अयोध्या के धन्नीपुर में प्रस्तावित मस्जिद निर्माण को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। बाराबंकी की सामाजिक संस्था ‘दहेज पर प्रहार’ की टीम ने धन्नीपुर पहुंचकर उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और मस्जिद परियोजना के लिए गठित इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन यानी IICF से निर्माण में हो रही देरी और चंदे के इस्तेमाल को लेकर जवाब मांगा है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगले 15 दिनों में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो लखनऊ में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का घेराव किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक ले जाया जाएगा।
‘दहेज पर प्रहार’ की टीम मंगलवार को धन्नीपुर स्थित उस जमीन पर पहुंची जिसे सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर 2019 के अयोध्या फैसले के बाद मस्जिद निर्माण के लिए उपलब्ध कराया गया था। संगठन की प्रतिनिधि ने मौके की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लगभग सात वर्ष होने वाले हैं, लेकिन जमीन पर अभी तक मस्जिद का वास्तविक निर्माण शुरू नहीं हो पाया है। संगठन का दावा है कि परियोजना स्थल पर बाउंड्री वॉल तक पूरी तरह विकसित नहीं की गई है।
संगठन ने सबसे गंभीर सवाल परियोजना के लिए जुटाए गए चंदे और उसके इस्तेमाल को लेकर उठाए हैं।
NGO की ओर से आरोप लगाया गया कि मस्जिद और उससे जुड़े सामाजिक प्रोजेक्ट के नाम पर वर्षों से धन एकत्र किया गया, लेकिन आम लोगों को यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई कि कुल कितनी राशि प्राप्त हुई, कितना धन खर्च किया गया और निर्माण अब तक क्यों शुरू नहीं हो सका।
ये आरोप फिलहाल ‘दहेज पर प्रहार’ संगठन की ओर से लगाए गए हैं। किसी सक्षम जांच एजेंसी या अदालत ने वक्फ बोर्ड अथवा IICF द्वारा वित्तीय अनियमितता किए जाने का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
इसलिए आरोप और सिद्ध तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
संगठन ने दावा किया कि उसने परियोजना और चंदे से जुड़े विवरण जानने के लिए सूचना मांगी थी, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसी आधार पर NGO ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उसका कहना है कि यदि सार्वजनिक रूप से चंदा लिया गया है तो उससे संबंधित आय और खर्च की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
NGO की मांग केवल हिसाब सार्वजनिक करने तक सीमित नहीं है।
संगठन ने कहा है कि आवंटित पांच एकड़ भूमि पर जल्द से जल्द मस्जिद का निर्माण शुरू कराया जाए। यदि संबंधित संस्थाएं परियोजना को आगे नहीं बढ़ा सकतीं तो जमीन को राज्य सरकार को वापस करने पर विचार किया जाए।
संगठन ने वक्फ बोर्ड को 15 दिन की समयसीमा देते हुए कहा है कि उसके बाद लखनऊ स्थित बोर्ड कार्यालय का घेराव किया जाएगा।
इसके साथ ही न्यायिक हस्तक्षेप के लिए हाईकोर्ट जाने की चेतावनी भी दी गई है।
धन्नीपुर मस्जिद परियोजना की पृष्ठभूमि सीधे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक अयोध्या फैसले से जुड़ी है।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए दिए जाने के साथ मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में पांच एकड़ उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यह भूमि उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को दी जाए और बोर्ड वहां मस्जिद तथा उससे जुड़ी सुविधाओं के निर्माण के लिए आवश्यक कदम उठा सके।
इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या जिले की सोहावल तहसील के धन्नीपुर गांव में पांच एकड़ जमीन उपलब्ध कराई।
मस्जिद और उससे जुड़े पूरे परिसर के विकास के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन यानी IICF का गठन किया।
IICF की प्रारंभिक योजना केवल एक मस्जिद बनाने की नहीं थी।
इसके साथ एक बड़ा अस्पताल, सामुदायिक रसोई, शोध केंद्र, संग्रहालय और पुस्तकालय जैसी सुविधाओं वाला सामाजिक-सांस्कृतिक परिसर विकसित करने की योजना तैयार की गई थी। IICF की आधिकारिक जानकारी में भी धन्नीपुर की पांच एकड़ भूमि पर मस्जिद के साथ अस्पताल, कम्युनिटी किचन और इंडो-इस्लामिक सांस्कृतिक शोध केंद्र विकसित करने का उद्देश्य बताया गया है।
लेकिन यह महत्वाकांक्षी परियोजना शुरुआत से ही कई बाधाओं में फंसी रही।
पहले जमीन के उपयोग, नक्शे और विकास प्राधिकरण की स्वीकृति से जुड़ी प्रक्रियाएं सामने आईं। इसके बाद मस्जिद के शुरुआती आधुनिक डिजाइन को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से से असहमति सामने आई और परियोजना का डिजाइन बदलने का निर्णय लिया गया।
परियोजना के वित्तीय संसाधन भी बड़ी चुनौती बने।
2026 में सामने आई जानकारी के अनुसार मूल बड़े परिसर की अनुमानित लागत सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच रही थी, जबकि वास्तविक चंदा अपेक्षा से बहुत कम मिला। जुलाई 2026 तक लगभग 1.5 करोड़ रुपये जुटने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद IICF ने परियोजना को छोटे स्वरूप में आगे बढ़ाने की तैयारी की।
उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और IICF से जुड़े अधिकारियों ने इससे पहले बताया था कि नया लक्ष्य पहले एक अपेक्षाकृत छोटी मस्जिद तैयार करना है।
करीब तीन करोड़ रुपये में मस्जिद के छोटे स्वरूप को तैयार करने की योजना पर काम किए जाने की बात सामने आई थी।
इसका अर्थ है कि शुरुआती अस्पताल, विशाल सांस्कृतिक परिसर और अन्य सुविधाओं वाली पूरी परियोजना फिलहाल उसी स्वरूप में आगे बढ़ती दिखाई नहीं दे रही है जिसमें इसे पहली बार प्रस्तुत किया गया था।
फंड की कमी को निर्माण में देरी का एक प्रमुख कारण बताया गया है।
इसलिए NGO द्वारा लगाए गए वित्तीय अनियमितता के आरोपों और परियोजना संचालकों द्वारा पहले सार्वजनिक रूप से बताई गई फंड की कमी को अलग-अलग समझना जरूरी है।
कम चंदा मिलना अपने आप वित्तीय अनियमितता साबित नहीं करता।
इसी प्रकार NGO द्वारा हिसाब सार्वजनिक करने की मांग और किसी संस्था के खिलाफ वित्तीय अपराध सिद्ध होना भी अलग कानूनी स्थितियां हैं।
IICF की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में भी मस्जिद और सामाजिक परियोजनाओं के लिए दान देने की सुविधा उपलब्ध है।
फाउंडेशन का कहना है कि दान के प्रबंधन के लिए वित्तीय समिति और पेशेवर ऑडिट व्यवस्था मौजूद है तथा दानदाताओं को डिजिटल रसीद और परियोजना से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
यही कारण है कि ‘दहेज पर प्रहार’ द्वारा उठाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग और IICF का अपना पारदर्शिता संबंधी दावा अब इस विवाद के दो अलग पक्ष बन गए हैं।
यदि संगठन हाईकोर्ट या किसी सरकारी जांच संस्था के सामने जाता है तो वास्तविक बैंक रिकॉर्ड, ऑडिट रिपोर्ट, आयकर विवरण, प्राप्त दान और किए गए खर्च जैसे दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।
केवल सार्वजनिक आरोपों के आधार पर वित्तीय गड़बड़ी का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
परियोजना से जुड़ी फंडिंग को लेकर पहले भी विवाद सामने आ चुका है।
2024 में IICF ने स्वयं पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि कुछ अज्ञात लोग मस्जिद परियोजना के नाम का इस्तेमाल करते हुए फर्जी बैंक खातों के जरिए चंदा मांग रहे हैं।
उस समय ट्रस्ट ने स्पष्ट किया था कि उसके आधिकारिक बैंक खातों से अलग खातों में धन मांगा जा रहा था और लोगों को धोखा दिया जा रहा था। पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच भी शुरू की थी।
यह पुराना मामला वर्तमान NGO के आरोपों से अलग है।
2024 की शिकायत में IICF स्वयं कथित धोखाधड़ी का शिकायतकर्ता था और आरोप उन लोगों पर था जो फाउंडेशन के नाम का कथित दुरुपयोग कर रहे थे।
वर्तमान विवाद में ‘दहेज पर प्रहार’ सीधे वक्फ बोर्ड और IICF से परियोजना की वास्तविक फंडिंग और खर्च की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है।
दोनों घटनाओं को एक ही प्रकार की वित्तीय अनियमितता के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
धन्नीपुर परियोजना की देरी का एक कारण प्रशासनिक स्वीकृतियां भी रही हैं।
परियोजना के शुरुआती नक्शे को लेकर अयोध्या विकास प्राधिकरण की प्रक्रिया लंबे समय तक चली। बाद में डिजाइन बदलने का निर्णय हुआ और संशोधित परियोजना तैयार की गई।
2025 के अंत तक परियोजना से जुड़े पदाधिकारियों ने अप्रैल 2026 के आसपास काम शुरू करने की संभावित समयसीमा बताई थी, लेकिन 2026 में भी निर्माण शुरू नहीं हो सका।
इसके बाद जुलाई 2026 में फंड की कमी के कारण परियोजना का स्वरूप छोटा करने की बात सामने आई।
यह बदलती समयसीमा ही स्थानीय स्तर पर असंतोष का एक कारण बनती दिखाई देती है।
2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लोगों में यह अपेक्षा बनी थी कि जिस तरह राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी, उसी तरह धन्नीपुर में दी गई वैकल्पिक भूमि पर भी मस्जिद और सामाजिक सुविधाओं का निर्माण निश्चित समय में शुरू होगा।
लेकिन छह वर्ष से अधिक समय गुजरने के बाद भी परियोजना जमीन पर शुरुआती अवस्था से आगे नहीं बढ़ सकी।
इसी देरी ने परियोजना की कार्यप्रणाली, फंडिंग और प्रबंधन को लेकर समय-समय पर सवाल पैदा किए हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में मस्जिद के निर्माण के लिए कोई निश्चित निर्माण अवधि निर्धारित नहीं की थी।
अदालत का निर्देश पांच एकड़ उपयुक्त भूमि आवंटित करने और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को उस भूमि पर मस्जिद तथा संबंधित सुविधाएं विकसित करने का अधिकार देने तक था।
इसलिए निर्माण में देरी अपने आप सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना साबित नहीं करती।
लेकिन आवंटित जमीन के उपयोग और परियोजना की प्रगति को लेकर संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगना सार्वजनिक बहस का विषय जरूर बन सकता है।
‘दहेज पर प्रहार’ ने इसी आधार पर अपना आंदोलन आगे बढ़ाने की घोषणा की है।
NGO के अनुसार यदि पांच एकड़ जमीन मस्जिद निर्माण के उद्देश्य से उपलब्ध कराई गई थी तो वर्षों तक वहां वास्तविक काम शुरू न होना गंभीर सवाल पैदा करता है।
संगठन का कहना है कि उसे यह स्पष्ट जानकारी चाहिए कि जमीन का भविष्य क्या है, मस्जिद कब बनेगी और दान के रूप में मिली रकम का क्या उपयोग हुआ है।
दूसरी तरफ IICF की आधिकारिक स्थिति यह रही है कि परियोजना छोड़ी नहीं गई है।
फाउंडेशन अभी भी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर धन्नीपुर में मस्जिद, अस्पताल, सामुदायिक रसोई और सांस्कृतिक सुविधाओं के निर्माण को अपना घोषित उद्देश्य बताता है।
इससे यह स्पष्ट है कि परियोजना औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुई है।
वास्तविक विवाद उसकी गति, आकार और वित्तीय संसाधनों को लेकर है।
2025 में ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों ने यह भी कहा था कि पांच एकड़ भूमि मूल महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए पर्याप्त नहीं है और अतिरिक्त जमीन की संभावना देखी जा रही है।
उस समय यह स्पष्ट किया गया था कि परियोजना को धन्नीपुर से हटाने की योजना नहीं है, बल्कि यदि अतिरिक्त जमीन उपलब्ध हो तो अस्पताल और शैक्षणिक सुविधाओं सहित बड़ा परिसर विकसित किया जा सकेगा।
लेकिन 2026 में फंडिंग संकट के बाद प्राथमिकता बदलती दिखी।
अब पहले छोटी मस्जिद तैयार करने और विशाल सामाजिक परिसर को भविष्य की उपलब्ध आर्थिक क्षमता के अनुसार आगे बढ़ाने की बात सामने आई।
यही बदलाव भी लोगों के बीच सवाल पैदा कर रहा है कि शुरुआती योजना और वर्तमान वास्तविक परियोजना में कितना अंतर रह गया है।
फाउंडेशन की शुरुआती योजना में 200 से अधिक बेड वाले अस्पताल, संग्रहालय, शोध केंद्र और सामुदायिक रसोई जैसे बड़े प्रोजेक्ट शामिल थे।
इतने बड़े परिसर के लिए तीन करोड़ रुपये जैसी वर्तमान छोटी मस्जिद लागत पर्याप्त नहीं हो सकती।
इसलिए मस्जिद निर्माण और पूरी IICF परियोजना को भी अलग-अलग समझना जरूरी है।
फिलहाल सामने आ रही करीब तीन करोड़ रुपये की योजना मुख्य रूप से छोटे मस्जिद निर्माण से जुड़ी है, न कि शुरुआती पूरे बहुउद्देशीय परिसर की लागत से।
‘दहेज पर प्रहार’ के विरोध ने अब इस पूरे मामले को फिर सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है।
संगठन ने मस्जिद निर्माण के धार्मिक पहलू के साथ आर्थिक जवाबदेही का प्रश्न भी उठाया है।
उसका कहना है कि जिस परियोजना के लिए आम लोगों से सहयोग मांगा गया है, उसकी प्रगति और आर्थिक स्थिति लोगों के सामने होनी चाहिए।
यदि संगठन वास्तव में हाईकोर्ट जाता है तो अदालत के सामने सबसे पहले यह प्रश्न भी आएगा कि याचिकाकर्ता किस विशिष्ट कानूनी राहत की मांग करता है।
उदाहरण के लिए वह ऑडिट की मांग करता है, सूचना उपलब्ध कराने की मांग करता है, निर्माण शुरू करने का निर्देश चाहता है या जमीन की स्थिति को चुनौती देता है—इन सभी के लिए अलग कानूनी आधार आवश्यक हो सकता है।
फिलहाल NGO ने हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है, किसी याचिका के दाखिल होने की पुष्टि नहीं हुई है।
इसी तरह लखनऊ में वक्फ बोर्ड के घेराव की घोषणा भी भविष्य के आंदोलन की चेतावनी है।
20 अक्टूबर को सामने आए बयान के अनुसार संगठन ने 15 दिनों का समय दिया है।
यदि इस अवधि में संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है तो बोर्ड कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करने की बात कही गई है।
वक्फ बोर्ड और IICF की ओर से इस विशेष 15 दिन की चेतावनी पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।
यदि आगे बोर्ड या फाउंडेशन कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करता है तो उससे चंदा, निर्माण और परियोजना की समयसीमा को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब वास्तविक वित्तीय विवरण का है।
कितना धन अधिकृत खातों में प्राप्त हुआ, उसमें से कितना खर्च किया गया, खर्च किन मदों पर हुआ और वर्तमान उपलब्ध फंड कितना है—इन प्रश्नों के आधिकारिक ऑडिट रिकॉर्ड ही आरोपों का वस्तुनिष्ठ उत्तर दे सकते हैं।
जुलाई 2026 में करीब 1.5 करोड़ रुपये चंदा मिलने की सार्वजनिक जानकारी सामने आई थी, लेकिन यह आंकड़ा पूरे परियोजना इतिहास का अंतिम या ऑडिटेड मौजूदा बैलेंस नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा परियोजना पर अब तक पेशेवर डिजाइन, कानूनी प्रक्रियाओं, प्रशासनिक शुल्क या अन्य मदों में कितना खर्च हुआ, इसकी विस्तृत वर्तमान सार्वजनिक जानकारी सीमित है।
इसी अंतर को NGO ने अपने सवालों का आधार बनाया है।
मस्जिद परियोजना अयोध्या के धार्मिक और सामाजिक इतिहास के कारण सामान्य निर्माण परियोजना से कहीं अधिक संवेदनशील भी है।
यह जमीन सुप्रीम कोर्ट के उस अंतिम फैसले के परिणामस्वरूप दी गई थी जिसने दशकों पुराने अयोध्या भूमि विवाद का न्यायिक समाधान किया।
इस कारण धन्नीपुर परियोजना की प्रगति देशभर में लगातार ध्यान आकर्षित करती रही है।
लेकिन इस संवेदनशीलता के कारण बिना प्रमाण किसी पक्ष पर वित्तीय अपराध या धोखाधड़ी का आरोप तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा।
फिलहाल प्रमाणित स्थिति यह है कि ‘दहेज पर प्रहार’ NGO ने वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और जांच की मांग की है।
फाउंडेशन स्वयं दान प्रबंधन में ऑडिट और पारदर्शिता व्यवस्था होने का दावा करता है।
परियोजना के लिए पर्याप्त धन न जुट पाने और नक्शे तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी की बात परियोजना से जुड़े अधिकारी पहले सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं।
वास्तविक वित्तीय अनियमितता हुई या नहीं, इसका कोई अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं है।
धन्नीपुर में जमीन अभी भी मस्जिद परियोजना के लिए निर्धारित है और IICF औपचारिक रूप से निर्माण परियोजना का संचालन करने वाला ट्रस्ट बना हुआ है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि संगठन द्वारा तय 15 दिन की समयसीमा के भीतर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड या IICF की ओर से कोई विस्तृत जवाब सामने आता है या नहीं।
यदि जवाब नहीं आता तो ‘दहेज पर प्रहार’ ने लखनऊ में वक्फ बोर्ड का घेराव और हाईकोर्ट जाने की घोषणा की है।
इस विवाद के बीच धन्नीपुर मस्जिद परियोजना पर पुराना मूल सवाल एक बार फिर सामने है—सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मिली पांच एकड़ जमीन पर वास्तविक निर्माण आखिर कब शुरू होगा और वर्षों से प्रस्तावित पूरी परियोजना का वर्तमान व्यावहारिक स्वरूप क्या होगा।