भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई में संगठनात्मक नियुक्तियों और सूचियों को लेकर लगातार सामने आ रही चूकों ने पार्टी के अंदर की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ओर से शनिवार को विभिन्न प्रकोष्ठों की नई प्रदेश टीमों की घोषणा के बाद अंबेडकरनगर से सामने आया एक मामला सबसे ज्यादा चर्चा में है। श्रम प्रकोष्ठ की 11 सदस्यीय प्रदेश टीम में ऐसे राम सूरत मौर्य का नाम सदस्य के तौर पर शामिल कर दिया गया, जिनका करीब एक वर्ष पहले निधन हो चुका है।
राम सूरत मौर्य अंबेडकरनगर के टांडा क्षेत्र से जुड़े भाजपा नेता बताए जाते हैं। पार्टी की नई सूची में उनका नाम शामिल होने के बाद स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश संगठन तक सवाल उठने लगे हैं कि आखिर संगठन की इतनी महत्वपूर्ण सूची तैयार करते समय नामों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मामले की जानकारी सामने आने के बाद अंबेडकरनगर भाजपा जिलाध्यक्ष दिलीप देव पटेल ने गलती की बात स्वीकार करते हुए प्रदेश संगठन को इसकी सूचना दिए जाने और संशोधित सूची जारी होने की बात कही है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा की प्रदेश इकाई इन दिनों मिशन-2027 की तैयारियों के तहत संगठन को व्यापक स्तर पर पुनर्गठित कर रही है। कुछ ही दिन पहले प्रदेश कार्यसमिति की बड़ी सूची जारी की गई थी, जिसमें 548 कार्यसमिति सदस्य, 134 विशेष आमंत्रित सदस्य और 30 स्थायी आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए थे। इतनी बड़ी संख्या में पदाधिकारियों और सदस्यों वाली सूची को पार्टी के आगामी विधानसभा चुनाव की संगठनात्मक तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन कार्यसमिति की सूची जारी होने के बाद भी नामों को लेकर सवाल उठे थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सूची में ऐसे नामों को लेकर आपत्ति सामने आई जो पार्टी छोड़कर दूसरी राजनीतिक पार्टी में जा चुके थे। कुछ नामों के दोहराए जाने की बात भी सामने आई। अंबेडकरनगर के राम सूरत मौर्य का नाम अब नई श्रम प्रकोष्ठ सूची में सामने आने के बाद पुरानी चूकों की चर्चा फिर तेज हो गई है।
दिवंगत नेता को पद मिलने पर उठे सवाल
राम सूरत मौर्य के मामले ने संगठन की सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सीधा सवाल खड़ा किया है। सामान्य तौर पर किसी भी प्रदेश स्तरीय संगठनात्मक नियुक्ति से पहले संबंधित व्यक्ति की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और उपलब्धता की जानकारी जिला व क्षेत्रीय संगठन से ली जाती है। ऐसे में किसी दिवंगत नेता का नाम नई टीम में शामिल हो जाना केवल टाइपिंग या प्रिंटिंग की गलती भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे संगठन के भीतर सूचनाओं के आदान-प्रदान और अंतिम स्तर पर सूची के सत्यापन की प्रक्रिया पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि राम सूरत मौर्य का नाम किस स्तर पर प्रस्तावित हुआ और अंतिम सूची में शामिल होने से पहले उसका सत्यापन किस स्तर पर किया गया। भाजपा की ओर से इस मामले में विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने तक किसी एक व्यक्ति या अधिकारी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संशोधित सूची जारी किए जाने की बात सामने आई है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक अलग पहलू यह भी है कि संगठन में सक्रिय रहे किसी कार्यकर्ता को उसके जीवनकाल में पद न मिल पाने और निधन के बाद संगठनात्मक सूची में नाम आने को लेकर स्थानीय स्तर पर भावनात्मक और राजनीतिक चर्चा हो रही है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि राम सूरत मौर्य को उनके जीवनकाल में कोई पद नहीं मिला था। इसलिए इस हिस्से को राजनीतिक प्रतिक्रिया या स्थानीय चर्चा के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
कार्यसमिति की बड़ी सूची के बाद दूसरी चूक
राम सूरत मौर्य का मामला उस समय सामने आया है जब प्रदेश भाजपा पहले ही अपनी विशाल कार्यसमिति की सूची को लेकर चर्चा में है। 26 अक्टूबर को प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ओर से प्रदेश कार्यसमिति-2026 की सूची जारी की गई थी। इसमें 548 कार्यसमिति सदस्य, 134 विशेष आमंत्रित सदस्य और 30 स्थायी आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए थे।
यह सूची केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं थी, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की चुनावी तैयारी का बड़ा हिस्सा मानी जा रही है। कार्यसमिति में प्रदेश के सभी प्रमुख क्षेत्रों और जिलों को प्रतिनिधित्व दिया गया। पार्टी ने पश्चिम, ब्रज, कानपुर, अवध, काशी और गोरखपुर क्षेत्रों के आधार पर संगठनात्मक प्रतिनिधित्व तैयार किया है।
इतनी बड़ी सूची तैयार करने का उद्देश्य पार्टी के विभिन्न सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक समूहों को संगठन में स्थान देना है। लेकिन जब इसी सूची में नामों की पुनरावृत्ति या पार्टी छोड़ चुके नेताओं के नाम शामिल होने जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कार्यसमिति की सूची में कुछ ऐसे नामों को लेकर भी विवाद सामने आया जो पार्टी छोड़ चुके थे। इसके अलावा कुछ नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होने की बात भी सामने आई। अब श्रम प्रकोष्ठ की सूची में दिवंगत नेता का नाम शामिल होने से इन घटनाओं को एक ही क्रम में जोड़कर देखा जा रहा है।
कानपुर में आईटी सेल की नियुक्ति पर भी विवाद
संगठनात्मक सूचियों को लेकर विवाद केवल नामों की त्रुटियों तक सीमित नहीं है। कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में भाजपा की क्षेत्रीय आईटी सेल के पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर भी हाल में मतभेद सामने आया। प्रदेश कार्यालय की ओर से आईटी सेल के लिए सुरेंद्र विश्वकर्मा को संयोजक और अभिषेक पांडेय को सहसंयोजक बनाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद क्षेत्रीय स्तर पर अलग नामों की चर्चा शुरू हो गई।
इस मामले में क्षेत्रीय अध्यक्ष रामकिशोर साहू ने अलग सूची जारी करने या प्रदेश नेतृत्व के निर्णय को खारिज करने के आरोप से इनकार किया। उनके पक्ष की ओर से कहा गया कि संबंधित पदाधिकारियों ने काम करने में असमर्थता जताई थी और प्रदेश कार्यालय से बातचीत के बाद स्थिति स्पष्ट की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि क्षेत्रीय अध्यक्ष की ओर से कोई अलग नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया।
यानी कानपुर का मामला सीधे तौर पर किसी अंतिम संगठनात्मक टूट या प्रदेश नेतृत्व और क्षेत्रीय नेतृत्व के बीच टकराव के रूप में स्थापित नहीं हुआ है। लेकिन नियुक्तियों को लेकर अलग-अलग स्तर पर सामने आई सूचनाओं ने भ्रम जरूर पैदा किया। यही वजह है कि अब संगठन के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि प्रदेश से क्षेत्र तक नियुक्तियों की सूचना और अनुमोदन की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट है।
महिला मोर्चा की सूची को लेकर भी चर्चा
इसी बीच अवध क्षेत्र की महिला मोर्चा टीम को लेकर भी सूची में बदलाव और संशोधन की चर्चा सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महिला मोर्चा की क्षेत्रीय टीम की घोषणा के बाद कुछ नामों को लेकर सवाल उठे और सूची को सुधार के लिए वापस लिए जाने की बात सामने आई है। नई सूची जारी किए जाने की प्रतीक्षा है।
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा नेतृत्व पहले ही संगठन में महिलाओं और युवाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने पर जोर देता रहा है। इस साल संगठनात्मक बैठकों में मोर्चों और क्षेत्रीय टीमों को समयबद्ध तरीके से गठित करने की दिशा में निर्देश दिए गए थे।
अवध क्षेत्र की महिला मोर्चा सूची में यदि वास्तव में नामों को लेकर संशोधन किया जा रहा है, तो इसे अंतिम सूची जारी करने से पहले सुधार की प्रक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए। जब तक संशोधित सूची सामने नहीं आती, तब तक इसमें शामिल या हटाए गए किसी नाम को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मिशन-2027 के बीच संगठन पर बढ़ी जिम्मेदारी
उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए यह पूरा संगठनात्मक पुनर्गठन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। प्रदेश कार्यसमिति की 548 सदस्यीय सूची और विभिन्न प्रकोष्ठों की नई टीमों को इसी व्यापक संगठनात्मक अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।
शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ओर से 24 से अधिक प्रकोष्ठों की प्रदेश स्तरीय टीमों के संयोजक, सहसंयोजक और सदस्य घोषित किए गए। इनमें विधि, प्रबुद्ध, चिकित्सा, व्यवसायिक, व्यापार, शिक्षक, आर्थिक, खेलकूद, पर्यावरण, श्रम, सहकारिता, पूर्व सैनिक, दिव्यांग, एनजीओ, वरिष्ठ नागरिक और अन्य प्रकोष्ठ शामिल हैं। श्रम प्रकोष्ठ की कमान गोपाल अनजान को संयोजक के रूप में दी गई है।
इतने बड़े पैमाने पर संगठनात्मक नियुक्तियों का सीधा उद्देश्य अलग-अलग सामाजिक और पेशागत वर्गों तक पार्टी की पहुंच बढ़ाना है। 2027 के चुनाव को देखते हुए शिक्षक, व्यापारी, श्रमिक, किसान, युवा, महिला, पूर्व सैनिक, छोटे कारोबारी और अन्य समूहों से जुड़े प्रकोष्ठों को सक्रिय करना भाजपा की संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा है।
इसी वजह से नियुक्तियों की सूची में छोटी से छोटी त्रुटि भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन रही है। किसी मृत व्यक्ति का नाम शामिल होना, एक नाम का दोहराव, पार्टी छोड़ चुके व्यक्ति का नाम आना या प्रदेश और क्षेत्रीय स्तर पर नियुक्ति को लेकर अलग-अलग सूचनाएं सामने आना संगठन की डेटा और सत्यापन व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
क्या यह संगठनात्मक ‘हैंगओवर’ है?
इन घटनाओं के आधार पर भाजपा के अंदर संगठनात्मक स्तर पर भ्रम या समन्वय की कमी की राजनीतिक व्याख्या जरूर की जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह के नेतृत्व में संगठन को चुनावी मोड में लाने की प्रक्रिया चल रही है। दोनों नेताओं की अगुवाई में संगठनात्मक टीमों, मोर्चों और क्षेत्रीय इकाइयों के गठन पर लगातार काम हुआ है।
हालांकि, इसे सीधे तौर पर “पंकज चौधरी और धर्मपाल की जुगलबंदी का हैंगओवर” कहना एक राजनीतिक टिप्पणी होगी, स्थापित तथ्य नहीं। उपलब्ध घटनाक्रम से इतना जरूर स्पष्ट है कि नई संगठनात्मक टीमों के गठन के दौरान कई स्तरों पर नामों और नियुक्तियों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदेश संगठन इन गलतियों को कितनी तेजी से सुधारता है और भविष्य की सूचियों में ऐसी चूक रोकने के लिए क्या व्यवस्था अपनाता है।
भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के लिए यह विषय इसलिए भी अहम है क्योंकि संगठनात्मक सूचियां केवल पदों का वितरण नहीं होतीं। इन्हीं सूचियों के आधार पर क्षेत्रीय बैठकों, अभियानों, चुनावी कार्यक्रमों, बूथ स्तर की गतिविधियों और विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच का नेटवर्क तैयार किया जाता है। ऐसे में सूची में किसी व्यक्ति की स्थिति गलत दर्ज होना संबंधित संगठनात्मक गतिविधियों में भी भ्रम पैदा कर सकता है।
अब संशोधित सूचियों पर नजर
राम सूरत मौर्य का नाम श्रम प्रकोष्ठ की सूची से हटाकर संशोधित सूची कब जारी होती है, इस पर अब निगाह है। इसी तरह कार्यसमिति में सामने आई नाम संबंधी आपत्तियों और महिला मोर्चा की क्षेत्रीय सूची को लेकर उठे सवालों के बाद संगठन की ओर से कितनी तेजी से सुधार किया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अंबेडकरनगर संगठन की ओर से श्रम प्रकोष्ठ की सूची में हुई गलती की जानकारी प्रदेश संगठन को दिए जाने की बात सामने आई है। भाजपा की ओर से इस पूरे मामले पर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण अभी सामने नहीं आया है।
ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये अलग-अलग प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर की मामूली चूक हैं या प्रदेश भाजपा की नई टीम के गठन के दौरान समन्वय की कोई बड़ी समस्या सामने आ रही है। इसका जवाब संशोधित सूचियों और प्रदेश नेतृत्व की आगे की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा।
