उत्तर प्रदेश में अवैध दवाओं के कारोबार से जुड़े करीब 15 साल पुराने मामले में आखिरकार अदालत का फैसला आ गया है। वर्तमान में मुरादाबाद मंडल के सहायक आयुक्त औषधि के पद पर तैनात पूरन चंद द्वारा वर्ष 2011 में फिरोजाबाद में की गई कार्रवाई के मामले में अदालत ने आरोपी दिनेश कुमार को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास और कुल 1 लाख 30 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। मामला बिना वैध औषधि बिक्री लाइसेंस दवाओं का भंडारण और बिक्री करने तथा दवाओं की खरीद के वैध रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने से जुड़ा था।
यह मामला 12 जुलाई 2011 का है। उस समय पूरन चंद फिरोजाबाद में औषधि निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने थाना दक्षिण क्षेत्र में माता मंदिर के पास मोहल्ला कोटला वाली गली में संचालित एक दवा प्रतिष्ठान का निरीक्षण किया था। जांच के दौरान दुकान संचालक दिनेश कुमार पुत्र रामनाथ से दवाओं के भंडारण और बिक्री से संबंधित वैध लाइसेंस तथा खरीद-बिक्री के दस्तावेज मांगे गए थे।
जांच में सामने आया कि आरोपी के पास दवाओं के भंडारण और बिक्री के लिए आवश्यक वैध औषधि बिक्री लाइसेंस नहीं था। दुकान में बड़ी मात्रा में दवाएं मौजूद थीं, लेकिन उनके संबंध में आवश्यक खरीद बिल और वैध रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं कराए जा सके।
औषधि विभाग के लिए यह गंभीर मामला था, क्योंकि दवा कारोबार सामान्य वस्तुओं के व्यापार की तरह नहीं किया जा सकता। किसी भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान को दवाओं की बिक्री, भंडारण और वितरण के लिए निर्धारित कानूनी व्यवस्था का पालन करना होता है। इसका उद्देश्य केवल कारोबारी रिकॉर्ड बनाए रखना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि बाजार तक पहुंचने वाली दवाओं के स्रोत का पता लगाया जा सके।
यदि किसी दुकान में दवाएं मौजूद हों लेकिन उनके खरीद स्रोत, निर्माता, आपूर्तिकर्ता और बिक्री से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध न हों तो दवाओं की पूरी आपूर्ति श्रृंखला संदिग्ध हो सकती है। ऐसी स्थिति में यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि दवाएं अधिकृत स्रोत से खरीदी गई थीं या नहीं और उनका वितरण निर्धारित नियमों के तहत हो रहा था या नहीं।
12 जुलाई 2011 की कार्रवाई के बाद थाना दक्षिण, फिरोजाबाद में मुकदमा अपराध संख्या 305/2011 दर्ज कराया गया। मामला बाद में सत्र वाद संख्या 10/2012 के रूप में न्यायालय तक पहुंचा।
इसके बाद मुकदमे की लंबी न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई। जांच, साक्ष्य, गवाहों के बयान और अदालती कार्यवाही के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए मामला लगभग डेढ़ दशक तक चला।
इस दौरान पूरन चंद इस मुकदमे में वादी और अभियोजन पक्ष के महत्वपूर्ण गवाह बने रहे। घटना के समय वह औषधि निरीक्षक थे, जबकि वर्तमान में मुरादाबाद मंडल के सहायक आयुक्त औषधि के पद पर कार्यरत हैं।
मुकदमे में पूरन चंद को अभियोजन पक्ष के पहले गवाह के रूप में पेश किया गया। उन्होंने अदालत को 2011 में की गई निरीक्षण कार्रवाई, दुकान से मिली दवाओं और आरोपी द्वारा लाइसेंस तथा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं करा पाने से संबंधित जानकारी दी।
मामले में दूसरे महत्वपूर्ण गवाह उपनिरीक्षक विक्रम सिंह तोमर रहे, जिन्होंने जांच अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका से संबंधित साक्ष्य अदालत के सामने रखे।
तीसरे प्रमुख गवाह डॉ. राजेंद्र सिंह थे, जो उस समय डिप्टी सीएमओ के पद पर कार्यरत थे और निरीक्षण टीम का हिस्सा रहे थे।
इन गवाहों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य मामले में महत्वपूर्ण साबित हुए। अभियोजन की ओर से विशेष लोक अभियोजक संत प्रसाद सिन्हा ने अदालत में मामले की पैरवी की।
मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश-16 तथा विशेष न्यायाधीश, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, आगरा की अदालत में हुई।
करीब 15 साल तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद 14 अक्टूबर 2026 को अदालत ने आरोपी दिनेश कुमार को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी माना और सजा सुनाई।
अदालत ने औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 18(सी) के उल्लंघन और धारा 27(बी)(ii) के तहत आरोपी को तीन वर्ष के कारावास तथा एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
धारा 18(सी) के तहत आवश्यक लाइसेंस के बिना किसी दवा का निर्माण, बिक्री, भंडारण, बिक्री के लिए प्रदर्शन या वितरण प्रतिबंधित है। इसके उल्लंघन पर धारा 27(बी)(ii) में सजा का प्रावधान है। कानून के तहत वैध लाइसेंस के बिना दवाओं की बिक्री या भंडारण गंभीर अपराध माना जाता है।
दूसरे आरोप में आरोपी को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 18-ए के उल्लंघन और धारा 28 के तहत भी दोषी पाया गया।
धारा 18-ए के तहत दवा रखने वाला व्यक्ति औषधि निरीक्षक द्वारा पूछे जाने पर यह जानकारी देने के लिए बाध्य होता है कि संबंधित दवा उसने किस निर्माता, वितरक या अन्य स्रोत से प्राप्त की है।
यदि व्यक्ति यह जानकारी उपलब्ध नहीं कराता तो धारा 28 के तहत दंड का प्रावधान है। कानून में इसके लिए एक वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
दिनेश कुमार को इस आरोप में एक वर्ष के कारावास और 20 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।
इसके अलावा अदालत ने पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 419 के तहत भी उसे दोषी ठहराया।
धारा 419 किसी दूसरे व्यक्ति के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करके छल करने यानी प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी से संबंधित थी। इस धारा के तहत अधिकतम तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान था। आरोपी को इस अपराध में तीन वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।
हालांकि भारतीय दंड संहिता अब भारतीय न्याय संहिता से बदली जा चुकी है, लेकिन अपराध वर्ष 2011 का होने के कारण उस समय प्रभावी कानून के तहत दर्ज मामला उसी कानूनी व्यवस्था में आगे चला। पुराने मामलों के लिए कानून में इस प्रकार की संक्रमण व्यवस्था बनी रहती है।
अदालत द्वारा अलग-अलग अपराधों के लिए लगाया गया कुल अर्थदंड 1 लाख 30 हजार रुपये है।
एक लाख रुपये का जुर्माना बिना वैध लाइसेंस दवाओं के भंडारण और बिक्री से जुड़े अपराध में, 20 हजार रुपये का जुर्माना आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराने के मामले में और 10 हजार रुपये का जुर्माना आईपीसी की धारा 419 के तहत लगाया गया है।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि आरोपी को सुनाई गई अलग-अलग कारावास की सजाएं एक साथ चलेंगी।
इसे कानूनी भाषा में सजाओं का समवर्ती रूप से चलना कहा जाता है।
इसका अर्थ यह है कि तीन वर्ष, एक वर्ष और तीन वर्ष की सजा को जोड़कर सात वर्ष की लगातार सजा नहीं बनाई जाएगी। अलग-अलग धाराओं की सजाएं एक ही अवधि में चलेंगी और प्रभावी अधिकतम कारावास तीन वर्ष रहेगा, हालांकि प्रत्येक अपराध में हुई दोषसिद्धि अलग बनी रहेगी।
करीब 15 वर्ष बाद आया यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि औषधि कानून से जुड़े मामलों में घटनास्थल पर की गई शुरुआती कार्रवाई से लेकर अदालत में अंतिम दोषसिद्धि तक दस्तावेजों और साक्ष्यों की लंबी श्रृंखला सुरक्षित रखना आवश्यक होता है।
दवाओं से जुड़ा कारोबार सीधे जनस्वास्थ्य से संबंधित है। खाद्य सामग्री या दूसरी वस्तुओं के विपरीत गलत, अनधिकृत या संदिग्ध स्रोत से आई दवा किसी मरीज के उपचार को सीधे प्रभावित कर सकती है।
इसी वजह से कानून दवा विक्रेताओं के लिए लाइसेंस, खरीद बिल, आपूर्तिकर्ता की जानकारी, रिकॉर्ड और निर्धारित भंडारण व्यवस्था को अनिवार्य बनाता है।
यदि किसी दवा का वैध खरीद रिकॉर्ड मौजूद है तो आवश्यकता पड़ने पर विभाग यह पता लगा सकता है कि दवा किस कंपनी से बनी, किस वितरक के जरिए आई और किस दुकान तक पहुंची।
यदि किसी विशेष बैच की दवा में गुणवत्ता संबंधी समस्या सामने आती है तो इसी रिकॉर्ड के आधार पर उसे बाजार से वापस लेने की कार्रवाई भी की जा सकती है।
बिना रिकॉर्ड और बिना लाइसेंस दवा कारोबार होने की स्थिति में यह पूरी निगरानी व्यवस्था कमजोर हो जाती है।
2011 की जांच में इसी तरह की गंभीर अनियमितताएं सामने आने का आरोप था। दुकान में दवाएं तो मौजूद थीं, लेकिन उनका वैध कारोबारी आधार प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
पूरन चंद द्वारा की गई कार्रवाई के बाद मामले को केवल दुकान बंद कराने या दवाएं जब्त करने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि आपराधिक मुकदमा दर्ज कर न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचाया गया।
इससे यह मामला औषधि विभाग की प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर आपराधिक अभियोजन में बदल गया।
औषधि निरीक्षकों की भूमिका ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण होती है।
औषधि निरीक्षक को निर्धारित कानून के तहत प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करने, लाइसेंस और रिकॉर्ड की जांच करने, आवश्यकता पड़ने पर दवाओं के नमूने लेने और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कानूनी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार होता है।
लेकिन अदालत में दोषसिद्धि के लिए केवल छापेमारी पर्याप्त नहीं होती।
कार्रवाई के दौरान बरामद सामग्री, दस्तावेज, जब्ती प्रक्रिया, गवाहों के बयान और कानूनी औपचारिकताओं को भी सही तरीके से पूरा करना आवश्यक होता है।
कई वर्षों बाद अदालत में मुकदमा पहुंचने पर यही पुराने रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते हैं।
इस मामले में भी वर्ष 2011 की कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज और अधिकारियों की गवाही 2026 तक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहे।
पूरे मामले में लगभग डेढ़ दशक गुजर जाना भारतीय न्यायिक व्यवस्था में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों की चुनौती को भी दिखाता है।
2011 में शुरू हुई कार्रवाई का अंतिम ट्रायल कोर्ट निर्णय अक्टूबर 2026 में सामने आया।
इस दौरान अधिकारी अलग-अलग पदों और स्थानों पर स्थानांतरित हो चुके थे, लेकिन मामले में गवाही और अभियोजन जारी रहा।
पूरन चंद भी उस समय औषधि निरीक्षक थे और अब सहायक आयुक्त औषधि के रूप में मुरादाबाद मंडल में तैनात हैं।
हाल के वर्षों में मुरादाबाद मंडल में भी उनके निर्देशन में अवैध और नियंत्रित दवाओं के कारोबार के खिलाफ कई कार्रवाई सामने आई हैं।
अगस्त 2026 में रामपुर में कोडीनयुक्त कफ सिरप की एक हजार शीशियों की कथित अवैध आपूर्ति के मामले में औषधि विभाग ने दो लोगों को पकड़ा था। उस कार्रवाई के बाद पूरन चंद ने दवाओं की आपूर्ति के स्रोत और नेटवर्क की जांच की बात कही थी।
इसी तरह बिना वैध लाइसेंस संचालित मेडिकल स्टोरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई लगातार जारी है।
दवा की दुकान खोलने के लिए केवल दुकान और दवाओं का स्टॉक होना पर्याप्त नहीं है। लाइसेंस की शर्तें पूरी करना, निर्धारित योग्यता वाले व्यक्ति की उपलब्धता और दवाओं की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड बनाए रखना आवश्यक है।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि कोई भी व्यक्ति बाजार से दवाएं खरीदकर बिना निगरानी आम लोगों को न बेच सके।
विशेष रूप से एंटीबायोटिक, दर्द निवारक, नींद, मानसिक स्वास्थ्य और नशीले प्रभाव वाली कुछ दवाओं की अनियंत्रित बिक्री स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
अवैध दवा व्यापार में एक बड़ी समस्या यह भी होती है कि दवा का वास्तविक स्रोत छिप सकता है।
बिना बिल के प्राप्त दवा असली हो सकती है, लेकिन उसके स्रोत और आपूर्ति श्रृंखला की पुष्टि नहीं की जा सकती।
वहीं कुछ मामलों में नकली, गलत लेबल वाली, मानक से कम गुणवत्ता की या समाप्त अवधि की दवाएं भी अवैध बाजार तक पहुंच सकती हैं।
इसी कारण कानून केवल दवा की गुणवत्ता की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन का रिकॉर्ड रखने पर जोर देता है।
इस विशिष्ट मामले में अदालत द्वारा जिन धाराओं में सजा सुनाई गई है, उनमें प्रमुख दोष बिना वैध लाइसेंस दवाओं का भंडारण और बिक्री तथा आवश्यक स्रोत संबंधी जानकारी उपलब्ध नहीं कराने से जुड़ा है।
इसलिए मामले को केवल ‘नकली दवा’ तक सीमित करके देखना पूरी कानूनी तस्वीर नहीं बताता।
यह अवैध दवा कारोबार, बिना लाइसेंस बिक्री और आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध न कराने से जुड़ा आपराधिक मामला था।
वर्ष 2011 में तत्कालीन औषधि निरीक्षक पूरन चंद की कार्रवाई के बाद आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि की।
अदालत का निर्णय औषधि विभाग के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि किसी पुराने मामले को अंतिम निर्णय तक पहुंचाने के लिए अधिकारियों को लंबे समय तक दस्तावेज और गवाही उपलब्ध करानी पड़ती है।
इस तरह के मामलों में अधिकारी के स्थानांतरण या पद बदलने के बाद भी उसकी मूल कार्रवाई से जुड़ी जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
अदालत में आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अधिकारी को वर्षों बाद भी गवाही के लिए बुलाया जा सकता है।
पूरन चंद की गवाही इसी कारण मुकदमे की महत्वपूर्ण कड़ी बनी।
विवेचक उपनिरीक्षक विक्रम सिंह तोमर और निरीक्षण टीम में शामिल डॉ. राजेंद्र सिंह की गवाही ने भी अभियोजन की कहानी को अदालत के सामने स्थापित करने में भूमिका निभाई।
विशेष लोक अभियोजक संत प्रसाद सिन्हा ने शासन की ओर से मामला रखा।
इसके बाद न्यायालय ने विभिन्न धाराओं के तहत आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी निर्धारित की।
यह फैसला उन दवा कारोबारियों के लिए भी चेतावनी है जो बिना लाइसेंस या दस्तावेजों के दवा कारोबार को सामान्य व्यापार मानते हैं।
दवा की बिक्री में नियमों का पालन न करना केवल विभागीय जुर्माने का मामला नहीं रह सकता।
गंभीर उल्लंघन मिलने पर आपराधिक मुकदमा, कारावास और भारी आर्थिक दंड तक हो सकता है।
औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 27(बी)(ii) स्वयं बिना वैध लाइसेंस दवाओं की बिक्री या भंडारण के लिए न्यूनतम दंड की कठोर व्यवस्था करती है। इसमें सामान्य स्थिति में कम से कम तीन वर्ष के कारावास और कम से कम एक लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
इस मामले में अदालत ने इसी प्रावधान के तहत तीन वर्ष की सजा और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
दूसरी ओर दवा का स्रोत न बताना भी छोटी औपचारिक गलती नहीं माना गया।
धारा 18-ए का उद्देश्य अधिकारियों को यह पता लगाने में सक्षम बनाना है कि दवा बाजार में कहां से आई।
यदि विक्रेता स्रोत नहीं बताता तो जांच वहीं रुक सकती है और संभावित अवैध आपूर्ति नेटवर्क का पता लगाना मुश्किल हो सकता है।
इसी कारण धारा 28 के तहत इसके लिए अलग दंड बनाया गया है।
अदालत ने आरोपी दिनेश कुमार को इस उल्लंघन के लिए एक वर्ष का कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माना दिया।
आईपीसी की धारा 419 के तहत तीन साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने ने मामले में धोखे से पहचान प्रस्तुत करने से जुड़े पहलू को भी शामिल किया।
हालांकि वर्ष 2024 के बाद नए मामलों में भारतीय न्याय संहिता लागू है, लेकिन 2011 की घटना होने के कारण मुकदमे में पुराने आईपीसी प्रावधान का इस्तेमाल जारी रहा।
अदालत का 14 अक्टूबर 2026 का फैसला इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि घटना और सजा के बीच लगभग 15 वर्ष का अंतर है।
इस अवधि के बावजूद अभियोजन अपने मूल साक्ष्यों और गवाहों को अदालत के सामने बनाए रखने में सफल रहा।
लंबी न्यायिक प्रक्रिया अक्सर पीड़ित या सरकारी पक्ष के लिए कठिन होती है, क्योंकि समय के साथ दस्तावेज, अधिकारी, गवाह और परिस्थितियां बदल सकती हैं।
लेकिन सरकारी विभाग से जुड़े मामलों में रिकॉर्ड सुरक्षित रखना इसी कारण बेहद महत्वपूर्ण होता है।
दवाओं की अवैध बिक्री के मामलों में एक और महत्वपूर्ण पहलू आम लोगों की जागरूकता है।
ग्राहकों को दवा खरीदते समय लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर का इस्तेमाल करना चाहिए और जहां संभव हो बिल लेना चाहिए।
बिल केवल खरीद की कीमत का रिकॉर्ड नहीं होता बल्कि किसी शिकायत, दवा की गुणवत्ता से जुड़ी समस्या या गलत दवा मिलने की स्थिति में महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकता है।
बिना बिल दवा खरीदना मरीज के लिए भविष्य में शिकायत या कार्रवाई करना कठिन बना सकता है।
इसी प्रकार मेडिकल स्टोर संचालकों को भी अधिकृत आपूर्तिकर्ताओं से ही दवाएं खरीदनी चाहिए और निर्धारित अवधि तक उनके रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए।
दवा की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सभी की जवाबदेही इसी व्यवस्था से निर्धारित की जाती है।
मुरादाबाद मंडल में भी औषधि विभाग अवैध बिक्री और नियंत्रित दवाओं की आपूर्ति के खिलाफ लगातार अभियान चला रहा है।
बिना लाइसेंस दुकानों, संदिग्ध दवा आपूर्ति और कोडीनयुक्त दवाओं की अवैध बिक्री जैसे मामलों में विभाग द्वारा जांच की जा रही है।
ऐसे में करीब 15 साल पुराने मामले में दोषसिद्धि विभागीय कार्रवाई के बाद न्यायिक परिणाम तक पहुंचने का उदाहरण बनकर सामने आई है।
हालांकि किसी एक मामले में सजा मिलने से अवैध दवा कारोबार पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
इसके लिए बाजार की नियमित निगरानी, मेडिकल स्टोरों की जांच, आपूर्ति श्रृंखला के रिकॉर्ड और संदिग्ध दवाओं की प्रयोगशाला जांच लगातार जरूरी रहती है।
डिजिटल बिलिंग और ऑनलाइन रिकॉर्ड व्यवस्था से भविष्य में दवाओं की ट्रेसिंग को और बेहतर किया जा सकता है।
यदि किसी दवा की खेप में समस्या आती है तो रिकॉर्ड के आधार पर कुछ ही समय में यह पता लगाया जा सकता है कि वह किन-किन दुकानों तक पहुंची।
इसके विपरीत बिना दस्तावेज की दवा बाजार में पहुंचने पर उसका स्रोत और वितरण पता करना मुश्किल हो जाता है।
इसलिए औषधि कानून में रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा है।
पूरन चंद द्वारा वर्ष 2011 में की गई कार्रवाई का परिणाम अब 2026 में सामने आया है।
अदालत ने आरोपी दिनेश कुमार को दोषी माना और तीन अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के तहत कारावास तथा जुर्माना लगाया।
सभी सजाएं साथ-साथ चलने के कारण प्रभावी कारावास तीन वर्ष रहेगा, जबकि कुल आर्थिक दंड 1 लाख 30 हजार रुपये होगा।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि अवैध दवा कारोबार का मामला वर्षों पुराना हो जाने से कानूनी जिम्मेदारी अपने आप समाप्त नहीं होती।
विभागीय कार्रवाई के बाद यदि पर्याप्त दस्तावेज और साक्ष्य उपलब्ध हों तो मामला लंबे समय बाद भी दोषसिद्धि तक पहुंच सकता है।
मुरादाबाद मंडल के सहायक आयुक्त औषधि पूरन चंद ने जिस मामले में 2011 में औषधि निरीक्षक रहते हुए कार्रवाई की थी, उसमें लगभग 15 वर्ष बाद आया फैसला इसी लंबी प्रक्रिया का परिणाम है।
14 अक्टूबर 2026 को अदालत द्वारा सुनाई गई तीन वर्ष की सजा और 1 लाख 30 हजार रुपये का जुर्माना अवैध तरीके से दवा भंडारण और बिक्री करने वालों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।