वंदे मातरम को लेकर देवबंदी उलेमा का बड़ा बयान सामने आया है। देवबंदी उलेमा ने स्पष्ट कहा कि मुसलमानों पर वंदे मातरम पढ़ने के लिए किसी भी तरह का दबाव नहीं डाला जाना चाहिए, क्योंकि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है।
उलेमा के अनुसार, उन्हें वंदे मातरम से निजी आपत्ति नहीं है और कोई व्यक्ति चाहे तो इसे अपनी इच्छा से पढ़ सकता है। लेकिन गीत के कुछ हिस्सों में देवी-देवताओं की पूजा और अर्चना का उल्लेख आता है, जिसे मुस्लिम आस्था के अनुरूप स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की इबादत को शिर्क माना जाता है, जो बड़ा गुनाह है।
“वंदे मातरम जबरदस्ती न थोपा जाए”
उलेमा ने कहा कि इसी धार्मिक कारण से कई संस्थाएं और विद्वान वंदे मातरम के कुछ अंशों का विरोध करते रहे हैं। यह विरोध न देशद्रोह है, न नफरत, बल्कि धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा विषय है।
उन्होंने दोहराया कि मुसलमान देश से मोहब्बत करते हैं और संविधान का सम्मान करते हैं, क्योंकि संविधान ही उन्हें अपने धर्म का पालन करने की पूरी आजादी देता है।
सरकार से अपील करते हुए उलेमा ने कहा कि वंदे मातरम को मुसलमानों पर अनिवार्य न किया जाए। अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से इसे पढ़ना चाहता है, तो किसी को आपत्ति नहीं, मगर किसी पर दबाव डालना संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।
“भारत विविधता वाला देश—आस्था का सम्मान जरूरी”
उलेमा ने आगे कहा कि भारत की असली ताकत इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता है। इसलिए जरूरी है कि किसी भी धार्मिक आस्था को नजरअंदाज कर किसी पर कोई चीज जबरन थोपने की कोशिश न की जाए।
उनका कहना है कि आपसी सम्मान और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखकर ही देश में सौहार्द बना रह सकता है।








