सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और पिछड़ा वर्ग आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू धर्म में जाने वाला व्यक्ति केवल धर्म परिवर्तन से पहले की जातिगत या सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर नए धर्म में पिछड़ा वर्ग आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें इस्लाम अपनाने वाले लोगों को स्वतः पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल करने वाले राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया गया था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति को अपने-आप नए धर्म की किसी अधिसूचित पिछड़ी समुदाय श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन से पहले पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से संबंधित था, उसे धर्म परिवर्तन के बाद किसी दूसरी धार्मिक व्यवस्था के अधिसूचित पिछड़े समुदाय का सदस्य नहीं बना देता।
यह फैसला तमिलनाडु सरकार और समीर अहमद एन. से जुड़े मामले में आया है। विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब हिंदू परिवार में जन्मे एक व्यक्ति ने इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद स्वयं को मुस्लिम लब्बाई समुदाय का सदस्य बताते हुए पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र मांगा था।
समीर अहमद का नाम धर्म परिवर्तन से पहले परमशिवम बताया गया है। उन्होंने वर्ष 2015 में इस्लाम स्वीकार किया था और बाद में उनके धर्म परिवर्तन की जानकारी राजपत्र में भी प्रकाशित हुई। उन्होंने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया और बाद में तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के तहत सामुदायिक प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया।
उनका दावा था कि वह मुस्लिम लब्बाई समुदाय की धार्मिक परंपराओं का पालन कर रहे हैं और संबंधित जमात ने भी उन्हें स्वीकार किया है। इसी आधार पर उन्होंने सरकारी अधिकारियों से लब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की।
लेकिन तहसीलदार ने उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा और अंततः धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग की स्थिति किस आधार पर तय की जा सकती है, यह बड़ा संवैधानिक सवाल बन गया।
तमिलनाडु में सभी मुसलमानों को पिछड़ा वर्ग आरक्षण नहीं मिलता। राज्य ने कुछ विशेष मुस्लिम समुदायों को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में अधिसूचित किया हुआ है।
राज्य की सूची में अंसार, डेक्कनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बाई जिसमें रौथर और मरक्कायर भी शामिल हैं, मापिला, शेख और सैयद सहित सात अधिसूचित मुस्लिम समुदाय शामिल हैं। केवल किसी व्यक्ति के मुस्लिम होने से वह स्वतः इनमें से किसी एक समुदाय का सदस्य नहीं हो जाता।
इसी विवाद के बीच तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को सरकारी आदेश संख्या 31 जारी किया था। इस आदेश में व्यवस्था की गई थी कि यदि पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म अपनाता है और सात अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में से किसी समुदाय से जुड़ता है, तो उसे पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है।
राज्य सरकार का तर्क था कि केवल धर्म परिवर्तन के कारण पहले से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े व्यक्ति को आरक्षण से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि किसी अग्रणी या सामान्य वर्ग के व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के बाद स्वतः पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण नहीं मिलेगा। व्यवस्था केवल उन लोगों के लिए थी जो पहले से आरक्षण योग्य पिछड़े समुदायों से आते थे।
तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश का भी सरकार ने उल्लेख किया। आयोग ने फरवरी 2024 में राज्य सरकार को इस विषय पर अपनी सिफारिश दी थी, जिसके बाद मार्च में सरकारी आदेश जारी किया गया।
लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 को इस आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि जब कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म अपनाता है तो केवल उसके पूर्व हिंदू जातिगत दर्जे के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह मुस्लिम समाज के किसी विशेष अधिसूचित पिछड़े समुदाय का सदस्य बन गया है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सामुदायिक प्रमाणपत्र किसी कानूनी और सामाजिक स्थिति को प्रमाणित करता है, वह स्वयं कोई नई सामाजिक स्थिति पैदा नहीं कर सकता।
तमिलनाडु सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
7 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट में मामले की विस्तृत सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब 15 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाने वाला व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत केवल धर्म परिवर्तन से पहले उसके साथ जुड़े सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।
अदालत के अनुसार पहले की सामाजिक व्यवस्था में मौजूद पिछड़ापन अपने-आप नए धर्म के किसी पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता में परिवर्तित नहीं हो जाता।
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अदालत ने यह नहीं कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति कभी किसी पिछड़े वर्ग का सदस्य हो ही नहीं सकता। फैसला मुख्य रूप से उस स्थिति को रोकता है जिसमें व्यक्ति केवल अपने धर्म परिवर्तन से पहले के जातिगत दर्जे को आधार बनाकर नए धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय का आरक्षण मांगता है।
यदि किसी धार्मिक समुदाय को कानूनी प्रक्रिया, सामाजिक अध्ययन और सरकारी अधिसूचना के जरिए पिछड़ा वर्ग घोषित किया गया है, तो उसमें सदस्यता का प्रश्न लागू कानून और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर तय होगा।
यानी फैसला धर्म परिवर्तन को आरक्षण पाने का स्वतः रास्ता मानने से इनकार करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू धर्म में पिछड़ा वर्ग से संबंधित होने और उसके बाद इस्लाम स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी पूर्व जातिगत स्थिति सीधे पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में स्थानांतरित हो जाएगी।
अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति केवल इस आधार पर सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़े समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता।
इस मामले में समीर अहमद स्वयं को लब्बाई समुदाय से जोड़ रहे थे। लेकिन अदालत के सामने मूल सवाल यह था कि क्या केवल धार्मिक स्वीकार्यता या किसी निजी धार्मिक संस्था का प्रमाणपत्र सरकारी आरक्षण की पात्रता तय कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी निजी धार्मिक संस्था की स्वीकृति अपने-आप संवैधानिक आरक्षण की पात्रता तय नहीं कर सकती। सामाजिक पिछड़ेपन और अधिसूचित समुदाय की सदस्यता का निर्धारण कानून के तहत होना चाहिए।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धार्मिक पहचान और सरकारी आरक्षण की कानूनी पहचान एक ही चीज नहीं हैं।
कोई धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति को अपने धार्मिक समुदाय में स्वीकार कर सकती है, लेकिन इससे सरकारी आरक्षण व्यवस्था में नई कानूनी श्रेणी अपने-आप नहीं बन जाती।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) का भी उल्लेख किया।
अनुच्छेद 16(4) राज्य को ऐसी पिछड़ी श्रेणियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था करने की अनुमति देता है जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
यह प्रावधान केवल किसी व्यक्ति की निजी पहचान पर आधारित नहीं है। इसके पीछे सामाजिक पिछड़ेपन, समुदाय की स्थिति और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व जैसे बड़े तत्व होते हैं।
इसी कारण किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धर्म परिवर्तन प्रक्रिया अकेले यह तय नहीं कर सकती कि वह किस आरक्षण श्रेणी का पात्र है।
आरक्षण व्यवस्था में किसी समूह को पिछड़ा वर्ग घोषित करने से पहले सामाजिक और शैक्षणिक परिस्थितियों का आकलन आवश्यक होता है। सरकारें आम तौर पर पिछड़ा वर्ग आयोगों, सामाजिक अध्ययन और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर ऐसे समुदायों की पहचान करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इसी संस्थागत प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित किया।
यदि केवल धर्म परिवर्तन और पुराने जातिगत प्रमाणपत्र के आधार पर नई धार्मिक पिछड़ा वर्ग श्रेणी में प्रवेश दिया जाए तो एक ऐसी श्रेणी तैयार हो सकती है जिसे संबंधित कानून या सामाजिक अध्ययन के जरिए अलग से पिछड़ा वर्ग घोषित ही नहीं किया गया हो।
तमिलनाडु सरकार का मार्च 2024 का आदेश इसी वजह से न्यायिक जांच में टिक नहीं पाया।
अदालत ने अनुसूचित जाति की संवैधानिक स्थिति से जुड़े नियमों का भी उल्लेख किया।
संविधान के अनुच्छेद 341 और संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति की मान्यता वर्तमान व्यवस्था में हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े पात्र समुदायों तक सीमित है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि अनुसूचित जाति से संबंधित व्यक्ति ऐसे धर्म में धर्म परिवर्तन करता है जो इस संवैधानिक आदेश के अंतर्गत शामिल नहीं है, तो वह केवल अपने पूर्व अनुसूचित जाति दर्जे के आधार पर उसी संवैधानिक स्थिति को आगे नहीं चला सकता।
इस हिस्से को पिछड़ा वर्ग आरक्षण से अलग समझना जरूरी है।
अनुसूचित जाति की स्थिति सीधे राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेश और अनुच्छेद 341 से संचालित होती है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग या राज्य पिछड़ा वर्ग की पहचान अलग संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया के तहत होती है।
इसलिए यह फैसला किसी भी धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति पर एक समान नियम लगाकर यह नहीं कहता कि वह हमेशा के लिए हर प्रकार के आरक्षण से बाहर हो गया।
फैसले का मुख्य सिद्धांत यह है कि पुरानी सामाजिक श्रेणी की सदस्यता केवल धर्म परिवर्तन के कारण नए धर्म की आरक्षित श्रेणी में स्वतः स्थानांतरित नहीं की जा सकती।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म में किसी पिछड़े समुदाय का सदस्य था और बाद में इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह केवल यह नहीं कह सकता कि चूंकि वह पहले पिछड़ा वर्ग था इसलिए अब उसे तमिलनाडु के सात अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में से किसी एक में मान लिया जाए।
उसे उस समुदाय की वैधानिक और सामाजिक पात्रता से संबंधित आवश्यक शर्तें पूरी करनी होंगी।
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने सामुदायिक प्रमाणपत्र और वास्तविक सामाजिक स्थिति के बीच अंतर पर जोर दिया।
प्रमाणपत्र किसी पहले से मौजूद स्थिति को प्रमाणित करने का माध्यम है। प्रशासनिक अधिकारी किसी प्रमाणपत्र के जरिए ऐसी सामाजिक श्रेणी नहीं बना सकते जिसे कानून ने उस व्यक्ति के लिए मान्यता ही नहीं दी हो।
यह फैसला धर्म परिवर्तन की स्वतंत्रता को भी समाप्त नहीं करता।
संविधान का अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है और निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के भीतर धर्म स्वीकार करने तथा उसका पालन करने का अधिकार देता है।
लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और सरकारी आरक्षण की पात्रता दो अलग संवैधानिक प्रश्न हैं।
किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म बदलने का अधिकार होना इस बात की स्वतः गारंटी नहीं है कि उसकी पिछली आरक्षण श्रेणी नए धार्मिक समुदाय में उसी रूप में जारी रहेगी।
इस मामले में तमिलनाडु सरकार की प्रमुख दलील यही थी कि सामाजिक पिछड़ापन केवल धर्म परिवर्तन से समाप्त नहीं हो जाता।
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया था कि कोई व्यक्ति वर्षों से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदाय में रहा हो तो केवल नया धर्म स्वीकार करने के कारण उसकी वास्तविक सामाजिक कठिनाइयां अचानक समाप्त नहीं हो जातीं।
यह सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तर्क था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट का उत्तर यह रहा कि वास्तविक पिछड़ापन बने रहने का सवाल और नए धर्म के किसी विशिष्ट अधिसूचित पिछड़े समुदाय की कानूनी सदस्यता दो अलग बातें हैं।
यदि सरकार मानती है कि धर्म परिवर्तन करने वाले किसी समूह को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की जरूरत है तो उसे आवश्यक अध्ययन, आयोग और वैधानिक प्रक्रिया के जरिए उस समूह की स्थिति तय करनी होगी।
केवल प्रशासनिक आदेश के माध्यम से पूर्व जातिगत स्थिति को नई धार्मिक पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार का 9 मार्च 2024 वाला आदेश प्रभावी नहीं रहेगा क्योंकि मद्रास हाईकोर्ट द्वारा उसे असंवैधानिक घोषित करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।
इसका तत्काल असर उन मामलों पर पड़ सकता है जिनमें धर्म परिवर्तन के बाद केवल पूर्व पिछड़ा वर्ग स्थिति के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र मांगा जा रहा हो।
हालांकि प्रत्येक मामले में संबंधित राज्य के कानून, अधिसूचनाएं और आरक्षण व्यवस्था अलग हो सकती है।
यह फैसला सीधे तमिलनाडु की उस व्यवस्था और संबंधित मामले से निकला है। इसलिए इसे बिना कानूनी संदर्भ के पूरे देश में सभी प्रकार के धर्मांतरण और हर आरक्षण श्रेणी पर एक ही तरीके से लागू मानना सही नहीं होगा।
भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची और विभिन्न राज्यों की पिछड़ा वर्ग सूचियां अलग-अलग हो सकती हैं। किसी समुदाय की पात्रता संबंधित सूची और कानून के आधार पर तय होती है।
इसी तरह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक स्थिति के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक व्यापक सिद्धांत जरूर स्थापित करता है, लेकिन उसका वास्तविक प्रयोग संबंधित आरक्षण श्रेणी और लागू कानून के आधार पर करना होगा।
फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने केवल धार्मिक पहचान को पिछड़ेपन का पर्याप्त आधार मानने से इनकार किया।
संविधान धार्मिक पहचान के आधार पर किसी पूरे समुदाय को स्वतः आरक्षण देने की व्यवस्था नहीं करता। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की पहचान के लिए वास्तविक परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक है।
तमिलनाडु में इसी कारण सभी मुसलमान पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल नहीं हैं। केवल सात अधिसूचित समुदायों को यह दर्जा प्राप्त है।
किसी धर्म के भीतर भी अलग-अलग समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति अलग हो सकती है।
इसलिए अदालत का तर्क है कि केवल किसी धर्म को स्वीकार करने से व्यक्ति उस धर्म के प्रत्येक सामाजिक समुदाय का सदस्य नहीं बन जाता।
समीर अहमद के मामले में प्रशासन ने इसी आधार पर मुस्लिम लब्बाई प्रमाणपत्र जारी करने से इनकार किया था।
उनकी ओर से यह तर्क दिया गया कि संबंधित धार्मिक संस्था ने उन्हें स्वीकार किया है और वह लब्बाई परंपरा का पालन करते हैं।
लेकिन अदालत ने माना कि किसी धार्मिक संस्था की स्वीकृति सरकारी आरक्षण के लिए निर्णायक नहीं हो सकती।
आरक्षण के लिए समुदाय की पहचान संविधान और कानून से नियंत्रित होती है।
15 अक्टूबर 2026 का सुप्रीम कोर्ट फैसला अब इस पूरे विवाद में अंतिम महत्वपूर्ण न्यायिक स्थिति बन गया है क्योंकि तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज हो गई है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन से पहले का पिछड़ापन अपने-आप नए धार्मिक समुदाय में पिछड़ा वर्ग की सदस्यता नहीं देता।
फैसले का सरल अर्थ यह है कि धर्म बदलने के बाद आरक्षण पाने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि व्यक्ति पहले किसी पिछड़ी जाति या समुदाय से संबंधित था।
नए धार्मिक सामाजिक ढांचे में आरक्षण का दावा संबंधित अधिसूचित समुदाय की वास्तविक और कानूनी सदस्यता पर निर्भर करेगा।
इस निर्णय से धर्म परिवर्तन, सामाजिक पिछड़ापन और आरक्षण के बीच लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक बहस फिर केंद्र में आ गई है।
एक तरफ यह तर्क मौजूद है कि सामाजिक भेदभाव और आर्थिक पिछड़ापन केवल धर्म बदलने से समाप्त नहीं होता। दूसरी तरफ आरक्षण व्यवस्था किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत गरीबी या पूर्व सामाजिक स्थिति के बजाय कानूनी रूप से पहचानी गई पिछड़ी श्रेणियों के आधार पर काम करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दूसरे पहलू पर जोर देते हुए कहा है कि पुरानी सामाजिक स्थिति को बिना आवश्यक कानूनी और सामाजिक आधार के नई आरक्षण श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का अर्थ धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं है और न ही अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित किया है। निर्णय मुख्य रूप से सरकारी आरक्षण की पात्रता और सामाजिक वर्गीकरण की संवैधानिक प्रक्रिया से संबंधित है।
इसी तरह यह भी कहना गलत होगा कि किसी गैर-हिंदू धर्म का व्यक्ति पिछड़ा वर्ग आरक्षण प्राप्त ही नहीं कर सकता। भारत में अनेक मुस्लिम और ईसाई समुदाय विभिन्न राज्यों तथा केंद्रीय पिछड़ा वर्ग सूचियों में शामिल हैं और पात्र होने पर उन्हें आरक्षण मिलता है।
विवाद इस बात पर है कि किसी व्यक्ति को उस अधिसूचित समुदाय का सदस्य किस आधार पर माना जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अब स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन और पुराने जातिगत दर्जे से यह सदस्यता स्वतः नहीं बनती।
यही 15 अक्टूबर के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी संदेश है।
तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश रद्द ही रहेगा, समीर अहमद को केवल धर्म परिवर्तन और पूर्व सामाजिक स्थिति के आधार पर मुस्लिम लब्बाई पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र देने का दावा स्वीकार नहीं किया गया है और राज्य सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील खारिज हो चुकी है।
आने वाले समय में यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ बन सकता है जहां धार्मिक परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति की आरक्षण श्रेणी और सामुदायिक पहचान को लेकर विवाद पैदा होता है।