“बेल्जियम से लाया गया विशेष ट्रेलर बहराइच के रास्ते लखीमपुर खीरी स्थित कुंभी यूनिट की ओर बढ़ रहा है। ट्रेलर पर बायोप्लास्टिक संयंत्र के लिए भारी औद्योगिक वेसल लदा है।“
बहराइच। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में इन दिनों एक विशालकाय ट्रक लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बेल्जियम से आया यह भारी-भरकम ट्रेलर औद्योगिक वेसल लेकर लखीमपुर खीरी के कुंभी स्थित बलरामपुर चीनी मिल के बायोप्लास्टिक प्लांट की ओर बढ़ रहा है। 308 पहियों वाले ट्रक के नाम से मशहूर इस वाहन के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि फिलहाल यह 250 पहियों के सहारे चल रहा है। भारी वेसल को लेकर चल रहे इस ट्रक की रफ्तार करीब पांच किलोमीटर प्रति घंटे बताई गई है।
ट्रक के आकार और उस पर लदे विशाल उपकरण को देखने के लिए रास्ते में लोगों की भीड़ जुट रही है। बहराइच पहुंचने के बाद यह भारी वाहन जिले के रास्ते लखीमपुर की ओर बढ़ रहा है।
बहराइच के रास्ते लखीमपुर पहुंचाया जा रहा भारी वेसल
बेल्जियम से लाया गया यह औद्योगिक वेसल बलरामपुर चीनी मिल लिमिटेड के प्रस्तावित बायोप्लास्टिक संयंत्र के लिए महत्वपूर्ण उपकरण है। इसे विशेष ट्रेलर पर रखकर सड़क मार्ग से ले जाया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रक चंदौली और वाराणसी होते हुए बहराइच पहुंचा। इससे पहले यह दुलारपुर टोल प्लाजा के पास से गुजरा था। इसके बाद सोमवार शाम करीब छह बजे नानपारा क्षेत्र के गुलालपुरवा टोल प्लाजा के निकट पहुंचने की जानकारी दी गई।
वाहन के आकार, भारी वजन और धीमी गति के कारण इसका सफर सामान्य मालवाहक ट्रकों की तुलना में काफी अलग है। लगभग पांच किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने के कारण इसे गंतव्य तक पहुंचने में अधिक समय लग रहा है।
लखीमपुर के कुंभी में स्थापित हो रहा बायोप्लास्टिक प्लांट
बलरामपुर चीनी मिल लिमिटेड लखीमपुर खीरी के कुंभी यूनिट में गन्ने से पर्यावरण के अनुकूल बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बनाने के लिए संयंत्र स्थापित कर रही है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना में करीब 100 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।
इस प्लांट में पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए और को-पॉलिमर के निर्माण तथा अनुसंधान की योजना है। रिपोर्ट में इसकी उत्पादन क्षमता 100 टन प्रतिवर्ष बताई गई है। इसी परियोजना के लिए भारी औद्योगिक वेसल को विशेष ट्रेलर से लाया जा रहा है।
गन्ने पर आधारित ऐसे संयंत्रों का उद्देश्य कृषि आधारित कच्चे माल का उपयोग करके प्लास्टिक के वैकल्पिक उत्पाद तैयार करना है। इससे औद्योगिक उत्पादन में कृषि उपज और उसके अवशेषों के इस्तेमाल की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
गन्ने से कैसे तैयार होगा बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक?
गन्ने से बायोप्लास्टिक बनाने की प्रक्रिया में कच्चे माल को पहले उपयोगी रासायनिक पदार्थों में बदला जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया में गन्ने की शर्करा और उपयुक्त अवशेषों से सूक्ष्मजीवों की मदद से लैक्टिक एसिड तैयार किया जा सकता है। इसके बाद रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिए इसे पॉलीलैक्टिक एसिड यानी पीएलए में बदला जाता है।
पीएलए का उपयोग पैकेजिंग, डिस्पोजेबल उत्पादों और कुछ अन्य प्लास्टिक विकल्पों में किया जा सकता है। इसकी खासियत यह है कि उपयुक्त औद्योगिक कंपोस्टिंग परिस्थितियों में यह पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक की तुलना में बेहतर तरीके से विघटित हो सकता है।
हालांकि, बायोडिग्रेडेबल होने का अर्थ यह नहीं है कि हर ऐसा उत्पाद खुले वातावरण में तुरंत नष्ट हो जाएगा। इसके विघटन की गति उत्पाद की संरचना और उपलब्ध परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के दूसरे प्लांट का भी जिक्र
रिपोर्ट में इसी स्थान पर एक अन्य बड़े संयंत्र का भी उल्लेख किया गया है। इसके लिए तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश और करीब 80 हजार टन प्रतिवर्ष उत्पादन क्षमता की जानकारी दी गई है।
इस परियोजना में भी गन्ने को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की बात कही गई है। हालांकि, दोनों परियोजनाओं के निवेश, उत्पादन क्षमता और संचालन की स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है। उपलब्ध विवरण में दूसरे संयंत्र की पूरी परियोजना संबंधी जानकारी नहीं दी गई है।
विशालकाय ट्रक देखने के लिए उमड़ी लोगों की भीड़
बहराइच में इस ट्रक के पहुंचने की खबर के बाद स्थानीय लोगों में इसे देखने को लेकर उत्सुकता रही। सामान्य ट्रकों की तुलना में इसका आकार काफी बड़ा है और विशेष पहियों वाले ट्रेलर पर भारी वेसल लदा हुआ है।
ऐसे भारी परिवहन में मार्ग की चौड़ाई, पुलों की क्षमता, मोड़, बिजली के तार और यातायात प्रबंधन जैसे पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। धीमी रफ्तार से चलने के कारण रास्ते में यातायात पर भी असर पड़ सकता है।
भारत में बायोप्लास्टिक उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?
गन्ने से बनने वाला पीएलए प्लास्टिक के वैकल्पिक स्रोतों में शामिल है। यदि इसका उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर सफल रहता है, तो पैकेजिंग और अन्य उपयुक्त क्षेत्रों में इसके इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्य में कृषि आधारित उद्योगों के विकास से गन्ने के उपयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे चीनी उद्योग से जुड़े कच्चे माल का विविध इस्तेमाल भी संभव है।
फिलहाल बहराइच से गुजर रहा विशालकाय ट्रक इस औद्योगिक परियोजना के लिए जरूरी उपकरण लेकर आगे बढ़ रहा है। इसके लखीमपुर खीरी पहुंचने और संयंत्र की स्थापना से जुड़ी आगे की जानकारी मिलने के बाद परियोजना की वास्तविक उत्पादन क्षमता और संचालन की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
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