इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों की बढ़ती घटनाओं, खासकर आरोपियों के पैरों में गोली मारकर उन्हें ‘एनकाउंटर’ बताने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है। प्रयागराज की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि पुलिस कानून से ऊपर नहीं है और अपराधी को सजा देना न्यायपालिका का काम है, न कि पुलिस का।
कोर्ट ने चेताया – सोशल मीडिया और वाहवाही के लिए फायरिंग न करें
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रमोशन, वाहवाही या सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने के लिए गोली चलाना न केवल गलत बल्कि खतरनाक है। आरोपी के शरीर के किसी गैर-जरूरी हिस्से पर गोली मारना कानूनन अस्वीकार्य है। किसी भी एनकाउंटर में गंभीर चोट या फायरिंग होने पर सख्त नियम स्वतः लागू होंगे।
6-पॉइंट गाइडलाइंस और सुप्रीम कोर्ट आदेश लागू करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के लिए 6-पॉइंट गाइडलाइंस जारी की हैं और इन्हें पालन करना अनिवार्य बताया। सुप्रीम कोर्ट के PUCL बनाम महाराष्ट्र मामले में तय दिशा-निर्देशों को सख्ती से लागू करने का आदेश भी दिया गया।यदि इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित SP और SSP को जिम्मेदार माना जाएगा और व्यक्तिगत अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।
पुलिस अधिकारियों से कोर्ट ने पूछा सवाल
कोर्ट ने डीजीपी और गृह सचिव से पूछा कि क्या किसी भी पुलिस अधिकारी को आरोपियों के पैरों में गोली मारने या मुठभेड़ का दावा करने के लिए कोई लिखित या मौखिक निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह प्रथा अब नियमित होती जा रही है, जो या तो वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने या आरोपी को तथाकथित सबक सिखाने के उद्देश्य से की जाती है।








