भारत की राजनीति में हालात तेजी से बदल रहे हैं और Congress to BJP Migration यानी दल-बदल का ट्रेंड अब खुलकर सामने आ चुका है। हाल ही में कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का उदाहरण इस बदलाव को साफ दिखाता है—जहां फरवरी में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की कड़ी आलोचना करने वाले नेता, कुछ ही हफ्तों बाद बीजेपी में शामिल होकर उनके साथ नजर आए। यह सिर्फ एक व्यक्ति का बदलाव नहीं, बल्कि Indian Politics में बढ़ते Political Migration और Party Switching का संकेत है, जहां चुनाव नजदीक आते ही दलबदल अब सामान्य होता जा रहा है।
आज राजनीति में विचारधारा की जगह अवसरवाद और सत्ता की राजनीति ज्यादा प्रभावी दिख रही है। हिमंत बिस्वा सरमा खुद इस बदलाव का बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने कांग्रेस से शुरुआत कर बीजेपी में शामिल होकर सत्ता के शिखर तक पहुंच बनाई। आंकड़े भी इस ट्रेंड को मजबूत करते हैं—2024 के चुनावों में बीजेपी के 100 से ज्यादा उम्मीदवार दलबदलू थे और पिछले दशक में 200 से अधिक नेता, जिनमें करीब 40% कांग्रेस से थे, पार्टी में शामिल हुए। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक इकोसिस्टम के पुनर्गठन का संकेत है।
वहीं, विचारधारा की सीमाएं भी अब धुंधली पड़ती नजर आ रही हैं। जो नेता पहले एक-दूसरे के विरोध में खड़े थे, वे अब एक ही मंच पर दिखाई देते हैं और घोषणापत्र भी स्थायी प्रतिबद्धता के बजाय लचीले दस्तावेज बनते जा रहे हैं। दलबदल रोकने के लिए बने कानून भी ‘विलय’ और समूह बदलाव के जरिए अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। इसके साथ ही कांग्रेस का संगठनात्मक संकट—नेतृत्व की कमी और सीमित राजनीतिक संभावनाएं—भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में दलबदल अब विचारधारा से ज्यादा “राजनीतिक गणित” बन चुका है, जो यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति में सत्ता, संसाधन और प्रभाव का संतुलन तेजी से बदल रहा है।





