Kanshi Ram की 91वीं जयंती को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत गरमा गई है। UP Politics में इस बार कांशीराम जयंती महज श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि दलित वोट बैंक को लेकर नई रणनीति का मंच बन गई है।
Akhilesh Yadav ने 15 मार्च को प्रदेशभर में कांशीराम जयंती को ‘बहुजन दिवस’ या ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाने के निर्देश दिए हैं। वहीं Mayawati ने इसे “घोर अवसरवाद” बताते हुए समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोला है।
क्या है Akhilesh का ‘मिशन Kanshi Ram’?
कांशीराम ने Bahujan Samaj Party की स्थापना कर दलित राजनीति को नई पहचान दी थी। उनके नेतृत्व में तैयार हुई सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।अब Samajwadi Party प्रमुख अखिलेश यादव दलित और अति पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
अखिलेश का PDA फॉर्मूला—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—2024 लोकसभा चुनाव में असरदार साबित हुआ। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसे और मजबूत करने के लिए सपा कांशीराम की विरासत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला रही है।
मायावती क्यों हैं नाराज?
मायावती का मानना है कि कांशीराम की विचारधारा बसपा की मूल आत्मा है और सपा इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का “चाल, चरित्र और चेहरा” हमेशा से दलित और बसपा विरोधी रहा है। कांशीराम जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाने को उन्होंने “राजनीतिक नाटकबाजी” करार दिया।
बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने भी सवाल उठाया कि जिस सपा सरकार ने कांशीराम नगर का नाम बदलकर कासगंज कर दिया, वह अब किस आधार पर उनकी विरासत की बात कर रही है।
दलित वोट बैंक पर सियासी शह-मात
उत्तर प्रदेश में लगभग 20% दलित मतदाता हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ दलित समर्थन जुड़ने पर सपा का वोट शेयर 40% से ऊपर जा सकता है।
सपा की रणनीति:
बसपा के पूर्व नेताओं को साथ जोड़ना
अंबेडकर-कांशीराम विचारधारा को राजनीतिक विमर्श में शामिल करना
PDA गठजोड़ के जरिए 50% वोट शेयर का लक्ष्य
वहीं मायावती अपनी कोर दलित वोटबैंक को एकजुट रखने की कोशिश में हैं।
इतिहास और गठबंधन की पृष्ठभूमि
1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव किया था। लेकिन ‘गेस्ट हाउस कांड’ के बाद दोनों दलों के रिश्ते बिगड़ गए। 2019 में दोनों दल फिर साथ आए, मगर गठबंधन ज्यादा समय नहीं चला। अब कांशीराम जयंती के बहाने दोनों दलों के बीच वैचारिक टकराव खुलकर सामने आ गया है।








