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मकर संक्रांति 2026: लखनऊ में पतंगबाजी और मांझे की कहानी

मकर संक्रांति 2026: लखनऊ में पतंगबाजी और मांझे की कहानी

मकर संक्रांति 2026: लखनऊ में पतंगबाजी की परंपरा, नवाबी मांझे से चाइनीज मांझे तक का सफर

लखनऊ में मकर संक्रांति के मौके पर पतंगबाजी का उत्सव पूरे शबाब पर है। खासकर पुराने लखनऊ में इस त्योहार को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। इंटरनेशनल स्तर के पतंगबाजों से लेकर आम लोग तक, हर कोई छतों पर पतंग उड़ाते नजर आ रहा है। इसी वजह से शहर के पतंग बाजारों में रौनक बढ़ गई है।

डिजाइनर पतंगों की बढ़ी मांग

इस साल लखनऊ में डिजाइनर पतंगों का खास क्रेज देखने को मिल रहा है। अद्धी, स्टार, पट्टीदार, प्रिंट कागज, तिरंगा और चांद डिजाइन वाली पतंगों की सबसे ज्यादा मांग है। इनकी कीमत 8 से 25 रुपये तक है, जबकि मांझा भरी चरखी 100 से 1000 रुपये तक मिल रही है।

नवाबों के दौर से जुड़ी पतंगबाजी की परंपरा

लखनऊ में पतंगबाजी का शौक कोई नया नहीं है। यह परंपरा नवाबों के जमाने से चली आ रही है। पहले दीपावली के दूसरे दिन पतंगबाजी होती थी। नवाब गोमती नदी के किनारे आम लोगों के साथ पतंग उड़ाते थे। इस आयोजन को ‘जमघट’ कहा जाता था, जहाँ पकवान बनते और लोग पतंगबाजी का आनंद लेते थे।

मकर संक्रांति पर कैसे शुरू हुई पतंगबाजी

मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा गुजरात और राजस्थान से आए लोगों के जरिए लखनऊ पहुँची। धीरे-धीरे यह शौक शहर के लोगों में भी लोकप्रिय हो गया। 76 वर्षीय वरिष्ठ पतंगबाज अमरनाथ कौल बताते हैं कि उन्होंने इस खेल में इंडिया लेवल की 8 ट्रॉफियां जीती हैं।

बकरे के खून से बनता था नवाबी मांझा

नवाबी दौर में मांझा चावल, बकरे के खून और लोहे के बुरादे से तैयार किया जाता था। बाद में इसमें शीशे का प्रयोग होने लगा। पहले पतंग सिल्क की होती थी, जो समय के साथ कागज की बन गई। आज इसके उलट चाइनीज मांझे का चलन बढ़ गया है, जिसे पतंगबाज खतरनाक बताते हैं और इसके इस्तेमाल से बचने की अपील कर रहे हैं।

चांद डिजाइन वाली पतंग सबसे ज्यादा पसंद

लखनऊ में इस समय चांद डिजाइन वाली पतंग सबसे ज्यादा पसंद की जा रही है। युवाओं में खासतौर पर डिजाइनर पतंगों को लेकर जबरदस्त उत्साह है।

पतंगबाजी जोड़ती है लोगों को

अनूप गोयल बताते हैं कि लखनऊ की पतंगबाजी की खासियत यह है कि यह लोगों को जोड़ती है। यहां की टीम देशभर की चैंपियनशिप में हिस्सा लेकर जीत हासिल करती है। पुराने समय में सूखे के दौरान पतंग के नीचे सिक्के और नोट बांधकर काटे जाते थे, ताकि जरूरतमंदों को मदद मिल सके।

वायरलेस मैसेज का भी काम करती थी पतंग

आजादी से पहले पतंगों का इस्तेमाल संदेश पहुंचाने के लिए भी किया जाता था। ‘साइमन गो बैक’ जैसे नारे पतंगों के जरिए उड़ाए जाते थे, जिसे अंग्रेज पकड़ नहीं पाते थे।

कीमतें और बाजार की रौनक

लखनऊ में चरखी की कीमत 100 रुपये से शुरू होकर 1000 रुपये तक जाती है, जबकि पतंगें 8 रुपये से 25 रुपये तक उपलब्ध हैं। दुकानदारों के मुताबिक, नवाब वजीर असफ-उद-दौला को पतंग उड़ाने का खास शौक था। वे सोना-चांदी जड़ी ‘झुल-झुल पतंग’ उड़ाते थे, जो लखनऊ की पहचान बन गई।

आज भी जिंदा है नवाबी तहजीब

समय के साथ तारीख बदली है, लेकिन लखनऊ में पतंगबाजी की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। मकर संक्रांति पर छतों से उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें नवाबी तहजीब और गंगा-जमुनी संस्कृति की झलक पेश करती हैं।

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