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- उत्तरप्रदेश

दीपिका हो या द्विशा… क्या शादी बन चुकी है खौफ का दूसरा नाम? दहेज के लालच में और कितनी बेटियों की जाएगी जान?

“तीन शहर, तीन बेटियां, लेकिन अपराध सिर्फ एक – ‘दहेज’! 💔 नोएडा की दीपिका नागर हो या भोपाल की द्विशा शर्मा… आखिर कब तक चंद रुपयों और लालच के लिए बेटियों की बलि चढ़ाई जाती रहेगी? क्या आज भी हमारे समाज में शादी बेटियों के लिए एक डर बन चुकी है? सबसे बड़ा सवाल यह […]

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“तीन शहर, तीन बेटियां, लेकिन अपराध सिर्फ एक – ‘दहेज’! 💔 नोएडा की दीपिका नागर हो या भोपाल की द्विशा शर्मा… आखिर कब तक चंद रुपयों और लालच के लिए बेटियों की बलि चढ़ाई जाती रहेगी? क्या आज भी हमारे समाज में शादी बेटियों के लिए एक डर बन चुकी है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर बार इंसाफ की लड़ाई मौत के बाद ही शुरू होगी?”

ये सिर्फ चंद लाइनें नहीं हैं, बल्कि उस दर्द की चीख हैं जो आज भी हमारे समाज की दीवारों में कहीं दबी हुई है। एक तरफ हम 21वीं सदी में चांद और मंगल तक पहुंचने का जश्न मना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारे ही देश में आज भी पढ़ी-लिखी, होनहार बेटियों को दहेज की वेदी पर जिंदा जलाया जा रहा है या फंदे से लटकाया जा रहा है।

पढ़े-लिखे समाज का सबसे घिनौना सच

नोएडा की दीपिका नागर का मामला हो, भोपाल की पूर्व मिस पुणे द्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत, या फिर किसी और शहर की कोई और गुमनाम बेटी… हर कहानी का अंत एक सा है। हैरानी की बात यह है कि ये वारदातें अब सिर्फ पिछड़े या अशिक्षित वर्गों तक सीमित नहीं हैं। आज के तथाकथित ‘हाई-क्लास’, पढ़े-लिखे और रसूखदार परिवारों में लालच की जड़ें सबसे गहरी हैं। डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर दामाद ढूंढने की कीमत बेटियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।

सिस्टम और समाज पर खड़े होते बड़े सवाल

आखिर यह नौबत आती ही क्यों है?

  • जब एक बेटी ससुराल में घुट रही होती है, तो क्या उसके मायके वालों को सच में कुछ पता नहीं होता, या वो “लोग क्या कहेंगे” के डर से उसे सहने की सलाह देते हैं?

  • पुलिस और कानून का डंडा तब क्यों चलता है, जब बेटी की चिता ठंडी हो चुकी होती है?

  • दहेज निषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) जैसे सख्त कानून होने के बावजूद, दहेज मांगने वालों के मन में खौफ क्यों नहीं है?

बदलाव की शुरुआत कहां से हो?

आज जरूरत इस बात की है कि शादी से ज्यादा बेटियों की शिक्षा और उनके आत्मनिर्भर होने पर पैसा और जोर लगाया जाए। बेटियों को यह सिखाना होगा कि ‘कॉम्प्रोमाइज’ की भी एक हद होती है, और जब बात आत्मसम्मान या जान पर आ जाए, तो ससुराल का दरवाजा हमेशा के लिए छोड़ देना ही सही फैसला है।

UP24Network समाज के हर उस माता-पिता से अपील करता है कि अपनी बेटियों को विदा करते वक्त उन्हें सिर्फ संस्कार न दें, बल्कि इतनी हिम्मत भी दें कि जरूरत पड़ने पर वो वापस अपने घर लौट सकें… कफन में नहीं, बल्कि अपने पैरों पर चल कर!

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