उरई। जालौन कोतवाली क्षेत्र के शेरपुरा गांव में रविवार सुबह नमामि गंगे योजना के तहत पानी की टंकी के निर्माण के दौरान बड़ा हादसा हो गया। निर्माण कार्य में लगे 28 वर्षीय मजदूर अजय कुमार लोहे का सरिया काटते समय ऊपर से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन विद्युत लाइन की चपेट में आ गया। तेज करंट लगने से वह गंभीर रूप से झुलस गया। साथी मजदूर आनन-फानन में उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जालौन लेकर पहुंचे, लेकिन चिकित्सकों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।
मृतक की पहचान औरैया जिले के मालासी गांव निवासी राम प्रकाश के 28 वर्षीय बेटे अजय कुमार के रूप में हुई है। अजय रोजगार के सिलसिले में जालौन आया था और शेरपुरा गांव में पानी की टंकी के निर्माण कार्य में मजदूरी कर रहा था।
रविवार सुबह करीब नौ बजे अजय अन्य मजदूरों के साथ निर्माण स्थल पर काम कर रहा था। इसी दौरान वह लोहे का सरिया काटने और निर्माण कार्य से संबंधित काम में लगा हुआ था। काम करते समय लोहे का सरिया ऊपर से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन विद्युत लाइन के संपर्क में आ गया।
लोहे के विद्युत का सुचालक होने के कारण हाईटेंशन लाइन के संपर्क में आते ही करंट तेजी से सरिया के माध्यम से अजय तक पहुंचा। अचानक लगे तेज करंट से वह गंभीर रूप से झुलस गया और निर्माण स्थल पर गिर पड़ा। घटना इतनी अचानक हुई कि वहां मौजूद दूसरे मजदूरों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
हादसे के बाद निर्माण स्थल पर अफरा-तफरी मच गई।
साथी मजदूर अजय को बचाने के लिए दौड़े और तत्काल उसे उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जालौन ले गए। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने उसका परीक्षण किया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। इसलिए उपलब्ध सत्यापित जानकारी के अनुसार अजय को अस्पताल में मृत घोषित किया गया, न कि घटनास्थल पर ही उसकी मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई थी।
युवक की मौत की सूचना मिलते ही उसके साथ काम कर रहे मजदूरों में मातम छा गया। जिस निर्माण स्थल पर कुछ मिनट पहले तक सामान्य रूप से काम चल रहा था, वहां हादसे के बाद सन्नाटा पसर गया।
घटना की सूचना जालौन कोतवाली पुलिस को दी गई।
जानकारी मिलने पर मलकपुरा-छिरिया सलेमपुर चौकी प्रभारी आलोक पाल मौके पर पहुंचे। पुलिस ने निर्माण स्थल की स्थिति देखी, वहां मौजूद लोगों से घटना के बारे में जानकारी ली और मृतक के परिजनों को हादसे की सूचना दी। इसके बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।
जालौन कोतवाली प्रभारी हरीशंकर चंद ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अजय कुमार की मौत ने अब निर्माण स्थल पर अपनाई गई सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस स्थान पर लोहे के सरियों के साथ निर्माण कार्य कराया जा रहा था, उसके ऊपर से 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन गुजर रही थी तो काम शुरू कराने से पहले विद्युत खतरे का आकलन किस स्तर पर किया गया था।
लोहे के लंबे सरिए, पाइप, मशीनरी या दूसरे धातु उपकरणों के साथ हाईटेंशन विद्युत लाइन के आसपास काम करना सामान्य निर्माण स्थल की तुलना में कहीं अधिक जोखिमपूर्ण होता है।
ऐसे स्थान पर थोड़ी सी असावधानी सीधे जानलेवा करंट का कारण बन सकती है।
अजय के साथ हुई घटना में भी यही हुआ। काम के दौरान सरिया ऊपर से गुजर रही लाइन तक पहुंच गया और कुछ ही क्षणों में 28 वर्षीय मजदूर की जान चली गई।
अब जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि हाईटेंशन लाइन और निर्माण क्षेत्र के बीच वास्तविक दूरी कितनी थी।
क्या मजदूरों को इस खतरे के बारे में पहले बताया गया था।
क्या ऐसे काम के लिए किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था का प्रावधान किया गया था।
क्या कार्यस्थल पर जिम्मेदार सुपरवाइजर या सुरक्षा से जुड़ा कोई अधिकारी मौजूद था।
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हाईटेंशन लाइन के नीचे या उसके आसपास धातु के लंबे सरियों के साथ काम की अनुमति किस आधार पर दी गई थी।
फिलहाल इन सवालों पर किसी जांच एजेंसी ने अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है, इसलिए दुर्घटना के लिए किसी व्यक्ति, ठेकेदार, निर्माण एजेंसी या विभाग को अभी दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लेकिन एक मजदूर की मौत होने के बाद निर्माण स्थल की सुरक्षा व्यवस्था की जांच आवश्यक हो गई है।
पुलिस भी मामले की परिस्थितियों की जांच कर रही है।
नमामि गंगे योजना के तहत शेरपुरा गांव में पानी की टंकी का निर्माण कराया जा रहा था।
ग्रामीण पेयजल परियोजनाओं में पानी की टंकियों, पाइपलाइन और संबंधित संरचनाओं का निर्माण आम तौर पर बड़े स्तर पर होता है। इन निर्माण स्थलों पर लोहे की सरिया, भारी उपकरण, मशीनें और ऊंचाई पर काम जैसी गतिविधियां नियमित रूप से होती हैं।
ऐसे में निर्माण स्थल के आसपास मौजूद विद्युत लाइनों की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि ऊपर से हाईटेंशन लाइन गुजरती है तो धातु सामग्री को ऊपर उठाते समय सामान्य निर्माण स्थल की तुलना में बहुत अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है।
हादसे के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या निर्माण स्थल को हाईटेंशन लाइन से सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई थी।
क्या काम शुरू होने से पहले संबंधित विद्युत विभाग को इसकी जानकारी दी गई थी और क्या लाइन के आसपास काम करने को लेकर कोई तकनीकी निरीक्षण हुआ था।
इन तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दुर्घटना केवल काम के दौरान हुई अचानक चूक थी या सुरक्षा प्रबंधन में भी किसी स्तर पर लापरवाही हुई।
अजय के परिवार के लिए यह हादसा अचानक आई ऐसी त्रासदी है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
28 वर्ष की उम्र में रोजगार के लिए दूसरे जिले में मजदूरी कर रहे युवक की मौत की खबर जैसे ही मालासी गांव में उसके परिजनों तक पहुंची, परिवार में कोहराम मच गया।
काम करने के लिए घर से निकले अजय की वापसी का इंतजार कर रहे परिजनों को उसकी मौत की सूचना मिली।
ऐसे मामलों में हादसे का असर केवल एक जान जाने तक सीमित नहीं रहता।
मजदूरी करने वाले परिवारों में कामकाजी सदस्य अक्सर परिवार की आय का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। किसी युवा मजदूर की अचानक मौत परिवार को भावनात्मक आघात के साथ आर्थिक संकट में भी डाल सकती है।
अब पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंपे जाने और आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी किए जाने की कार्रवाई होगी।
पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल से मिली जानकारी को भी जांच में शामिल कर सकती है।
यदि परिजनों की ओर से किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ लापरवाही की शिकायत दी जाती है तो पुलिस उस शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।
वर्तमान स्थिति में पुलिस ने जांच जारी होने की बात कही है।
यह घटना कार्यस्थल पर बिजली से जुड़े खतरों को लेकर भी महत्वपूर्ण चेतावनी देती है।
11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन के आसपास सामान्य घरेलू बिजली की तुलना में जोखिम कहीं अधिक होता है।
ऐसी लाइन के सीधे संपर्क में आना ही खतरा नहीं होता, बल्कि बहुत कम दूरी पर धातु की वस्तु पहुंचना भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।
निर्माण स्थलों पर लंबे सरिए, लोहे के पाइप और दूसरी धातु सामग्री उठाते समय ऊपर मौजूद विद्युत तारों का ध्यान रखना जरूरी होता है।
इस प्रकार के हादसों में कई बार व्यक्ति को प्रतिक्रिया देने का मौका तक नहीं मिलता।
तेज विद्युत धारा शरीर में गंभीर जलन, हृदय की विद्युत गतिविधि में गड़बड़ी और आंतरिक अंगों को क्षति पहुंचा सकती है।
अजय के मामले में भी करंट लगते ही वह गंभीर रूप से झुलस गया और अस्पताल पहुंचाए जाने के बावजूद उसकी जान नहीं बच सकी।
घटना से निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा का व्यापक सवाल भी सामने आया है।
किसी भी बड़े सरकारी या निजी निर्माण कार्य में समयसीमा और काम की गति के साथ सुरक्षा व्यवस्था समान रूप से महत्वपूर्ण है।
मजदूर को हेलमेट, सुरक्षा जूते या अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना जरूरी हो सकता है, लेकिन हाईटेंशन लाइन जैसे खतरे में केवल व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पर्याप्त नहीं होते।
ऐसे खतरे को निर्माण योजना और कार्यस्थल प्रबंधन के स्तर पर नियंत्रित करना पड़ता है।
यदि किसी स्थान पर ऊपर हाईटेंशन तार मौजूद हैं तो धातु सामग्री की आवाजाही और काम की ऊंचाई को नियंत्रित करना आवश्यक होता है।
जरूरत पड़ने पर संबंधित बिजली विभाग और तकनीकी अधिकारियों के साथ समन्वय भी करना पड़ सकता है।
शेरपुरा की घटना में वास्तव में कौन-कौन से सुरक्षा उपाय मौजूद थे, यह अभी जांच का विषय है।
लेकिन हादसे के बाद यह जांच केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए।
यह स्पष्ट होना चाहिए कि मजदूरों को किसके निर्देशन में काम कराया जा रहा था, निर्माण स्थल की सुरक्षा के लिए कौन जिम्मेदार था और हाईटेंशन लाइन को लेकर क्या सावधानियां निर्धारित की गई थीं।
यदि किसी स्तर पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी ही परिस्थितियों में काम कर रहे दूसरे मजदूरों की सुरक्षा भविष्य में भी खतरे में पड़ सकती है।
एक हादसे के बाद केवल कुछ दिनों तक सावधानी और बाद में पुरानी व्यवस्था पर लौट जाना समस्या का समाधान नहीं है।
निर्माण स्थल की वास्तविक तकनीकी समीक्षा और जोखिम समाप्त करना आवश्यक है।
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि हाईटेंशन लाइन के नीचे निर्माण कार्य किस तरह कराया जा रहा था।
हालांकि केवल लाइन का निर्माण स्थल के ऊपर से गुजरना अपने आप किसी विभाग या एजेंसी की कानूनी लापरवाही साबित नहीं करता।
इसके लिए लाइन की वैधानिक स्थिति, निर्माण की स्वीकृत डिजाइन, दोनों के बीच निर्धारित सुरक्षा दूरी और काम कराने के तरीके की जांच आवश्यक होगी।
इसी जांच से जिम्मेदारी तय हो सकती है।
पुलिस द्वारा मामले में जांच किए जाने की बात कही गई है, लेकिन निर्माण से संबंधित विभागीय और तकनीकी स्तर की जांच भी महत्वपूर्ण होगी।
नमामि गंगे से जुड़ी परियोजना होने के कारण यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तविक निर्माण किस कार्यदायी संस्था या ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा था और मौके पर श्रमिक सुरक्षा की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी।
इन पहलुओं की विस्तृत आधिकारिक जानकारी फिलहाल सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।
इसीलिए किसी ठेकेदार या संस्था का नाम लेकर जिम्मेदारी तय करना इस चरण में जल्दबाजी होगी।
लेकिन हादसे में एक मजदूर की जान चली गई है, इसलिए केवल इसे सामान्य दुर्घटना बताकर छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं होगा।
जांच में तकनीकी परिस्थितियों के साथ श्रमिक सुरक्षा की व्यवस्था भी देखी जानी चाहिए।
इस दुर्घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अजय अकेला काम नहीं कर रहा था।
उसके साथ अन्य मजदूर भी निर्माण स्थल पर मौजूद थे।
यदि सरिया किसी अलग कोण पर लाइन से टकराता या विद्युत प्रवाह आसपास मौजूद धातु सामग्री तक पहुंचता तो हादसे का दायरा और बड़ा हो सकता था।
इस लिहाज से निर्माण स्थल पर मौजूद दूसरे मजदूरों का बच जाना राहत की बात है।
हालांकि उनके सामने साथी मजदूर को करंट लगने और उसकी मौत का दृश्य भी मानसिक रूप से बेहद परेशान करने वाला रहा होगा।
घटना के बाद निर्माण स्थल पर काम की स्थिति और सुरक्षा की समीक्षा करना आवश्यक है।
जब तक खतरे की वास्तविक वजह और हाईटेंशन लाइन के आसपास सुरक्षित कार्य व्यवस्था स्पष्ट न हो जाए, उसी तरीके से काम जारी रखना दूसरे मजदूरों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है।
स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों से उम्मीद की जाएगी कि वे जांच में केवल घटना के समय की परिस्थितियों को नहीं बल्कि पूरे कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था को भी देखें।
जालौन और आसपास के क्षेत्रों में हाईटेंशन लाइनों से जुड़े हादसे पहले भी सामने आते रहे हैं।
हालांकि प्रत्येक घटना की परिस्थितियां अलग होती हैं और किसी पुराने मामले को वर्तमान हादसे से सीधे नहीं जोड़ा जा सकता।
हाल में जालौन जिले के कोंच क्षेत्र में भी एक युवक हाईटेंशन लाइन की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलस गया था। उस घटना में शोभायात्रा के दौरान ट्रैक्टर-ट्रॉली पर मौजूद युवक का संपर्क ऊपर से गुजर रही लाइन से हुआ था।
इन अलग-अलग घटनाओं से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन लाइनों के आसपास ऊंची धातु संरचनाओं, वाहनों और निर्माण सामग्री के इस्तेमाल में बेहद सतर्कता जरूरी है।
जहां लोग नियमित रूप से इस तरह की गतिविधियां करते हैं, वहां खतरे की पहचान और सार्वजनिक चेतावनी भी महत्वपूर्ण होती है।
शेरपुरा की घटना में तत्काल प्राथमिकता अजय के परिवार को कानूनी प्रक्रिया पूरी कर शव सौंपने और हादसे की निष्पक्ष जांच की है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मृत्यु के चिकित्सकीय कारण की औपचारिक पुष्टि होगी।
इसके साथ पुलिस को निर्माण स्थल पर मौजूद मजदूरों के बयान, काम कराने वालों की जानकारी और दुर्घटना की वास्तविक परिस्थितियों को दर्ज करना होगा।
यदि घटनास्थल पर सीसीटीवी या किसी व्यक्ति की मोबाइल रिकॉर्डिंग उपलब्ध है तो वह भी जांच में मदद कर सकती है, लेकिन ऐसी किसी रिकॉर्डिंग की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
यह भी देखना होगा कि हादसे के समय बिजली आपूर्ति सामान्य रूप से चालू थी या किसी निर्माण गतिविधि से पहले लाइन बंद कराने की कोई प्रक्रिया अपनाई गई थी।
यदि लाइन चालू थी तो मजदूरों को उससे कितनी दूरी पर काम कराया जा रहा था।
सरिया किस लंबाई का था और वह किस परिस्थिति में तार तक पहुंचा।
ये सभी तकनीकी तथ्य दुर्घटना की जिम्मेदारी तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मजदूरों के लिए कार्यस्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल व्यक्तिगत सावधानी का मामला नहीं है।
निर्माण कार्य की योजना बनाने वाले और उसे संचालित करने वाले लोगों की भी जिम्मेदारी होती है कि संभावित खतरों की पहले पहचान की जाए।
एक मजदूर से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर तकनीकी खतरे का स्वयं आकलन करे, विशेष रूप से जब वह निर्धारित निर्माण कार्य कर रहा हो।
इसलिए जांच में यह देखना जरूरी होगा कि अजय को काम किस तरीके से करने के निर्देश दिए गए थे और हाईटेंशन लाइन के खतरे की जानकारी उसे दी गई थी या नहीं।
यदि लाइन स्पष्ट रूप से ऊपर से गुजर रही थी तो सरिया काटने और उठाने के लिए सुरक्षित क्षेत्र क्यों नहीं बनाया गया, यह भी महत्वपूर्ण सवाल होगा।
इस हादसे के बाद अजय के परिवार के लिए संभावित मुआवजे का प्रश्न भी उठ सकता है।
लेकिन फिलहाल किसी विशिष्ट मुआवजे की आधिकारिक घोषणा की पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए राशि या पात्रता के बारे में अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किस एजेंसी या ठेकेदार के अधीन कार्यरत था, उसका रोजगार रिकॉर्ड क्या था और घटना पर संबंधित विभाग या प्रशासन क्या निर्णय लेता है।
यदि परिवार को किसी वैधानिक श्रमिक मुआवजा व्यवस्था के तहत अधिकार बनता है तो संबंधित दस्तावेज और रोजगार की स्थिति महत्वपूर्ण होंगे।
परिजनों के लिए सबसे पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि अजय के काम से जुड़े उपलब्ध दस्तावेज, पहचान, मजदूरी या ठेकेदार संबंधी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं।
आगे किसी मुआवजे या कानूनी दावे की स्थिति में ऐसे रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
हालांकि वर्तमान समाचार का केंद्र अभी दुर्घटना और पुलिस जांच है।
रविवार सुबह करीब नौ बजे शुरू हुआ सामान्य काम कुछ ही पलों में जानलेवा हादसे में बदल गया।
28 वर्षीय अजय कुमार शेरपुरा गांव में पानी की टंकी बनाने के लिए मजदूरी कर रहा था। वह लोहे के सरिए के साथ काम कर रहा था। ऊपर से 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन गुजर रही थी। सरिया लाइन के संपर्क में आया और अजय गंभीर रूप से झुलस गया। साथी मजदूर उसे सीएचसी जालौन लेकर पहुंचे, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।
पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की जांच जारी है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि निर्माण स्थल पर इतने बड़े विद्युत खतरे के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था क्या थी और क्या अजय की मौत को उचित सावधानी बरतकर रोका जा सकता था।
जांच में यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होना जरूरी होगा।
साथ ही यह घटना दूसरे निर्माण स्थलों के लिए भी चेतावनी है कि हाईटेंशन लाइन के आसपास काम को सामान्य निर्माण गतिविधि मानकर नहीं किया जा सकता।
एक लोहे का सरिया कुछ सेकंड में जानलेवा माध्यम बन सकता है।
अजय कुमार की मौत ने एक परिवार से उसका 28 वर्षीय बेटा छीन लिया है और अब इस हादसे की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकेगी कि यह केवल दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना थी या सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी चूक हुई जिसे समय रहते रोका जा सकता था।