मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान- अमेरिका संघर्ष एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। युद्ध के 120वें दिन ईरान ने अमेरिका द्वारा किए गए ताजा हवाई हमलों की कड़ी निंदा करते हुए आरोप लगाया कि ये कार्रवाई हाल ही में हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का स्पष्ट उल्लंघन है। ईरान का कहना है कि समझौते का उद्देश्य सैन्य तनाव कम करना और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना था, लेकिन अमेरिकी हमलों ने इस प्रयास को कमजोर कर दिया है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने जारी बयान में अमेरिकी हमलों को “आक्रामक और अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध” बताया। मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका ने दक्षिणी ईरान में मिसाइल, ड्रोन और रडार प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया, जबकि वाशिंगटन का दावा है कि यह कार्रवाई हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में एक वाणिज्यिक मालवाहक जहाज पर हुए ड्रोन हमले के जवाब में की गई।
अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के अनुसार हाल के दिनों में सिंगापुर के ध्वज वाले एक मालवाहक जहाज पर ड्रोन हमला हुआ था। अमेरिका ने इस घटना के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जवाबी सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी। हालांकि ईरान ने अमेरिकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसकी कार्रवाई आत्मरक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के जवाब में उसने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों से जुड़े लक्ष्यों को निशाना बनाया। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि तत्काल नहीं हो सकी। अमेरिकी अधिकारियों ने भी क्षेत्र में तनाव बढ़ने की बात स्वीकार की, लेकिन विस्तृत क्षति का आधिकारिक विवरण तत्काल जारी नहीं किया गया।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब कुछ ही दिन पहले अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत तनाव कम करने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर सहमति बनी थी। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य टकराव को रोकना और विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना था। अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर इसी समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं।
अमेरिका का कहना है कि ईरान समर्थित ड्रोन हमले ने समझौते की भावना को तोड़ा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खतरा पैदा किया। वहीं तेहरान का दावा है कि अमेरिकी हवाई हमले पहले हुए और उन्होंने ही समझौते को कमजोर किया। इस तरह दोनों देशों के बयान एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं और घटनाक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या तनाव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर पड़ता है। हाल के घटनाक्रम के बाद भी निवेशकों और ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ी है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई का यह सिलसिला जारी रहता है तो मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री परिवहन पर भी असर पड़ सकता है। कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की अपील की है।
भारत सहित कई देश हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है। यदि तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि होती है तो ईंधन लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी रह सकती है। हालांकि फिलहाल बाजार की दिशा आने वाले घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।
फिलहाल यह एक विकासशील (Breaking) घटनाक्रम है। अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने दावों पर कायम हैं और स्थिति लगातार बदल रही है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक वार्ता, सैन्य गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं के आधार पर इस संघर्ष की दिशा तय होगी।
