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SIR कोई नई प्रक्रिया नहीं: भूपेंद्र यादव

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच कहा है कि यह चुनाव आयोग की कोई नई प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने कहा कि देश में इससे पहले भी आठ बार मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण कराया जा […]

SIR पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का बयान

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच कहा है कि यह चुनाव आयोग की कोई नई प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने कहा कि देश में इससे पहले भी आठ बार मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण कराया जा चुका है और वर्तमान प्रक्रिया उसी चुनावी व्यवस्था की अगली कड़ी है। उनका कहना है कि SIR का मूल उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता, विश्वसनीयता और वास्तविक मतदाताओं की सही स्थिति सुनिश्चित करना है।

एक संवाद कार्यक्रम में शामिल भूपेंद्र यादव ने विपक्ष की ओर से SIR पर उठाए जा रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि इस प्रक्रिया को अचानक शुरू की गई नई व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी है। उन्होंने दावा किया कि आजादी के बाद मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का लंबा इतिहास रहा है और अलग-अलग समय पर चुनाव आयोग ने देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी प्रक्रिया चलाई है।

भूपेंद्र यादव ने कहा कि देश में मौजूदा SIR नौवीं व्यापक प्रक्रिया है और इससे पहले अलग-अलग चरणों में आठ बार विशेष गहन पुनरीक्षण किया जा चुका है। उन्होंने जिन अवधियों का उल्लेख किया, उनमें 1952, 1957, 1961, 1965-66, 1973-74, 1977-79, 1992-95 और 2002-05 के दौरान हुए पुनरीक्षण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इसलिए SIR को लोकतांत्रिक व्यवस्था में पहली बार होने वाली प्रक्रिया बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

हालांकि ऐतिहासिक रिकॉर्ड को समझते समय यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले गहन पुनरीक्षण की तारीख पूरे देश में एक समान नहीं रही। चुनाव आयोग के 2026 के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पिछली intensive revision की qualifying date 1 जनवरी 2002 थी, जबकि झारखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य क्षेत्रों में 2003, पूर्वोत्तर तथा कुछ अन्य राज्यों में 2005 और अरुणाचल प्रदेश में 2006 की qualifying date दर्ज है। इसलिए “24 साल बाद SIR” वाला संदर्भ उन राज्यों के लिए अधिक सटीक है जिनकी पिछली आधार सूची 2002 की थी।

भूपेंद्र यादव ने अपने बयान में लंबे समय के अंतराल को मौजूदा SIR की आवश्यकता से जोड़ा।

उन्होंने कहा कि लगभग दो दशक से अधिक समय में देश की आबादी और मतदाताओं की भौगोलिक स्थिति में बड़े बदलाव हुए हैं। रोजगार, शिक्षा, विवाह, शहरीकरण, औद्योगिक विस्तार और दूसरी सामाजिक-आर्थिक वजहों से करोड़ों लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर गए हैं।

उनके मुताबिक जब मतदाता एक जिले या राज्य से दूसरे स्थान पर स्थायी या लंबे समय के लिए स्थानांतरित होता है तो मतदाता सूची में भी उसकी वास्तविक निवास स्थिति को अपडेट करना जरूरी हो जाता है।

इसी तर्क को समझाने के लिए भूपेंद्र यादव ने अपना व्यक्तिगत उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 24 वर्षों में वह भी राजस्थान के अलवर से दिल्ली आ गए हैं। ऐसे में यदि किसी मतदाता की पुरानी सूची और वर्तमान निवास का मिलान किया जाता है तो इस तरह का migration रिकॉर्ड में दिखाई देना स्वाभाविक है।

उनका कहना था कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के स्थानांतरण का सामने आना अपने आप यह प्रमाण नहीं है कि उनके मतदान अधिकार को अवैध तरीके से समाप्त किया गया है।

यहां SIR की प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है।

मतदाता सूची केवल यह दर्ज नहीं करती कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक और मतदान आयु का है। मतदाता का नाम उस निर्वाचन क्षेत्र की सूची में होना चाहिए जहां वह सामान्य रूप से निवास करता है।

एक ही पात्र व्यक्ति का अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में एक से अधिक सक्रिय मतदाता प्रविष्टियों में बने रहना चुनावी सूची की शुद्धता के लिए समस्या पैदा कर सकता है।

इसी प्रकार मृत मतदाताओं के नाम, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों की पुरानी प्रविष्टियां और एक ही मतदाता की दोहरी प्रविष्टियां समय के साथ सूची में बनी रह सकती हैं।

चुनाव आयोग ने भी अपने SIR आदेशों में Absent, Shifted, Death और Duplicate जैसी श्रेणियों का स्पष्ट उल्लेख किया है। 2026 के SIR दिशानिर्देशों में बूथ लेवल अधिकारियों को ऐसे मतदाताओं की स्थिति स्थानीय जांच के आधार पर दर्ज करने और ड्राफ्ट सूची में नाम न आने पर संभावित कारण सार्वजनिक करने की व्यवस्था दी गई है।

आयोग ने यह भी निर्देश दिया है कि जिन मतदाताओं का enumeration form वापस नहीं आता, उनके मामले में BLO आसपास के मतदाताओं से जानकारी लेकर संभावित कारण दर्ज कर सकता है।

ऐसे नामों की बूथवार सूची पंचायत भवन, शहरी निकाय कार्यालय और संबंधित प्रशासनिक कार्यालयों में सार्वजनिक करने की व्यवस्था भी बनाई गई है ताकि संबंधित नागरिक को जानकारी मिल सके।

इसके साथ दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया भी SIR का हिस्सा है।

यानी ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम न आने का अर्थ हर मामले में अंतिम रूप से मताधिकार समाप्त होना नहीं है। पात्र व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा प्रस्तुत करने और रिकॉर्ड सुधार कराने का अवसर उपलब्ध होता है।

भूपेंद्र यादव का कहना है कि इस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को “वोट काटने” की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक है।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं बल्कि मतदाता सूची को भी सही और अद्यतन रखना है।

उनके अनुसार यदि सूची में मृत, स्थानांतरित या दोहरे नाम बने रहें तो उसी चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगाए जाएंगे। लेकिन जब आयोग उन्हीं रिकॉर्डों की गहन जांच करता है तो प्रक्रिया का विरोध करना विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है।

उन्होंने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि पहले मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग से सवाल किए गए और अब सूची के पुनरीक्षण पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।

यह भाजपा और केंद्रीय मंत्री का राजनीतिक पक्ष है।

विपक्ष की आपत्ति इससे अलग है।

विपक्षी दलों ने SIR के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट या अंतिम सूची से बाहर होने, दस्तावेजी आवश्यकताओं, प्रवासी और गरीब मतदाताओं पर संभावित असर तथा पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि किसी पात्र मतदाता का नाम केवल प्रक्रियात्मक कठिनाई या दस्तावेज संबंधी समस्या के कारण सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।

चुनाव आयोग इन आरोपों से असहमति जताता रहा है और उसका कहना है कि पात्र मतदाताओं को शामिल करने के लिए दावे, आपत्तियां, नोटिस और अपील की व्यवस्था उपलब्ध है।

इस बहस में सुप्रीम कोर्ट का 27 मई 2026 का फैसला भी महत्वपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में की गई SIR प्रक्रिया की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण कराने की शक्ति प्राप्त है।

अदालत ने माना कि आयोग विशेष परिस्थितियों में कारण दर्ज करके मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण करा सकता है।

अदालत के सामने बिहार SIR के मामले में आयोग ने तेजी से शहरीकरण, बड़े पैमाने पर migration, मौतों की पर्याप्त सूचना न मिलना और duplicate entries जैसी समस्याओं को प्रक्रिया शुरू करने के कारणों में गिनाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इन उद्देश्यों को वैध माना और SIR की वैधानिक शक्ति को स्वीकार किया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा SIR कराने की शक्ति को वैध ठहराना यह नहीं कहता कि भविष्य में प्रक्रिया के हर व्यक्तिगत निर्णय या किसी मतदाता की शिकायत की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।

किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटने, प्रक्रिया का पालन न होने या समानता और प्राकृतिक न्याय से जुड़ा प्रश्न अलग-अलग मामलों में चुनौती का विषय बन सकता है।

इसी वजह से SIR की राजनीतिक बहस दो अलग स्तरों पर चल रही है।

पहला सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है।

इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की शक्ति को मान्यता दी है।

दूसरा सवाल यह है कि किसी विशेष राज्य या मतदाता के मामले में SIR किस प्रकार लागू किया गया और क्या प्रत्येक पात्र व्यक्ति को पर्याप्त अवसर मिला।

इस दूसरे प्रश्न पर दावे, आपत्तियां, अपील और अदालत की समीक्षा जैसे रास्ते बने रहते हैं।

भूपेंद्र यादव ने अपने बयान में मुख्य रूप से पहले पहलू पर जोर दिया।

उनका कहना था कि जब संविधान और चुनावी कानून आयोग को मतदाता सूची की समीक्षा की जिम्मेदारी देते हैं तथा ऐसी प्रक्रिया अतीत में कई बार हो चुकी है, तब इसे असाधारण या लोकतंत्र विरोधी कदम के रूप में चित्रित करना उचित नहीं है।

उन्होंने SIR को चुनाव आयोग की नियमित और संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा बताया।

चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज भी बताते हैं कि वर्तमान SIR प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की गई है।

14 मई 2026 को आयोग ने तीसरे चरण में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तराखंड समेत 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए SIR कार्यक्रम जारी किया था।

आयोग ने इस प्रक्रिया का कानूनी आधार संविधान का अनुच्छेद 324, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 और मतदाता पंजीकरण से जुड़े संबंधित नियमों को बताया है।

2026 की प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी किए गए।

Enumeration phase में मतदाता से तत्काल दस्तावेज लेने की अनिवार्यता नहीं रखी गई। BLO को घर-घर जाकर फॉर्म उपलब्ध कराने और मतदाता को उसे भरने में सहायता देने का निर्देश दिया गया।

जिन मतदाताओं का संबंध पिछली intensive revision की मतदाता सूची में मौजूद अपनी या अपने रिश्तेदार की प्रविष्टि से स्थापित हो जाता है, उनके लिए प्रक्रिया अलग रखी गई।

जिन मामलों में पिछली सूची से linking नहीं हो पाती या जानकारी में अंतर मिलता है, उनमें draft roll प्रकाशित होने के बाद संबंधित ERO को नोटिस जारी करने की व्यवस्था दी गई।

यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में मतदाता सूची स्थिर दस्तावेज नहीं है।

हर वर्ष नए मतदाता 18 वर्ष की आयु पूरी करते हैं।

लोगों की मृत्यु होती है।

लोग पढ़ाई, रोजगार, विवाह या दूसरे कारणों से दूसरे शहरों और राज्यों में जाते हैं।

निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या और शहरी संरचना भी लगातार बदलती रहती है।

यदि इन परिवर्तनों का रिकॉर्ड समय पर अपडेट नहीं किया जाए तो मतदाता सूची और वास्तविक आबादी के बीच अंतर बढ़ सकता है।

भूपेंद्र यादव ने इसी migration factor को अपने तर्क का केंद्र बनाया।

उन्होंने कहा कि दो दशक से अधिक की अवधि में किसी व्यक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना सामान्य सामाजिक प्रक्रिया है।

इसलिए SIR के दौरान बड़ी संख्या में “shifted” मतदाता सामने आना अपने आप किसी साजिश का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

उदाहरण के रूप में उन्होंने स्वयं अलवर से दिल्ली आने की बात कही।

उनका तर्क था कि यदि पुरानी सूची में उनका नाम अलवर के पते से जुड़ा था और अब वह सामान्य रूप से दिल्ली में रहते हैं तो चुनावी सूची को भी इस वास्तविकता के अनुरूप होना चाहिए।

यही सिद्धांत किसी भी मतदाता पर लागू होता है।

लेकिन विपक्ष का कहना है कि migration की पहचान करते समय विशेष सावधानी जरूरी है क्योंकि अस्थायी रूप से काम या पढ़ाई के लिए बाहर रहने वाला व्यक्ति हमेशा अपने मूल स्थान से स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं माना जा सकता।

इसलिए “shifted” श्रेणी में नाम डालने से पहले उचित जांच और मतदाता को सुनवाई का मौका मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग ने भी 2026 के निर्देशों में ऐसी सूचियां सार्वजनिक करने, नोटिस देने और मतदाता को दावा प्रस्तुत करने की व्यवस्था पर जोर दिया है।

इस पूरी बहस में SIR और सामान्य वार्षिक मतदाता सूची संशोधन के बीच का अंतर भी समझना जरूरी है।

विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SSR नियमित अंतराल पर होता है और उसमें मौजूदा सूची को आधार बनाकर नाम जोड़ने, हटाने और सुधार की प्रक्रिया की जाती है।

इसके विपरीत intensive revision अधिक व्यापक सत्यापन अभ्यास हो सकता है जिसमें बूथ स्तर पर घर-घर संपर्क और पुरानी आधार सूची से linking जैसी प्रक्रिया शामिल होती है।

इसी वजह से SIR प्रशासनिक स्तर पर कहीं अधिक बड़ा अभियान होता है।

भूपेंद्र यादव का तर्क है कि लंबे अंतराल के बाद व्यापक घर-घर सत्यापन की आवश्यकता स्वाभाविक है।

दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि जितनी व्यापक प्रक्रिया होगी, उतनी ही अधिक पारदर्शिता और मतदाता सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी होगी।

यानी विवाद केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं है कि SIR पहले हुआ है या नहीं।

अब राजनीतिक संघर्ष इस बात पर भी है कि वर्तमान SIR में अपनाई जा रही पद्धति कितनी पारदर्शी है और कितने पात्र मतदाता अंतिम सूची में सुरक्षित रह पाते हैं।

ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर देखें तो यह स्पष्ट है कि intensive revision की अवधारणा भारत की चुनावी व्यवस्था में दशकों से मौजूद है।

भूपेंद्र यादव द्वारा आठ पुराने चक्रों का उल्लेख इसी पृष्ठभूमि में किया गया।

लेकिन यह भी स्पष्ट है कि अंतिम गहन पुनरीक्षण पूरे देश में एक ही वर्ष में नहीं हुआ था।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार राज्यों के आधार वर्ष अलग-अलग रहे हैं—कहीं 2002, कहीं 2003, कहीं 2005 और कुछ मामलों में 2006।

इसलिए वर्तमान बहस में ऐतिहासिक तथ्य और राजनीतिक दावे अलग-अलग करके देखना जरूरी है।

“SIR पहले कभी नहीं हुआ” कहना सही नहीं होगा।

वहीं “हर राज्य में ठीक 24 साल बाद SIR हो रहा है” कहना भी पूर्ण रूप से सटीक नहीं होगा।

अधिक सही स्थिति यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में पिछले intensive revision को दो दशक या उससे अधिक समय हो चुका था और राज्यवार अंतिम qualifying date अलग-अलग थी।

भूपेंद्र यादव ने इस लंबे अंतराल को वर्तमान प्रक्रिया का सबसे बड़ा औचित्य बताया।

उन्होंने कहा कि यदि 20 से 24 वर्षों तक आबादी, निवास और मतदाता स्थिति में हुए बदलावों को गहनता से नहीं जांचा जाएगा तो मतदाता सूची में गलतियां जमा होना स्वाभाविक है।

उनका कहना है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव का आधार है और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल होने पर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

इसी वजह से आयोग का दायित्व है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सूची में हो और अपात्र, मृत या दोहरी प्रविष्टियां हटाई जाएं।

यादव ने विपक्ष पर इस विषय में जनता के बीच भ्रम पैदा करने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा कि SIR के ऐतिहासिक रिकॉर्ड की जानकारी होते हुए भी इसे नई और असामान्य प्रक्रिया के रूप में पेश किया जा रहा है।

यह उनका राजनीतिक आरोप है और विपक्ष इससे असहमत है।

विपक्षी दलों का कहना है कि उनका विरोध SIR की ऐतिहासिक अवधारणा से नहीं बल्कि वर्तमान प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के संभावित बहिष्कार और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़ा है।

इसलिए राजनीतिक बहस में दोनों पक्ष अलग-अलग प्रश्नों पर जोर दे रहे हैं।

सरकार और भाजपा नेता SIR के ऐतिहासिक तथा कानूनी आधार को सामने रख रहे हैं।

विपक्ष प्रक्रिया के प्रभाव, नाम हटने की संख्या और मतदाताओं को मिलने वाले अवसर पर सवाल उठा रहा है।

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी इन राजनीतिक आरोपों से अलग होकर प्रशासनिक रूप से यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम मतदाता सूची में केवल पात्र मतदाता रहें और कोई पात्र नागरिक प्रक्रियात्मक कारण से मताधिकार से वंचित न हो।

2026 के SIR निर्देशों में आयोग ने पुराने, बीमार, दिव्यांग, गरीब और दूसरे कमजोर समूहों को अनावश्यक परेशानी से बचाने के निर्देश भी अधिकारियों को दिए हैं।

इसके अलावा नई मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया भी SIR के साथ बंद नहीं होती।

BLO को घर-घर सत्यापन के दौरान नए पात्र मतदाताओं के लिए Form 6 उपलब्ध रखने को कहा गया है।

इसका उद्देश्य ऐसे युवाओं या नए निवासियों को भी सूची में शामिल करना है जो पहली बार मतदाता बन रहे हैं।

भूपेंद्र यादव का कहना है कि इसी पूरे संदर्भ को देखकर SIR का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उनके मुताबिक यदि केवल हटाए गए या shifted नामों की संख्या देखकर निष्कर्ष निकाला जाए और नई प्रविष्टियों, मृत्यु, migration तथा duplicate records को नजरअंदाज किया जाए तो वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आएगी।

मौजूदा विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि SIR न तो भारतीय चुनावी व्यवस्था के लिए पूरी तरह नई अवधारणा है और न ही वर्तमान प्रक्रिया केवल एक सामान्य वार्षिक सूची संशोधन है।

यह व्यापक गहन पुनरीक्षण है जिसकी कानूनी शक्ति को सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है, लेकिन इसके प्रत्येक चरण में मतदाता अधिकार और उचित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

भूपेंद्र यादव ने अपने बयान में इसी ऐतिहासिक और कानूनी पृष्ठभूमि के आधार पर विपक्ष के आरोपों को खारिज किया।

उन्होंने कहा कि 1950 के दशक से चुनाव आयोग समय-समय पर ऐसी प्रक्रिया करता रहा है और दो दशक से अधिक लंबे अंतराल के बाद migration तथा जनसांख्यिकीय बदलावों को मतदाता सूची में दर्ज करना आवश्यक है।

उनके मुताबिक उनका स्वयं अलवर से दिल्ली आना इस बात का सामान्य उदाहरण है कि 24 वर्षों में किसी मतदाता की निवास स्थिति बदल सकती है।

आने वाले समय में SIR पर राजनीतिक विवाद जारी रहने की संभावना है, लेकिन अंतिम कसौटी चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित मतदाता सूची, दावे-आपत्तियों के निस्तारण और यह सुनिश्चित करने की क्षमता होगी कि कोई पात्र मतदाता गलत तरीके से सूची से बाहर न रहे।

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