दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में जंगली भालू के हमले में चार लोग घायल हो गए। घटना दमहाल हांजीपोरा क्षेत्र के नंदीमार्ग नार्ड इलाके में हुई, जहां अचानक भालू के संपर्क में आए दो पुरुषों और दो महिलाओं पर उसने हमला कर दिया। घायलों में दोनों महिलाओं की हालत गंभीर बताई गई है, जबकि दोनों पुरुषों की स्थिति स्थिर है। घटना के बाद वन्यजीव विभाग की टीम को इलाके में भेजा गया है और भालू का पता लगाकर उसे सुरक्षित तरीके से पकड़ने की कोशिश की जा रही है।
घायलों की पहचान 60 वर्षीय शफीका बानो, 50 वर्षीय आयशा बानो, मोहम्मद इकबाल भट और अब्दुल सलाम के रूप में हुई है। सभी सीआर पोरा क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार हमले के तुरंत बाद घायलों को चिकित्सा सहायता के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। दो महिलाओं को गंभीर चोटें आई हैं, जबकि दोनों पुरुषों की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है।
अधिकारियों की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि भालू अचानक आबादी वाले क्षेत्र तक कैसे पहुंचा या हमला किस परिस्थिति में शुरू हुआ। घटना के बाद स्थानीय लोगों में दहशत का माहौल है। वन्यजीव विभाग की टीम आसपास के क्षेत्र में तलाशी अभियान चला रही है ताकि जानवर को आबादी से दूर किया जा सके और किसी दूसरी घटना को रोका जा सके।
हमले के बाद स्थानीय लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। विशेष रूप से खेतों, बगीचों, झाड़ियों वाले क्षेत्रों और जंगल से सटे रास्तों पर अकेले जाने से बचने को कहा जा रहा है। भालू दिखाई देने पर उसके करीब जाने, उसे घेरने या मोबाइल से वीडियो बनाने के लिए पीछा करने जैसी गतिविधियां गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।
दक्षिण कश्मीर में हाल के दिनों में जंगली भालुओं के इंसानों के संपर्क में आने की कई घटनाएं सामने आई हैं। 14 अक्टूबर को पुलवामा जिले के परिगाम इलाके में भी एक व्यक्ति भालू के हमले में घायल हुआ था। घायल की पहचान हरिपरिगाम निवासी मुजफ्फर अहमद गनी के रूप में हुई थी। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था।
इससे कुछ दिन पहले त्राल क्षेत्र में भी भालू के हमले की अलग-अलग घटनाएं सामने आई थीं। 6 अक्टूबर को नागबल गांव में मुश्ताक अहमद नाम के व्यक्ति पर भालू ने हमला किया था। वह सुबह घर से बाहर निकले थे, तभी जंगली जानवर ने उन्हें घायल कर दिया। वन्यजीव विभाग की टीम को उस घटना के बाद भी इलाके में भेजा गया था।
इसके अगले दिन त्राल के मोंघामा डंकाड इलाके में बिलाल अहमद नाम के व्यक्ति पर भी भालू ने हमला किया। उन्हें पहले उप-जिला अस्पताल त्राल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए श्रीनगर रेफर किया गया। इन लगातार घटनाओं ने दक्षिण कश्मीर के कई ग्रामीण क्षेत्रों में इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर चिंता बढ़ाई है।
कुलगाम की ताजा घटना इस समस्या की गंभीरता को फिर सामने लाती है। पहाड़ी और वन क्षेत्रों से सटे गांवों में रहने वाले लोगों के लिए भालू से सामना कोई पूरी तरह असामान्य घटना नहीं है, लेकिन जब जानवर मानव बस्तियों, बगीचों या खेतों के नजदीक पहुंचता है तो अचानक हमला होने का खतरा बढ़ जाता है।
कश्मीर घाटी में मुख्य रूप से एशियाई काला भालू पाया जाता है। इसे हिमालयी काला भालू भी कहा जाता है। यह आम तौर पर जंगलों, पहाड़ी ढलानों और फलदार क्षेत्रों में भोजन की तलाश करता है। मौसम और उपलब्ध भोजन के अनुसार इसकी गतिविधि बदलती रहती है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में कश्मीर घाटी में मानव-भालू संघर्ष को लंबे समय से गंभीर वन्यजीव प्रबंधन चुनौती बताया गया है। वर्ष 2000 से 2020 के बीच जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग के आंकड़ों के आधार पर किए गए एक अध्ययन में घाटी में एशियाई काले भालुओं के हमलों की 2,357 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इनमें 2,243 मामलों में लोग घायल हुए और 114 घटनाओं में मौत हुई।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि भालू के साथ टकराव केवल कभी-कभार होने वाली घटना नहीं बल्कि कई वर्षों से मौजूद समस्या है। इसी अध्ययन में पाया गया कि जुलाई से नवंबर के बीच हमलों की संख्या सबसे अधिक रही। यह वही समय होता है जब कश्मीर में कई कृषि और बागवानी गतिविधियां तेज रहती हैं और बड़ी संख्या में लोग खेतों तथा बगीचों में काम करते हैं।
कुलगाम में हुई घटना भी अक्टूबर में सामने आई है, जो ऐतिहासिक रूप से अधिक मानव-भालू टकराव वाले महीनों में शामिल रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार प्राकृतिक आवास के कृषि क्षेत्रों और बगीचों में बदलने को मानव-भालू संघर्ष बढ़ने के महत्वपूर्ण कारणों में माना गया है। काले भालू फलों और दूसरे खाद्य स्रोतों की तलाश में बगीचों और कृषि क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं। इसी दौरान सुबह या शाम खेतों में काम करने वाले लोगों का उनसे अचानक सामना हो सकता है।
कश्मीर में सेब और दूसरे फलदार बगीचों का बड़ा क्षेत्र है। पके हुए फल भालुओं के लिए आसानी से उपलब्ध भोजन का स्रोत बन सकते हैं। जंगल और मानव आबादी के बीच स्पष्ट दूरी कम होने पर दोनों के रास्ते बार-बार एक-दूसरे से टकराने लगते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भालू का आबादी में दिखाई देना हमेशा इस बात का संकेत नहीं होता कि वह इंसानों पर हमला करने के लिए आया है। कई बार वह भोजन की तलाश में मानव क्षेत्र में पहुंच जाता है या जंगल की ओर लौटते समय लोगों से घिर जाता है। लेकिन यदि भालू को खतरा महसूस हो, उसके भागने का रास्ता बंद हो या कोई व्यक्ति अचानक बहुत करीब पहुंच जाए तो वह हमला कर सकता है।
इसी कारण वन्यजीव विभाग आम तौर पर लोगों से जंगली जानवर को घेरने से बचने की अपील करता है। किसी भालू के आसपास भीड़ जमा होने से स्थिति और खतरनाक हो सकती है। शोर, पत्थरबाजी या उसका पीछा करने से जानवर घबराकर किसी भी दिशा में दौड़ सकता है और लोगों पर हमला कर सकता है।
नंदीमार्ग क्षेत्र में भी वन्यजीव विभाग की टीम की प्राथमिकता भालू का पता लगाना और उसे नियंत्रित तरीके से आबादी से दूर करना है। अधिकारियों ने आसपास के लोगों से टीम को सहयोग देने और स्वयं जानवर को पकड़ने या भगाने की कोशिश न करने को कहा है।
भालू पकड़ने की कार्रवाई परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। यदि जानवर किसी सीमित क्षेत्र में मौजूद हो और लगातार मानव बस्तियों में घूम रहा हो तो वन्यजीव विशेषज्ञ पिंजरा, निगरानी या आवश्यक होने पर बेहोश करने की प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन इस तरह की कार्रवाई प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा ही की जाती है।
कश्मीर में जंगली जानवरों के मानव बस्तियों में आने की समस्या केवल भालुओं तक सीमित नहीं है। तेंदुए और दूसरे वन्यजीव भी समय-समय पर आबादी वाले इलाकों में दिखाई देते हैं। जंगलों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों और कृषि भूमि के विस्तार से इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच साझा क्षेत्र बढ़ गए हैं।
इसी वजह से मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल किसी एक जानवर को पकड़ने की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक घटना के पीछे स्थानीय भूगोल, भोजन की उपलब्धता, जंगलों की स्थिति, बागवानी गतिविधियां और मानव आबादी का विस्तार जैसे कई कारण हो सकते हैं।
कश्मीर हिमालय पर किए गए हालिया अध्ययनों में भी मानव भूमि उपयोग के विस्तार, मौसमी भोजन की कमी, आवास पर दबाव और फसलों की उपलब्धता को मानव-भालू संपर्क बढ़ने से जोड़ा गया है।
ऐसे क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण उपाय शुरुआती चेतावनी और स्थानीय लोगों को सही व्यवहार की जानकारी देना है। यदि किसी गांव के पास भालू देखा गया है तो वन्यजीव विभाग को तुरंत सूचना देना और लोगों को उसी क्षेत्र से कुछ समय तक दूर रखना आगे के हमले को रोक सकता है।
भालू के सामने अचानक आने पर भागना भी कई परिस्थितियों में जोखिमपूर्ण हो सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञ सामान्य रूप से लोगों को शांत रहने, जानवर को पर्याप्त दूरी और निकलने का रास्ता देने तथा सीधे उसके करीब नहीं जाने की सलाह देते हैं।
यदि भालू दूर दिखाई दे तो उसके पास जाकर फोटो या वीडियो बनाने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। खासकर यदि आसपास उसके बच्चे मौजूद हों तो मादा भालू अत्यधिक रक्षात्मक हो सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों और बुजुर्गों को भी अकेले जंगल या घनी झाड़ियों के पास नहीं जाने देना महत्वपूर्ण है। खेतों या बगीचों में काम करते समय आसपास की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए और ऐसे क्षेत्रों में जहां हाल में भालू देखा गया हो, समूह में जाना अधिक सुरक्षित हो सकता है।
कश्मीर में सेब तथा दूसरे फलों की कटाई का मौसम मानव-भालू संघर्ष के लिए संवेदनशील समय माना जाता है। शोध में पाया गया है कि बड़ी संख्या में हमले उन लोगों पर हुए जो खेतों या बगीचों में काम कर रहे थे। सुबह के समय भी हमलों की संख्या अधिक पाई गई, जब लोग कृषि कार्य के लिए बाहर निकलते हैं।
इसलिए कुलगाम और पुलवामा जैसे क्षेत्रों में हाल की घटनाओं के बाद स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना आवश्यक माना जा रहा है।
घटना के बाद वन्यजीव विभाग को केवल जानवर तलाशने की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि यह भी देखना पड़ता है कि वह क्षेत्र में क्यों आया और क्या आसपास किसी अन्य भालू की गतिविधि भी है। कई बार पैरों के निशान, मल, भोजन के अवशेष और स्थानीय लोगों की जानकारी के आधार पर जानवर की गतिविधियों का अनुमान लगाया जाता है।
यदि किसी क्षेत्र में बार-बार भालू दिखाई दे तो निगरानी कैमरे लगाने जैसे उपाय भी किए जा सकते हैं। इससे वन्यजीव अधिकारियों को यह समझने में मदद मिलती है कि जानवर किस समय और किस रास्ते से आबादी के करीब आ रहा है।
मानव-भालू संघर्ष में एक और बड़ी चुनौती यह है कि घटना के बाद गुस्साए लोग जानवर को मारने या घायल करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे न केवल वन्यजीव संरक्षण कानून का उल्लंघन हो सकता है बल्कि आसपास मौजूद लोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।
भालू पर हमला करने से वह और आक्रामक हो सकता है और भागते समय दूसरे लोगों को घायल कर सकता है। इसलिए वन्यजीव विभाग की प्रशिक्षित टीम का इंतजार करना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
कुलगाम की घटना में दो महिलाओं की गंभीर स्थिति ने स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों पुरुष स्थिर हैं, लेकिन महिलाओं की चिकित्सा स्थिति पर नजर रखी जा रही है। उनके उपचार से जुड़ी विस्तृत नई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
अधिकारियों ने अभी यह भी नहीं बताया है कि घटना के समय चारों लोग किसी खेत, बगीचे या सड़क पर थे। इसलिए हमले की सटीक परिस्थितियों को लेकर अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
वन्यजीव टीम द्वारा भालू को खोजने का अभियान जारी रहने के कारण आसपास के ग्रामीणों को सावधान रहने की आवश्यकता है। जब तक विभाग यह पुष्टि नहीं करता कि जानवर को क्षेत्र से हटा दिया गया है या वह जंगल की ओर वापस जा चुका है, आसपास अनावश्यक आवाजाही से बचना सुरक्षित रहेगा।
हालिया घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि दक्षिण कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में भालू की गतिविधि एक से अधिक स्थानों पर दिखाई दे रही है। कुलगाम के अलावा पुलवामा और त्राल क्षेत्रों में भी अक्टूबर के दौरान हमले दर्ज किए गए हैं। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि सभी घटनाओं में एक ही भालू शामिल हो। अलग-अलग वन क्षेत्रों से जुड़े अलग जानवर इन घटनाओं के पीछे हो सकते हैं।
वन्यजीवों की गतिविधि पर मौसम का भी प्रभाव पड़ता है। सर्दियां शुरू होने से पहले भालू पर्याप्त भोजन जुटाने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान वे फलदार बगीचों और अन्य भोजन वाले क्षेत्रों की ओर अधिक सक्रियता से जा सकते हैं।
ऐसी स्थिति में घरों के आसपास खाने का कचरा खुले में छोड़ना भी जानवरों को आकर्षित कर सकता है। ग्रामीण और वन क्षेत्रों के पास रहने वाले परिवारों के लिए जैविक कचरे और भोजन के अवशेषों का सुरक्षित निस्तारण मानव-वन्यजीव संपर्क कम करने में उपयोगी हो सकता है।
बगीचों में गिरे फलों को लंबे समय तक पड़ा रहने देना भी भालुओं और दूसरे वन्यजीवों को आकर्षित कर सकता है। इसलिए फसल कटाई के मौसम में जमीन पर पड़े फलों को समय पर हटाना और बगीचे के आसपास झाड़ियों को नियंत्रित करना जोखिम कम करने के उपायों में शामिल हो सकता है।
रात के समय गांवों और खेतों के आसपास पर्याप्त रोशनी भी लोगों को वन्यजीवों की मौजूदगी जल्दी पहचानने में मदद कर सकती है। हालांकि किसी भालू को तेज रोशनी या शोर से जानबूझकर परेशान करना सुरक्षित नहीं माना जाता।
ऐसी घटनाओं में सबसे पहले घायल व्यक्ति की चिकित्सा सहायता प्राथमिकता होती है। भालू के हमले में चेहरे, सिर और शरीर के ऊपरी हिस्से पर गंभीर चोट लग सकती है क्योंकि जानवर अपने पंजों और दांतों का इस्तेमाल करता है। गंभीर रक्तस्राव या गहरी चोट की स्थिति में तत्काल अस्पताल पहुंचाना आवश्यक है।
हमले के बाद घाव संक्रमण का जोखिम भी पैदा कर सकते हैं। इसलिए घायल व्यक्ति को केवल प्राथमिक पट्टी करके घर पर छोड़ने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
कुलगाम के चारों घायलों को उपचार के लिए चिकित्सा केंद्र पहुंचाया गया है और दो महिलाओं की हालत गंभीर होने के कारण उनकी निगरानी की जा रही है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए केवल प्रतिक्रिया आधारित व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी जाती। जिन क्षेत्रों में बार-बार घटनाएं होती हैं वहां वन्यजीव विभाग, स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के बीच नियमित जानकारी साझा करना अधिक प्रभावी हो सकता है।
गांव स्तर पर ऐसे लोगों को प्रशिक्षित किया जा सकता है जो भालू या तेंदुए की मौजूदगी की तत्काल सूचना विभाग को दें और बाकी लोगों को सुरक्षित दूरी पर रखें।
वन क्षेत्रों के आसपास चेतावनी संकेत, स्थानीय हेल्पलाइन और त्वरित प्रतिक्रिया टीम की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कश्मीर घाटी में दो दशकों के आंकड़े दिखाते हैं कि अधिकांश भालू हमले घातक नहीं होते, लेकिन गंभीर चोट का जोखिम काफी अधिक रहता है। 2000 से 2020 के बीच दर्ज 2,357 हमलों में 95 प्रतिशत से अधिक घटनाओं में व्यक्ति घायल हुआ, जबकि करीब 4.8 प्रतिशत मामलों में मौत दर्ज की गई।
इसी अध्ययन में बड़ी संख्या में घायलों को गंभीर चोटें आने का भी उल्लेख किया गया है। इसलिए ऐसी घटनाओं को सामान्य वन्यजीव गतिविधि कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही वन्यजीवों को पूरी तरह समस्या के रूप में देखना भी समाधान नहीं है। भालू हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण आवश्यक है।
सबसे प्रभावी रणनीति इंसानों और वन्यजीवों के संपर्क को सुरक्षित स्तर तक कम करना है। इसके लिए प्राकृतिक आवास का संरक्षण, कचरा प्रबंधन, बागवानी क्षेत्रों में सावधानियां, स्थानीय चेतावनी प्रणाली और वैज्ञानिक वन्यजीव प्रबंधन एक साथ जरूरी हैं।
कुलगाम जिले के नंदीमार्ग नार्ड इलाके की घटना के बाद फिलहाल तत्काल चुनौती भालू को आबादी से दूर करना है। वन्यजीव विभाग की टीम क्षेत्र में मौजूद है और जानवर का पता लगाने का प्रयास कर रही है।
स्थानीय लोगों के लिए प्रशासन की सलाह का पालन करना महत्वपूर्ण है। जब तक क्षेत्र सुरक्षित घोषित न हो, जंगल, घनी झाड़ियों और उन रास्तों पर अनावश्यक जाने से बचना चाहिए जहां भालू देखे जाने की सूचना मिली है।
फिलहाल घटना में चार लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है। इनमें शफीका बानो और आयशा बानो की स्थिति गंभीर बताई गई है, जबकि मोहम्मद इकबाल भट और अब्दुल सलाम की हालत स्थिर है। सभी सीआर पोरा के निवासी हैं।
घटना के बाद वन्यजीव विभाग की टीम भालू को तलाश रही है। अधिकारियों की ओर से आगे की कार्रवाई और घायलों की स्थिति से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी का इंतजार है।
दक्षिण कश्मीर में अक्टूबर के दौरान सामने आए कई भालू हमलों ने एक बार फिर मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती को सामने ला दिया है। कुलगाम की घटना में चार लोगों का घायल होना इस बात का संकेत है कि वन क्षेत्रों से सटे गांवों में निगरानी, जागरूकता और त्वरित वन्यजीव प्रतिक्रिया व्यवस्था को लगातार सक्रिय रखना कितना जरूरी है।