लखनऊ में बारिश और जलभराव के बाद डेंगू के मामलों में तेजी देखने को मिल रही है। स्वास्थ्य विभाग के ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी से अक्टूबर के मध्य तक राजधानी में डेंगू के 434 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। सितंबर में संक्रमण की रफ्तार सबसे ज्यादा रही और अकेले इसी महीने 193 मरीज सामने आए। अक्टूबर के शुरुआती दिनों में भी नए मामलों का सिलसिला जारी है। बढ़ते मरीजों को देखते हुए राजधानी के सरकारी अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को अलर्ट मोड पर रखा गया है तथा डेंगू मरीजों के लिए अलग वार्ड और मच्छरदानी वाले बेड तैयार किए गए हैं।
इससे पहले उपलब्ध आंकड़ों में संक्रमित मरीजों की संख्या 403 के आसपास बताई जा रही थी, लेकिन नए मरीज सामने आने के साथ कुल संख्या आगे बढ़ चुकी है। स्वास्थ्य विभाग लगातार नए मामलों की निगरानी कर रहा है। राजधानी में बारिश रुकने के बाद जगह-जगह जमा पानी, नमी और मौसम में बदलाव को एडीज मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल स्थिति माना जा रहा है।
अस्पतालों में भी डेंगू जैसे लक्षण लेकर पहुंचने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी है। हाल के दिनों में केजीएमयू, लोहिया संस्थान, बलरामपुर अस्पताल और सिविल अस्पताल सहित राजधानी के बड़े चिकित्सा संस्थानों में डेंगू मरीज भर्ती किए गए हैं। चार बड़े अस्पतालों में एक समय 34 डेंगू मरीज भर्ती होने की जानकारी सामने आई थी। डॉक्टरों ने आने वाले दिनों को विशेष रूप से संवेदनशील बताया है क्योंकि बारिश के बाद जमा पानी में पनपे मच्छरों की संख्या बढ़ने का असर संक्रमण के मामलों में कुछ समय बाद दिखाई दे सकता है।
स्थिति को देखते हुए अस्पतालों में पहले से बनाए गए डेंगू वार्ड सक्रिय किए जा रहे हैं। सिविल अस्पताल, बलरामपुर अस्पताल, लोकबंधु अस्पताल, केजीएमयू और डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे प्रमुख सरकारी अस्पतालों और संस्थानों में डेंगू मरीजों के लिए अलग बेड और वार्ड की व्यवस्था की गई है। मरीजों को मच्छरदानी के भीतर रखने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि संक्रमित व्यक्ति को काटने के बाद मच्छर दूसरे लोगों तक वायरस न पहुंचा सके।
राजधानी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी तैयारियां बढ़ाई गई हैं। डेंगू या तेज बुखार के मरीजों को सामान्य मरीजों से अलग रखने, उनकी नियमित निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर बड़े अस्पतालों में रेफर करने की व्यवस्था की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि हल्के और मध्यम लक्षण वाले मरीजों का समय पर इलाज शुरू हो और गंभीर स्थिति बनने से पहले उन्हें आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल सके।
लखनऊ में सितंबर से डेंगू के मामलों में अचानक तेजी दर्ज की गई। जनवरी से अगस्त तक संक्रमण अपेक्षाकृत नियंत्रित रहा, लेकिन मानसून के बाद तस्वीर बदलने लगी। सितंबर में कुल 193 मामलों की पुष्टि हुई, जो इस साल किसी एक महीने में सबसे अधिक संख्या है। अक्टूबर के शुरुआती दिनों में भी बड़ी संख्या में नए मरीज सामने आए हैं।
बारिश के बाद शहर के कई हिस्सों में हुए जलभराव ने चिंता बढ़ाई है। घरों की छतों, कूलरों, खाली प्लॉट, गमलों, टूटे बर्तनों, टायरों और निर्माण स्थलों में रुका हुआ साफ पानी एडीज मच्छर के प्रजनन के लिए अनुकूल जगह बन सकता है। डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर सामान्य तौर पर दिन के समय अधिक सक्रिय होता है और घरों तथा आबादी वाले इलाकों के आसपास ही पनपता है।
फैजुल्लागंज जैसे जलभराव से प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की टीमें एंटी-लार्वा दवा का छिड़काव और फॉगिंग कर रही हैं। हाल में गोमती नदी के बढ़े जलस्तर और भारी बारिश के कारण शहर के कुछ निचले हिस्सों में पानी लंबे समय तक जमा रहा था। पानी उतरने के बाद ऐसे इलाकों में मच्छरों के प्रजनन की आशंका बढ़ गई है।
आलमबाग, इंदिरानगर, गोमतीनगर, चिनहट, गोसाईंगंज और आसपास के कई क्षेत्रों में बुखार और डेंगू जैसे लक्षणों वाले मरीज अस्पतालों और क्लीनिकों तक पहुंच रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से घरों और आसपास पानी जमा नहीं होने देने की अपील की है।
डेंगू एक वायरल संक्रमण है जो संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह सीधे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सामान्य संपर्क के जरिए नहीं फैलता। मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटने के बाद वायरस लेकर दूसरे व्यक्ति तक पहुंचा सकता है। इसी वजह से डेंगू मरीजों को अस्पताल में मच्छरदानी में रखने की व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है।
डेंगू के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं। अचानक तेज बुखार, सिर दर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, शरीर में कमजोरी, उल्टी, मतली और त्वचा पर लाल चकत्ते इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं।
कई मरीज कुछ दिनों में सामान्य उपचार और पर्याप्त तरल पदार्थ लेने से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में बीमारी गंभीर रूप ले सकती है। लगातार उल्टी, पेट में तेज दर्द, नाक या मसूड़ों से रक्तस्राव, असामान्य कमजोरी, सांस लेने में परेशानी या अत्यधिक बेचैनी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तत्काल अस्पताल पहुंचना जरूरी है।
डेंगू को लेकर सबसे अधिक चर्चा प्लेटलेट्स की संख्या की होती है, लेकिन केवल प्लेटलेट कम होना ही बीमारी की गंभीरता तय नहीं करता। डॉक्टर मरीज की पूरी स्थिति, रक्तचाप, शरीर में पानी की मात्रा, रक्तस्राव, हेमेटोक्रिट और दूसरे clinical signs को देखकर उपचार तय करते हैं।
इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के केवल प्लेटलेट्स की रिपोर्ट देखकर घबराना या खुद से दवाएं लेना उचित नहीं है। स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सकों की सलाह है कि तेज बुखार होने पर डॉक्टर से संपर्क करें और जरूरत के अनुसार जांच कराएं।
डेंगू या संभावित डेंगू के मरीजों को पर्याप्त पानी और दूसरे तरल पदार्थ लेते रहना बेहद महत्वपूर्ण होता है। बीमारी के दौरान dehydration होने से स्थिति गंभीर हो सकती है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लेना चाहिए और बिना सलाह ऐसी painkiller दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जिनसे रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है।
बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों में विशेष सावधानी की जरूरत होती है। ऐसे मरीजों में लक्षण दिखाई देने पर इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए।
लखनऊ के अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद डॉक्टरों और कर्मचारियों को भी सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। बुखार लेकर आने वाले मरीजों की screening, जरूरत पड़ने पर डेंगू जांच और गंभीर मरीजों को तत्काल भर्ती करने की व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है।
अस्पताल प्रशासन के लिए अलग डेंगू वार्ड बनाने का एक उद्देश्य मरीजों की निगरानी आसान करना भी है। एक ही स्थान पर मरीजों को रखने से डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ नियमित रूप से उनके तापमान, रक्तचाप, प्लेटलेट्स और दूसरी जरूरी जांचों पर नजर रख सकते हैं।
मच्छरदानी वाले बेड इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि डेंगू मरीज के रक्त में वायरस मौजूद रहने के दौरान यदि एडीज मच्छर उसे काटता है तो बाद में वही मच्छर किसी दूसरे व्यक्ति तक संक्रमण पहुंचा सकता है। अस्पताल के भीतर इस श्रृंखला को रोकने के लिए मरीजों को मच्छरों से सुरक्षित रखना जरूरी है।
नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमें भी संवेदनशील इलाकों में मच्छरों के लार्वा की जांच कर रही हैं। जिन घरों, कार्यालयों या दूसरे परिसरों में लंबे समय तक पानी जमा मिलता है, वहां लोगों को इसे हटाने और नियमित सफाई रखने के निर्देश दिए जा रहे हैं।
एंटी-लार्वा अभियान के साथ फॉगिंग भी कराई जा रही है। हालांकि केवल फॉगिंग से डेंगू नियंत्रित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका प्रभाव मुख्य रूप से वयस्क मच्छरों पर होता है। सबसे प्रभावी उपाय मच्छरों के breeding source यानी जमा पानी को खत्म करना है।
लोगों को सप्ताह में कम से कम एक दिन घर के कूलर, पानी की टंकी, गमले और दूसरी ऐसी जगहों की जांच करनी चाहिए जहां पानी जमा हो सकता है। कूलर का पानी नियमित रूप से बदलने और उसे साफ रखने की सलाह दी गई है।
घर के आसपास पुराने टायर, प्लास्टिक के डिब्बे, नारियल के खोल, बोतलें या दूसरे सामान में पानी जमा होने से भी मच्छरों का प्रजनन हो सकता है। एडीज मच्छर को बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती और छोटे कंटेनर में जमा पानी भी पर्याप्त हो सकता है।
लोगों को पूरी बांह वाले कपड़े पहनने, विशेष रूप से बच्चों को स्कूल भेजते समय शरीर को अधिक से अधिक ढकने और जरूरत के अनुसार मच्छररोधी उत्पादों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।
स्कूल और अन्य संस्थानों में भी मच्छर से बचाव के उपाय महत्वपूर्ण हैं। चूंकि एडीज मच्छर दिन में सक्रिय रहता है, इसलिए केवल रात में मच्छरदानी का इस्तेमाल डेंगू से पूरी सुरक्षा नहीं देता। दिन के समय भी सावधानी आवश्यक है।
लखनऊ में इस साल के कुल मामलों की तुलना पिछले वर्षों से करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि डेंगू के मामलों में हर साल मौसम, बारिश, जांच की संख्या और surveillance व्यवस्था के आधार पर बड़ा अंतर हो सकता है। स्वास्थ्य विभाग इसलिए केवल कुल संख्या पर नहीं बल्कि संक्रमण के hotspots की पहचान पर भी काम करता है।
किस इलाके से लगातार मरीज सामने आ रहे हैं, वहां घर-घर सर्वे, बुखार के मरीजों की पहचान और मच्छरों के breeding sites की जांच की जा सकती है। इससे संक्रमण के स्थानीय प्रसार को रोकने में मदद मिलती है।
अस्पतालों में अलग वार्ड बनने के बावजूद स्वास्थ्य अधिकारियों की प्राथमिकता यही है कि अधिकतर मामले गंभीर स्तर तक न पहुंचें। शुरुआती पहचान, पर्याप्त hydration और चिकित्सकीय निगरानी से बड़ी संख्या में मरीज बिना गंभीर जटिलता के ठीक हो सकते हैं।
डेंगू में सबसे खतरनाक स्थिति तब हो सकती है जब मरीज गंभीर रक्तस्राव या shock जैसी स्थिति में पहुंच जाए। ऐसे मामलों में तत्काल अस्पताल में विशेषज्ञ इलाज की आवश्यकता होती है। इसी कारण स्वास्थ्य विभाग ने तेज बुखार और अन्य गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करने की सलाह दी है।
शहर में वायरल बुखार और दूसरे मौसमी संक्रमण भी चल रहे हैं, जिससे केवल लक्षण के आधार पर डेंगू की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच कराने की सलाह देते हैं।
हर बुखार डेंगू नहीं होता और हर डेंगू मरीज को अस्पताल में भर्ती करना भी जरूरी नहीं होता। मरीज की स्थिति के आधार पर डॉक्टर घर पर उपचार, निगरानी या अस्पताल में भर्ती करने का फैसला करते हैं।
हालांकि लगातार बुखार, कमजोरी, उल्टी या रक्तस्राव जैसे संकेतों के साथ स्वयं इलाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है।
बारिश के बाद आने वाले अगले कुछ सप्ताह स्वास्थ्य विभाग के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। मच्छरों का जीवन चक्र और बारिश के बाद जमा पानी के कारण मामलों में कुछ समय तक वृद्धि जारी रह सकती है। डॉक्टरों ने भी अक्टूबर के मध्य तक के समय को डेंगू के लिहाज से विशेष सतर्कता वाला बताया है।
ऐसे में प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ अस्पतालों में पर्याप्त बेड, जांच और इलाज सुनिश्चित करना है, दूसरी तरफ शहर में मच्छरों के प्रजनन को रोकना भी जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से प्रशासनिक कार्रवाई पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय घर के स्तर पर भी सावधानी बरतने की अपील की है। किसी घर या मोहल्ले में जमा पानी हटाना कई बार फॉगिंग से भी अधिक प्रभावी कदम साबित हो सकता है।
लखनऊ में ताजा आंकड़ों के अनुसार डेंगू के कुल मामले 434 तक पहुंच चुके हैं और सितंबर इस साल अब तक सबसे अधिक संक्रमण वाला महीना रहा है। अस्पतालों में अलग वार्ड और मच्छरदानी वाले बेड तैयार हैं, जबकि प्रभावित इलाकों में एंटी-लार्वा अभियान और फॉगिंग जारी है।
आने वाले दिनों में मामलों की संख्या किस दिशा में जाती है, यह मौसम और रोकथाम के उपायों पर निर्भर करेगा। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग का सबसे स्पष्ट संदेश यही है कि घर के आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरों से बचाव करें और तेज बुखार या डेंगू के दूसरे लक्षण दिखाई देने पर समय पर जांच और इलाज कराएं।