उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में हाल ही में शामिल हुए नए मंत्रियों के लिए कार्यस्थल तय कर दिए गए हैं। रविवार को शपथ ग्रहण के बाद अब शासन ने उनके कार्यालयों की सूची लगभग फाइनल कर ली है। कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी से लेकर राज्यमंत्री हंसराज विश्वकर्मा तक सभी के बैठने के लिए स्थान तय कर दिए गए हैं। बापू भवन और विधान भवन में सभी मंत्रियों के लिए कक्ष आवंटित कर दिए गए हैं। आवास समिति के अध्यक्ष और वित्त मंत्री सुरेश खन्ना की मंजूरी के बाद आज आधिकारिक सूची जारी होने की संभावना है। अब इन मंत्रियों से आम लोग यहीं पर मिल सकते हैं। हालांकि मिलने के लिए भी एक प्रक्रिया है। पहले से पास समय लेना होता है और उसके लिए पास भी बनता है।
मनोज पांडेय (कैबिनेट मंत्री): समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में आए मनोज पांडेय को बापू भवन के आठवें तल पर कार्यालय मिला है।
सोमेंद्र तोमर (राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार): प्रोन्नत होकर स्वतंत्र प्रभार पाने वाले सोमेंद्र तोमर को बापू भवन के चौथे तल पर दफ्तर दिया गया है।
अजीत सिंह पाल (राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार): इन्हें बापू भवन के तीसरे तल पर कमरा आवंटित किया गया है।
सुरेंद्र दिलेर (राज्यमंत्री): अलीगढ़ के खैर से विधायक सुरेंद्र दिलेर बापू भवन के छठे तल पर बैठेंगे।
हंसराज विश्वकर्मा (राज्यमंत्री): वाराणसी के एमएलसी हंसराज को बापू भवन के तीसरे तल पर कक्ष मिला है।
कृष्णा पासवान (राज्यमंत्री): फतेहपुर की खागा सीट से विधायक कृष्णा पासवान को कक्ष संख्या एफ-34 आवंटित किया गया है।
कार्यालय आवंटन की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिए फाइल मंत्री आवास समिति के अध्यक्ष और वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के पास भेजी गई है। उनकी अंतिम मुहर लगते ही सभी मंत्री अपने-अपने आवंटित कार्यालयों में कार्यभार ग्रहण कर लेंगे। कहा जा रहा है कि आज ही इस पर मुहर लग जाएगी और कमरों का आवंटन हो जाएगा।
कार्यालयों के तय होने के बाद अब मंत्रियों के विभागों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागों की सूची भी तैयार कर ली है। जल्द ही इसकी भी घोषणा की जाएगी। एक तरफ यह देखा जाएगा कि नए मंत्रियों को कितना शक्तिशाली या भारी भरकम विभाग मिला है। दूसरी तरफ यह भी पता चलेगा कि पुराने किन मंत्रियों के विभागों में कटौती हुई है।
चुनावी साल को देखते हुए मंत्रियों को नए विभाग मिलना और विभागों में कटौती दोनों की खास अहमियत रखते हैं। किसी कद्दावर नेता के विभाग में कटौती होने पर विपक्षी दलों को भी उन पर निशाना साधने का मौका मिल सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि वह अपने विभाग में फेल हो गए थे।