संगम की रेती पर आस्था का चमत्कार: देवरहा बाबा के शिष्य का पंडाल, 20 साल से जल रही चार मंजिला अखंड ज्योति
प्रयागराज की संगम रेती पर हर साल माघ मेले के दौरान आस्था का महासागर उमड़ता है। साधु-संतों की साधना, कल्पवासियों का तप और असंख्य पंडाल मिलकर इस धार्मिक आयोजन को एक जीवंत उत्सव बनाते हैं। इसी अस्थायी संसार के बीच एक ऐसा पंडाल भी है, जो स्थायित्व, साधना और आस्था की मिसाल बन चुका है।
यह अनोखा पंडाल झूसी पुल के नीचे स्थित है और इसका संचालन महंत रामदास, जो कि देवरहा बाबा के शिष्य हैं, द्वारा किया जाता है।
बाढ़ और वक्त से अडिग, साल भर खड़ा रहने वाला पंडाल
जहां माघ मेला और महाकुंभ के दौरान अधिकांश पंडाल हर साल बनते और फिर उखड़ जाते हैं, वहीं यह पंडाल साल भर स्थायी रूप से खड़ा रहता है। बाढ़ के मौसम में जब संगम क्षेत्र का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो जाता है, तब भी यह पंडाल तपस्वी की तरह अडिग रहता है—मानो इसे जमीन ने नहीं, आस्था और विश्वास ने थाम रखा हो।
20 फीट ऊंची कुटिया, सादगी में बसी साधना
पंडाल की पहचान है इसकी 20 फीट ऊंची कुटिया, जिसमें देवरहा बाबा और भगवान का छोटा सा मंदिर स्थापित है। यहीं महंत रामदास प्रतिदिन पूजा-पाठ करते हैं।कुटिया में न कोई दिखावा है, न सजावट—बस मौन, मंत्र और ध्यान की शांति, जो श्रद्धालुओं को भीतर तक छू जाती है।
चार मंजिला अखंड ज्योति, जो 20 वर्षों से जल रही है
इस पंडाल की सबसे अद्भुत पहचान है कुटिया के पास जल रही चार मंजिला इमारत जितनी ऊंची अखंड ज्योति। यह ज्योति पिछले 20 वर्षों से लगातार प्रज्ज्वलित है।न इसे छुआ जाता है, न इसकी नियमित पूजा होती है। इसकी संरचना और डिजाइन इस तरह तैयार की गई है कि लौ बिना बाधा, दिन-रात जलती रहे। यह ज्योति देश की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना के लिए प्रज्ज्वलित की गई थी।
श्रद्धा, जिज्ञासा और तपस्या का संगम
माघ मेले में आने वाले श्रद्धालु जब इस अखंड ज्योति को देखते हैं, तो श्रद्धा से भर उठते हैं।कोई पूछता है—इतने सालों से यह लौ कैसे जल रही है?कोई इसे तपस्या का चमत्कार मानता है, तो कोई परंपरा की शक्ति।
देवरहा बाबा की परंपरा: सेवा और साधना
महंत रामदास बताते हैं कि यह पंडाल दिखावे से दूर रहकर सेवा और साधना का प्रतीक है। देवरहा बाबा की परंपरा में आडंबर नहीं, बल्कि तप और करुणा को प्राथमिकता दी जाती है।यहां निरंतर भंडारा चलता है, जहां बिना भेदभाव सभी को भोजन कराया जाता है। यही सेवा भाव इस स्थान की आत्मा है।
अस्थायी मेले की स्थायी आत्मा
झूसी क्षेत्र के अन्य पंडालों की तुलना में यह पंडाल अलग पहचान रखता है। जहां चारों ओर शोर और भीड़ है, वहीं यहां एक ठहराव, एक शांति है।लोग कुछ पल बैठते हैं, अखंड ज्योति को निहारते हैं और भीतर से बदलकर लौटते हैं।
प्रयागराज का माघ मेला हर साल बसता और बिखरता है, लेकिन महंत रामदास का यह पंडाल उस अस्थायी शहर की स्थायी आत्मा जैसा है।चार मंजिला अखंड ज्योति, दो दशक की निरंतरता और देवरहा बाबा की परंपरा—ये तीनों मिलकर इस पंडाल को एक ऐसी कहानी बना देते हैं, जो हर साल नए श्रद्धालुओं को बुलाती है और पुराने विश्वास को और गहरा कर देती है।








