भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। हैदराबाद स्थित निजी स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अपने पहले ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण कर भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जहां निजी कंपनियां स्वतंत्र रूप से ऑर्बिट तक रॉकेट पहुंचाने में सफल रही हैं।
‘मिशन आगमन’ नाम से संचालित इस उड़ान का प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) से किया गया। लॉन्च के करीब 15 मिनट बाद विक्रम-1 ने अपने सभी निर्धारित पेलोड को लगभग 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। यह मिशन स्काईरूट की पहली ऑर्बिटल टेस्ट फ्लाइट थी और इसे पूरी तरह सफल बताया गया है।
विक्रम-1 भारत का पहला ऐसा ऑर्बिटल रॉकेट है जिसे किसी निजी भारतीय कंपनी ने डिजाइन, विकसित और निर्मित किया है। इससे पहले भारतीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण मुख्य रूप से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेतृत्व में होते रहे हैं। निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र खोले जाने के बाद यह उपलब्धि भारत के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है।
करीब 22 मीटर लंबा विक्रम-1 चार चरणों वाला प्रक्षेपण यान है। इसमें ठोस ईंधन (Solid Fuel) आधारित शुरुआती चरणों के साथ अंतिम चरण में 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन का उपयोग किया गया है। यह रॉकेट छोटे और मध्यम आकार के उपग्रहों को तेज और किफायती तरीके से अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए विकसित किया गया है।
इस मिशन में भारतीय और विदेशी ग्राहकों के कई तकनीकी एवं व्यावसायिक पेलोड भी शामिल थे। स्काईरूट के अनुसार विक्रम-1 को छोटे उपग्रहों के लिए ऑन-डिमांड लॉन्च सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है, जिससे वैश्विक कमर्शियल लॉन्च बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में पूर्व इसरो वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी। कंपनी ने वर्ष 2022 में विक्रम-एस नामक भारत का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर इतिहास बनाया था। अब विक्रम-1 की सफलता को उस उपलब्धि का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि पर स्काईरूट की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक ऐतिहासिक पड़ाव है और देश के युवाओं, वैज्ञानिकों तथा नवाचार की क्षमता का प्रमाण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए वैश्विक बाजार के नए अवसर खोल सकती है। दुनिया भर में छोटे उपग्रहों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और कम लागत वाले लॉन्च वाहनों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में स्काईरूट जैसी भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए प्रतिस्पर्धी विकल्प बन सकती हैं।
भारत सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी को कई गुना बढ़ाना है। निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी, नई तकनीकों और कमर्शियल लॉन्च सेवाओं के विस्तार से इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलने की उम्मीद है। विक्रम-1 की सफलता को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
फिलहाल स्काईरूट ने स्पष्ट किया है कि विक्रम-1 के बाद कंपनी कुछ और परीक्षण उड़ानें करेगी। इनके सफल होने के बाद नियमित व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं शुरू करने की योजना है। यदि यह योजना सफल रहती है, तो भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग वैश्विक स्पेस लॉन्च बाजार में और मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है।
