लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों के उत्पीड़न, धर्म परिवर्तन के लिए कथित दबाव और शिकायतों को दबाने के आरोपों से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश शासन ने सख्त रुख अपनाया है। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने KGMU प्रशासन को कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। शासन की ओर से 30 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय के कुलसचिव को पत्र भेजकर जांच रिपोर्ट में चिह्नित डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने और उसकी अनुपालन रिपोर्ट शासन को उपलब्ध कराने को कहा गया है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि STF की करीब 10 महीने चली जांच में KGMU के अलग-अलग विभागों से जुड़ी शिकायतों और घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है। सात पन्नों की संस्तुति रिपोर्ट में पैथोलॉजी, गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी समेत कई विभागों में महिला डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य महिला कर्मचारियों से जुड़े कथित उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के दबाव के मामलों का जिक्र है। रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ डॉक्टरों और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
शासन ने KGMU कुलसचिव से मांगी कार्रवाई की रिपोर्ट
चिकित्सा शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी की ओर से KGMU के कुलसचिव को भेजे गए पत्र में STF की जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों का संज्ञान लेते हुए चिह्नित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने को कहा गया है। शासन ने KGMU अधिनियम-2002 और परिनियमावली-2011 के तहत आवश्यक विभागीय एवं विधिक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
इसके साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन से यह भी पूछा गया है कि रिपोर्ट में जिन लोगों की भूमिका चिह्नित की गई है, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट शासन को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसका मतलब यह है कि अब मामला केवल जांच रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि KGMU प्रशासन को चिह्नित डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका के संबंध में संस्थागत स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों से जुड़े गंभीर आरोप
STF की रिपोर्ट में कई महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की शिकायतों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में आरोपों के अनुसार कुछ मामलों में महिला डॉक्टरों या कर्मचारियों को कथित तौर पर प्रेम संबंध या शादी का झांसा देकर प्रभावित करने, धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए दबाव बनाने तथा विरोध करने पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की बात सामने आई।
कुछ शिकायतों में करियर प्रभावित करने, परीक्षा में फेल कराने या पेशेवर भविष्य खराब करने की धमकी दिए जाने के आरोपों का भी उल्लेख है। जांच रिपोर्ट में यह भी आरोप है कि कुछ शिकायतों पर संस्थान के स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई और पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाने या मामलों को दबाने की कोशिश हुई। इन सभी आरोपों की प्रकृति और संबंधित व्यक्तियों की व्यक्तिगत भूमिका अलग-अलग जांच एवं कानूनी प्रक्रिया का विषय है।
रिपोर्ट में कथित तौर पर यह भी जांचा गया कि शिकायत करने वाली महिलाओं को संस्थागत स्तर पर किस तरह का समर्थन मिला और जिन लोगों के खिलाफ शिकायतें की गईं, उनके विरुद्ध समय पर कार्रवाई हुई या नहीं। इसी वजह से जांच का दायरा केवल कथित मुख्य आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभागीय अधिकारियों और वरिष्ठ कर्मचारियों की भूमिका तक भी पहुंचा।
डॉ. रमीजुद्दीन से जुड़े मामले का भी उल्लेख
STF रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज मलिक से जुड़े मामले को प्रमुखता से शामिल किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत पर दिसंबर 2025 में लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोपों में महिला डॉक्टर को कथित रूप से प्रेमजाल में फंसाने, मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसी बातें शामिल हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक डॉ. रमीज को जनवरी 2026 में गिरफ्तार किया जा चुका है और मामले की विवेचना जारी है। STF की रिपोर्ट में उनसे जुड़े एक से अधिक मामलों का उल्लेख किया गया है। हालांकि किसी भी आरोप को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य तभी माना जाएगा जब संबंधित कानूनी प्रक्रिया में उसकी पुष्टि हो।
रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के ही एक अन्य रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. आदिल से जुड़े मामले का भी उल्लेख है। इसके अलावा गांधी वार्ड के नर्सिंग स्टाफ से जुड़े मामलों को भी जांच के दायरे में शामिल किया गया। इनमें महिला कर्मचारियों को कथित रूप से प्रभावित करने, उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोपों का जिक्र है।
वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
STF की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि रिपोर्ट में केवल उन लोगों का उल्लेख नहीं है जिन पर सीधे तौर पर महिलाओं को प्रताड़ित करने या धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगे, बल्कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और विभागीय पदाधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कयूम का नाम सामने आने की जानकारी है। इन पर शिकायतों को दबाने, आरोपी डॉक्टर का पक्ष लेने और शिकायतकर्ताओं के साथ कथित रूप से उचित व्यवहार नहीं करने जैसे आरोपों का उल्लेख रिपोर्ट में बताया गया है।
इसके अलावा बायोकेमिस्ट्री विभाग से जुड़े डॉ. वाहिद अली, मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर उस्मान कौसर तथा बायोकेमिस्ट्री विभाग के डॉ. अहमद और डॉ. कलीम के नामों का भी विभिन्न रिपोर्टों में STF जांच के संदर्भ में उल्लेख किया गया है। इन नामों के साथ अलग-अलग प्रकार की कथित भूमिका का उल्लेख है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ आरोप और उनकी वास्तविक भूमिका का निर्धारण संबंधित विभागीय और कानूनी प्रक्रिया में ही होगा।
रिपोर्ट में KGMU के कुछ पूर्व और वर्तमान अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ लोगों पर कथित रूप से शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने, आरोपितों को संरक्षण देने या पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाए जाने जैसे आरोपों की जांच का उल्लेख है।
‘इस्लामिक मेडिकोज’ समूह का भी जिक्र
STF की रिपोर्ट में ‘इस्लामिक मेडिकोज’ नाम के एक समूह का भी उल्लेख होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट में कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों के बीच कथित संपर्क तथा इस समूह से जुड़े संदर्भों की जांच किए जाने की बात सामने आई है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार STF ने यह भी जांचा कि KGMU के भीतर सामने आए अलग-अलग मामलों में आरोपित या संदिग्ध लोगों के बीच किसी तरह का आपसी नेटवर्क या सहयोग था या नहीं। इसी क्रम में कई डॉक्टरों और कर्मचारियों के नाम रिपोर्ट में दर्ज किए गए। हालांकि किसी समूह का रिपोर्ट में उल्लेख होना अपने आप में किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध सिद्ध नहीं करता। संबंधित लोगों की भूमिका का निर्धारण जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
पीड़ित पक्ष पर दबाव के आरोपों की भी जांच
STF रिपोर्ट में शिकायत करने वाली महिलाओं और कर्मचारियों पर कथित दबाव बनाए जाने के आरोपों को भी गंभीरता से लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने, करियर प्रभावित करने और शिकायत आगे बढ़ाने पर नुकसान की धमकी देने जैसे आरोप सामने आए।
यदि किसी संस्थान में उत्पीड़न या गंभीर शिकायत सामने आती है तो संबंधित शिकायत की निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता की सुरक्षा महत्वपूर्ण होती है। KGMU जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान में डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों के बीच कामकाजी माहौल को लेकर यह मामला संस्थागत जवाबदेही के सवाल से भी जुड़ गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ मामलों में शिकायतों के बाद आंतरिक समितियों की भूमिका सामने आई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक KGMU की आंतरिक शिकायत प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों का भी जांच के दौरान परीक्षण किया गया। अब शासन के निर्देश के बाद इन मामलों में विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग भी जांच के दायरे में
STF ने जांच के दौरान केवल पैथोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों पर ध्यान नहीं दिया। रिपोर्ट में माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है। माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संविदा पर कार्यरत एक महिला कर्मचारी की शिकायत और एक कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए कथित उत्पीड़न के आरोपों को रिपोर्ट में शामिल किया गया।
इसी तरह रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े कुछ आरोपों में महिला जूनियर डॉक्टरों को कथित रूप से प्रभावित करने और ब्लैकमेल करने जैसी शिकायतों का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में किया गया है। STF ने इन अलग-अलग मामलों को एक साथ देखते हुए यह जांचने का प्रयास किया कि क्या इनमें कोई आपसी संबंध या संस्थागत स्तर पर लापरवाही थी।
पूर्व कर्मचारी डॉ. नसीम खान का भी उल्लेख
STF रिपोर्ट में KGMU से जुड़े रहे पूर्व कर्मचारी डॉ. नसीम खान का नाम भी सामने आने की जानकारी है। कुछ रिपोर्टों में उनके अन्य संस्थानों से जुड़े होने और जांच के दौरान उनके संदर्भों का उल्लेख किया गया है। हालांकि किसी व्यक्ति का नाम जांच रिपोर्ट में होना अपने आप में अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है।
ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन और KGMU प्रशासन रिपोर्ट में दर्ज प्रत्येक आरोप के संबंध में किस स्तर की विभागीय जांच कराता है और किन मामलों में आपराधिक जांच या अन्य कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
अब KGMU प्रशासन के सामने जवाबदेही तय करने की चुनौती
STF की रिपोर्ट शासन को सौंपे जाने और इसके आधार पर कार्रवाई के निर्देश जारी होने के बाद अब KGMU प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। शासन ने स्पष्ट रूप से रिपोर्ट में चिह्नित डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने को कहा है। इसके साथ ही कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी गई है।
अब प्रशासन को यह तय करना होगा कि किन मामलों में विभागीय जांच शुरू की जाती है, किन मामलों में पहले से चल रही जांच को आगे बढ़ाया जाता है और किन मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई की प्रक्रिया में संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर और लागू नियमों का पालन भी जरूरी होगा।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि STF की रिपोर्ट में दर्ज आरोपों और जांच निष्कर्षों को अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। जिन डॉक्टरों, शिक्षकों या कर्मचारियों के नाम रिपोर्ट में आए हैं, उनकी कानूनी जिम्मेदारी और दोष का अंतिम निर्धारण सक्षम प्राधिकारी अथवा अदालत की प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
फिलहाल शासन के निर्देश के बाद KGMU में प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। अब निगाह इस बात पर है कि विश्वविद्यालय प्रशासन STF रिपोर्ट में चिह्नित लोगों के खिलाफ किस स्तर की कार्रवाई करता है और शासन को कब तक उसकी अनुपालन रिपोर्ट भेजी जाती है। यह मामला KGMU में कार्यस्थल की सुरक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।