मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर चल रही संवैधानिक लड़ाई में नया मोड़ आया है। Chief Justice of India सूर्यकांत ने बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को कहा कि सुप्रीम कोर्ट उस आवेदन की जांच करेगा जिसमें 23 सितंबर को आए split verdict को वापस लेने यानी recall करने की मांग की गई है। यह मामला Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने इस आवेदन का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह एक Interlocutory Application यानी IA है, जिसमें 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ द्वारा दिए गए फैसले को recall करने की मांग की गई है। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत आवेदन की जांच करेगी और उसके बाद आगे क्या किया जाए, इस पर निर्णय लिया जाएगा।
इस घटनाक्रम का सीधा मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर का फैसला वापस ले लिया है। फिलहाल केवल recall application पर विचार करने की बात कही गई है। CJI को पहले आवेदन में उठाए गए कानूनी आधारों को देखना होगा और उसके बाद यह तय होगा कि इसे औपचारिक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए, मौजूदा आदेश में किसी बदलाव की जरूरत है या मामला पहले से तय larger bench प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़े।
यह विवाद 2023 में संसद द्वारा बनाए गए उस कानून से जुड़ा है जिसने Chief Election Commissioner यानी CEC और अन्य Election Commissioners की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय Selection Committee निर्धारित की। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में Leader of Opposition और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक Union Cabinet Minister शामिल होते हैं। यानी तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य केंद्र सरकार से जुड़े होते हैं। कानून की यही व्यवस्था संवैधानिक चुनौती के केंद्र में है।
इससे पहले मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने Anoop Baranwal मामले में कहा था कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती, तब तक CEC और Election Commissioners की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और Chief Justice of India की समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि यह व्यवस्था केवल तब तक लागू रहेगी जब तक संसद Article 324 के तहत कानून नहीं बना देती।
इसके बाद संसद ने दिसंबर 2023 में नया कानून बनाया और Selection Committee से CJI को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया। इसी बदलाव को कई याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए appointment process में executive यानी सरकार के प्रभाव पर पर्याप्त institutional check होना चाहिए। उनके अनुसार प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए केंद्रीय मंत्री के एक ही समिति में होने से सरकार के पास प्रभावी रूप से 2-1 का बहुमत हो जाता है और Leader of Opposition की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।
दूसरी ओर केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया है कि संविधान का Article 324(2) खुद संसद को CEC और Election Commissioners की नियुक्ति से संबंधित कानून बनाने की शक्ति देता है। 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भी अपनी व्यवस्था को स्पष्ट रूप से अस्थायी बताया था और कहा था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक ही CJI वाली समिति लागू रहेगी। यही वजह है कि मामला केवल policy preference का नहीं बल्कि संसद की विधायी शक्ति और Election Commission की constitutional independence के बीच संतुलन का सवाल बन गया है।
23 सितंबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय दी थी। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में ऐसे substantial constitutional questions मौजूद हैं जिनके लिए पांच न्यायाधीशों वाली Constitution Bench की आवश्यकता है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने माना कि मामला बड़े संवैधानिक सवाल उठाता है और इसे पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के सामने भेजा जाना चाहिए। उनके अनुसार Section 7 सहित कानून के कई प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और Article 324 की व्याख्या ऐसे मुद्दे हैं जिन पर Constitution Bench द्वारा authoritative determination उचित होगा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस मुद्दे पर अलग राय रखी। उन्होंने माना कि larger bench reference आवश्यक नहीं है क्योंकि संबंधित संवैधानिक सिद्धांत पहले से मौजूद फैसलों से स्पष्ट किए जा सकते हैं। साथ ही उन्होंने Election Commission की स्वतंत्रता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि संस्था का केवल स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, उसका स्वतंत्र दिखाई देना भी आवश्यक है। उन्होंने मौजूदा selection mechanism में executive dominance और Leader of Opposition की प्रभावशीलता से जुड़े सवाल भी उठाए।
दोनों न्यायाधीशों की राय अलग होने के बावजूद मामला अंततः CJI के सामने भेजा गया ताकि उचित bench के गठन पर निर्णय लिया जा सके। अब इसी 23 सितंबर की judicial exercise को recall करने की मांग सामने आई है।
Recall application में सबसे संवेदनशील मुद्दा जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा से जुड़ी कथित conflict-of-interest concern है। आवेदन में दावा किया गया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा Madhya Pradesh High Court में Election Commission of India के standing counsel हैं और यह संबंध मामले की सुनवाई के दौरान पक्षकारों को नहीं बताया गया था। आवेदन में कहा गया है कि यदि यह जानकारी पहले उपलब्ध होती तो petitioners recusal का अनुरोध कर सकते थे। यह आवेदन में लगाया गया दावा है, न कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कोई निष्कर्ष।
आवेदक का कहना है कि न्यायिक मामलों में केवल actual bias साबित होना ही आवश्यक नहीं होता, बल्कि ऐसी स्थिति भी महत्वपूर्ण हो सकती है जिससे किसी निष्पक्ष पर्यवेक्षक के मन में reasonable apprehension of bias पैदा हो। इसी आधार पर split verdict को वापस लेने और मामले पर नए सिरे से विचार करने की मांग की गई है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि इसी मुद्दे पर एक अलग curative petition भी दायर की गई है। CJI सूर्यकांत ने बुधवार की सुनवाई के दौरान कहा कि उन्हें curative petition दाखिल किए जाने की जानकारी है। वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने बताया कि curative petition किसी अन्य पक्ष द्वारा दायर की गई है, जबकि उनके द्वारा उल्लेखित मामला एक interlocutory application है।
Curative petition डॉ. जया ठाकुर की ओर से दाखिल की गई है। इसमें भी जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे के Election Commission के counsel होने को आधार बनाते हुए judicial propriety और reasonable apprehension of bias का मुद्दा उठाया गया है। हालांकि इन आरोपों पर अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
Recall application दाखिल करने वाले पक्ष की ओर से एक महत्वपूर्ण procedural argument भी रखा गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि सामान्य रूप से curative petition से पहले review की प्रक्रिया होती है और उनका आवेदन IA के रूप में दाखिल किया गया है। अब CJI को यह तय करना होगा कि उपलब्ध applications को किस procedural route से सुना जाए।
इस मामले का महत्व केवल एक न्यायाधीश की recusal से जुड़े सवाल तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक Election Commission की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर मूल विवाद मौजूद है।
भारतीय संविधान का Article 324 चुनाव आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की superintendence, direction और control की जिम्मेदारी देता है। इसी कारण CEC और Election Commissioners की नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता लंबे समय से संवैधानिक बहस का विषय रही है।
2023 के Anoop Baranwal फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Election Commission की स्वतंत्रता पर विशेष जोर दिया था। हालांकि उसी फैसले में अदालत ने यह भी स्वीकार किया था कि Article 324(2) के अनुसार संसद को नियुक्ति प्रक्रिया पर कानून बनाने का अधिकार है। इसलिए मौजूदा challenge का असली प्रश्न यह है कि संसद की वह शक्ति कितनी व्यापक है और क्या उसके प्रयोग से Commission की institutional independence प्रभावित होती है।
2023 Act की Section 7 के तहत Selection Committee में Prime Minister अध्यक्ष होते हैं, Leader of Opposition सदस्य होते हैं और तीसरे सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित Union Cabinet Minister शामिल होता है। यदि लोकसभा में औपचारिक Leader of Opposition मान्यता प्राप्त न हो तो सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को इस भूमिका में शामिल करने का प्रावधान है।
इसके अलावा कानून में Search Committee की व्यवस्था भी है जो संभावित उम्मीदवारों का panel तैयार करती है। इसके बाद Selection Committee उस panel के आधार पर नियुक्ति की recommendation करती है और राष्ट्रपति औपचारिक नियुक्ति करते हैं।
कानून के आलोचकों का मुख्य तर्क यह है कि Selection Committee में executive के दो प्रतिनिधि होने से सरकार के पास स्वाभाविक बहुमत रहता है। वहीं केंद्र का पक्ष यह रहा है कि किसी संवैधानिक पद की appointment committee में CJI की मौजूदगी अपने आप constitutional requirement नहीं है और संसद को Article 324 के तहत अपनी व्यवस्था निर्धारित करने की शक्ति प्राप्त है।
अब recall application ने इस substantive constitutional dispute में procedural fairness का नया प्रश्न जोड़ दिया है।
यदि CJI आवेदन को स्वीकार कर विस्तृत सुनवाई का निर्णय लेते हैं, तो अदालत को यह तय करना पड़ सकता है कि alleged conflict disclosure की कमी का 23 सितंबर के फैसले पर क्या प्रभाव पड़ता है। यदि अदालत recall का कोई आधार नहीं पाती तो मौजूदा split verdict और larger bench की प्रक्रिया अपने वर्तमान स्वरूप में आगे बढ़ सकती है।
वहीं यदि recall की मांग स्वीकार की जाती है तो 23 सितंबर के आदेश की procedural position बदल सकती है और मामले को नए सिरे से किसी दूसरी bench के सामने रखने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। फिलहाल यह केवल संभावित कानूनी परिणाम हैं और अदालत ने इनमें से किसी दिशा में निर्णय नहीं दिया है।
यह भी समझना जरूरी है कि recall application का मतलब 2023 CEC appointment law अपने आप रद्द होना नहीं है। कानून अभी प्रभावी है और उसके तहत की गई appointments भी केवल recall application दाखिल होने के कारण स्वतः अमान्य नहीं होतीं।
इसी तरह 23 सितंबर का split verdict भी अभी समाप्त नहीं हुआ है। CJI सूर्यकांत ने केवल यह कहा है कि आवेदन को examine किया जाएगा और उसके बाद निर्णय लिया जाएगा।
मौजूदा विवाद उस समय सामने आया है जब Election Commission और Chief Election Commissioner ज्ञानेश कुमार पहले से ही कई दूसरे कानूनी और राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। मतदाता सूची के Special Intensive Revision, Form 6 से जुड़े बदलावों, Commission के अंदर decision-making और Election Commissioners को मिलने वाली कानूनी immunity जैसे मुद्दों पर भी सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग proceedings चल रही हैं। लेकिन appointment law वाला मामला इन विवादों से कानूनी रूप से अलग है और इसका मूल प्रश्न Commission की शीर्ष नियुक्तियों की संरचना है।
इसी कारण 2023 Act पर अंतिम फैसला भविष्य के Chief Election Commissioners और Election Commissioners की नियुक्ति प्रक्रिया पर लंबे समय तक असर डाल सकता है।
यदि सुप्रीम कोर्ट Section 7 को संवैधानिक मानता है तो प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री वाला मौजूदा framework जारी रह सकता है। यदि provision को असंवैधानिक पाया जाता है तो Parliament को नई व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पड़ सकती है या अदालत अंतरिम व्यवस्था निर्धारित कर सकती है। फिलहाल इनमें से कोई परिणाम तय नहीं है।
सबसे पहले CJI सूर्यकांत को recall application और उससे जुड़े procedural questions पर निर्णय लेना है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि September 23 split verdict के आधार पर Constitution Bench की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी या पहले recall plea पर विस्तृत सुनवाई होगी।
7 अक्टूबर के घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि Supreme Court ने split verdict को वापस नहीं लिया है, लेकिन CJI सूर्यकांत ने recall application को जांचने पर सहमति जताई है। आवेदन में alleged conflict of interest और न्यायिक निष्पक्षता से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जबकि मूल मामला 2023 के CEC appointment law और Election Commission की institutional independence से जुड़ा हुआ है।
आने वाला CJI का निर्णय तय करेगा कि इस संवैधानिक विवाद का अगला procedural चरण क्या होगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 2023 के appointment law की वैधता पर सुनवाई सीधे Constitution Bench के सामने जाएगी या September 23 के फैसले को लेकर पहले नया judicial examination होगा।