्रश्न शामिल हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि प्रशासन भविष्य में बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान कितनी सीमा तक परिवहन, इंटरनेट और सार्वजनिक आवाजाही को प्रतिबंधित कर सकता है और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों तथा वकीलों की सुरक्षा के लिए कौन से स्पष्ट मानक लागू किए जाएंगे।