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UP Politics: SP में नसीमुद्दीन की एंट्री

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UP Politics: नसीमुद्दीन सिद्दीकी SP में शामिल, 2027 चुनाव से पहले सियासी समीकरण बदले

उत्तर प्रदेश में UP Assembly Election 2027 की सियासी तपिश के बीच दलबदल का दौर तेज हो गया है। इसी क्रम में कांग्रेस छोड़ने वाले पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अखिलेश यादव की मौजूदगी में Samajwadi Party का दामन थाम लिया।

उनके साथ प्रतापगढ़ के पूर्व विधायक राजकुमार पाल, देवरिया के पूर्व विधायक दीनानाथ कुशवाहा, पूर्व मंत्री अनीस अहमद ‘फूल बाबू’ और AIMIM नेता दानिश खान सहित सैकड़ों समर्थकों ने भी सपा की सदस्यता ली।

बसपा से कांग्रेस और अब सपा तक का सफर

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कांशीराम के साथ BSP से की थी। वे मायावती के करीबी और पार्टी के बड़े मुस्लिम चेहरे माने जाते थे। मायावती सरकार में उनके पास कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी।2017 विधानसभा चुनाव के बाद बसपा से अलग होकर वे कांग्रेस में शामिल हुए और पश्चिम यूपी की जिम्मेदारी संभाली। करीब आठ साल कांग्रेस में रहने के बाद अब वे सपा में आ गए हैं।सपा जॉइन करने के बाद उन्होंने दावा किया कि 2027 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार बनेगी।

क्या SP में बना पाएंगे अपनी सियासी जगह?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में वैसा ही राजनीतिक रुतबा हासिल कर पाएंगे जैसा बसपा में था?सपा में पहले से ही पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक मजबूत मुस्लिम नेतृत्व मौजूद है। आजम खान, अफजाल अंसारी, कमाल अख्तर, सलीम इकबाल शेरवानी, अताउर्रहमान और जियाउर्रहमान बर्क जैसे नेता पहले से पार्टी में सक्रिय हैं।ऐसे में नसीमुद्दीन के लिए खुद को स्थापित करना आसान नहीं होगा।

मुस्लिम वोट बैंक और SP की रणनीति

उत्तर प्रदेश में 20 फीसदी से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं, जो हालिया चुनावों में बड़े पैमाने पर सपा के साथ खड़े रहे हैं। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा को मिला।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नसीमुद्दीन की एंट्री से सपा बसपा के पारंपरिक कैडर वोट में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर सकती है, खासकर बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी में जहां उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।

क्या बन पाएंगे आजम खान का विकल्प?

Azam Khan सपा के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं और लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरे रहे। उनके कानूनी मामलों के चलते सक्रिय राजनीति सीमित हुई है, लेकिन पार्टी में उनकी पकड़ अब भी मजबूत मानी जाती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में आजम खान जैसा प्रभाव बना पाएंगे?

विश्लेषकों का कहना है कि नसीमुद्दीन का अनुभव और नेटवर्क सपा के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन पार्टी में पहले से मौजूद कद्दावर मुस्लिम नेतृत्व के बीच खुद को शीर्ष पंक्ति में स्थापित करना आसान नहीं होगा।

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